भारत में खाने की आदतों में एक शांत लेकिन गहरा बदलाव हो रहा है, जो देश की मेटाबोलिक सेहत को नए सिरे से आकार दे रहा है. हाल ही में नेचर मेडिसिन में छपी आइसीएमआर-इंडियाबी (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च-इंडिया डायबिटीज) डायटरी स्टडी बताती है कि आज भारतीय क्या खा रहे हैं और उसका डायबिटीज, मोटापा और प्रीडायबिटीज से क्या रिश्ता है.
बड़े और देश का प्रतिनिधित्व करने वाले आंकड़ों के आधार पर स्टडी दिखाती है कि कैलोरी शायद पर्याप्त है, लेकिन मैक्रोन्यूट्रिएंट्स का संतुलन बिगड़ा हुआ है. भारतीय डायट में कार्बोहाइड्रेट बहुत ज्यादा है, प्रोटीन कम है और फैट क्वालिटी खराब है.
शोधकर्ता कहते हैं कि सिर्फ चावल या गेहूं की जगह मिलेट्स या होल ग्रेन्स लेना, जब तक कुल कार्ब कम न हों, मेटाबोलिक रिस्क को खास कम नहीं करता. इसके उलट, छोटे बदलाव भी असर दिखाते हैं. जैसे कार्ब का थोड़ा हिस्सा प्रोटीन से बदलना. नतीजे बताते हैं कि भारतीय थाली को गहराई से रीसेट करने की जरूरत है: कम रिफाइंड कार्ब, ज्यादा प्रोटीन, बेहतर फैट और कम ऐडेड शुगर.
भारतीय थाली में किसकी मात्रा कितनी होती है?
भारतीय आज क्या खा रहे हैं और वह उनकी सेहत पर किस तरह का असर डाल रहा है. इसमें 62-65% रोजाना की कैलोरी कार्बोहाइड्रेट से मिलती है. इसके अलावा, 12% से कम ऊर्जा प्रोटीन से मिलती है.
वहीं अगर भारतीय थाली में फैट की बात करें तो ये 30% से भी कम मिलता है. फैट इनटेक है, जो राष्ट्रीय सिफारिश के करीब है लेकिन क्वालिटी खराब है.
खुराक में हाइ ग्लाइसेमिक खाद्य पदार्थों का दबदबा है, जो खून में शुगर को तेजी से बढ़ाते हैं. इन्हें ज्यादा मात्रा में खाया जाता है. इससे तुरंत ऊर्जा तो मिलती है लेकिन मेटाबोलिक सुरक्षा कमजोर रहती है. बार-बार ग्लूकोज स्पाइक होते हैं और खाने के बाद पेट भरा रहने का एहसास कम रहता है.
नतीजा ऐसे हमारे शरीर पर हो रहा असर
इसके कारण शरीर में टाइप 2 डायबिटीज का ज्यादा फैलाव होता है. कम बीएमआइ के बावजूद पेट की चर्बी बढ़ने लगता है. इस तरह प्रीडायबिटीज वाले लोगों की जमात तेजी से बढ़ रहा है.
36 राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र-दिल्ली के शहरी और ग्रामीण इलाकों के 1,21,077 वयस्कों पर किए गए विश्लेषण में ये सामने आया है.
हमारी थाली में कार्ब की अति मात्रा है-
भारतीय दुनिया के सबसे ज्यादा कार्ब डाइट लेने वालों में शामिल हैं. रोज की कुल ऊर्जा का करीब दो-तिहाई हिस्सा सिर्फ कार्ब से है. मुख्य स्रोत अब भी सफेद चावल, रिफाइंड गेहूं का आटा और पॉलिश किए अनाज ही हैं.
ये खाद्य पदार्थ सस्ते हैं, संस्कृति का हिस्सा हैं. पर इन्हें जरूरत से ज्यादा खाने पर मेटाबोलिक जोखिम बढ़ता है. ज्यादा कार्बोहाइड्रेट लेने पर डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है. इसके कारण मोटापा भी बढ़ता है और पेट में चर्बी का ज्यादा जमाव होता है.
प्रोटीन की कमी बरकरार
देश के लोगों में ज्यादातर प्रोटीन अनाज और दालों से आता है, जो कंप्लीट सोर्स नहीं है. हाइ क्वालिटी प्रोटीन का सेवन हर इलाके और आय वर्ग में कम होता है. अंडे, मछली, डेयरी और मांस का सेवन कम करते हैं.
इसके कारण कम प्रोटीन की वजह से खाने के बाद पेट जल्दी नहीं भरता. इससे दिन में बाद में कार्ब ज्यादा खाए जाते हैं. समय के साथ यह पैटर्न इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ाता है
फैट यानी वसा का असंतुलन
सिर्फ चार राज्यों को छोड़ बाकी में सैचुरेटेड फैट का सेवन ज्यादा है.सुरक्षात्मक फैट का सेवन सीमित मात्रा में ही हो रहा. जैसे-जैसे डाइट मॉडर्न हो रही है, फैट बढ़ा है, लेकिन उसकी क्वालिटी नहीं. ओमेगा-3 और मोनोअनसैचुरेटेड फैट कम लिए जा रहे हैं.
धीरे-धीरे बढ़ती जाती शुगर
36 में से 21 राज्यों और यूटी में ऐडेड शुगर तय सीमा से ज्यादा है. ये रोज की ऊर्जा का 5 प्रतिशत से कम है. यह शुगर कभी-कभार नहीं, रोजाना ली जा रही है. इसका स्रोत: मीठी चाय-कॉफी, पारंपरिक मिठाइयां और पैकेज्ड फूड है. ऐडेड शुगर कैलोरी देती है, पोषण नहीं. इससे वजन तेजी से बढ़ता है और इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ता है.
डायट का असरदार समाधान
> चावल या गेहूं से मिल्ड मिलेट्स पर शिफ्ट होना
> पोर्शन घटाए बिना होल ग्रेन आटा इस्तेमाल करना
> होल ग्रेन्स सेहतमंद हैं, लेकिन कार्ब से भरपूर भी. कुल कार्ब लोड ही असली ड्राइवर रहता है.
क्या काम करता है
> कार्ब से मिलने वाली कैलोरी का कम से कम 5 प्रतिशत प्रोटीन से बदलना
> प्लांट प्रोटीन, डेयरी, अंडे और मछली ज्यादा लेने से साफ फायदे दिखते हैं

