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मैकाले की सोच के खिलाफ लड़ाई को कैसे मजबूती देगा भारतीय शिक्षा बोर्ड?

2035 तक मैकाले की शिक्षा पद्धति को उखाड़ फेंकने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऐलान को पूरा करने के लिए भारतीय शिक्षा बोर्ड आगे बढ़कर उनका साथ दे रहा है. लेकिन, क्या इतने से बात बन सकेगी?

भारतीय शिक्षा बोर्ड हरिद्वार के गुरुकुलम में बच्चे
अपडेटेड 30 दिसंबर , 2025

नवंबर 2025 में अयोध्या और दिल्ली में दिए गए भाषणों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने थॉमस बेबिंगटन मैकाले उर्फ लॉर्ड मैकाले को सीधे निशाने पर लिया. उनका कहना था कि ''1835 में मैकाले ने भारत को उसकी जड़ों से काटने का अभियान शुरू किया. उसका मकसद ऐसे भारतीय तैयार करना था जो दिखने में भारतीय हों लेकिन सोच से अंग्रेज. इसके लिए शिक्षा व्यवस्था को हथियार बनाया गया.''

मोदी ने महात्मा गांधी का हवाला देते हुए कहा कि भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था फलदार वृक्ष थी, जिसे जड़ से उखाड़ दिया गया. उस शिक्षा में ज्ञान के साथ कौशल, जीवन मूल्य और समाज की जरूरतें जुड़ी थीं. मैकाले की व्यवस्था ने आत्मविश्वास तोड़ा, हीन भावना पैदा की और भारतीय ज्ञान-विज्ञान को हाशिए पर धकेल दिया. मोदी का तर्क साफ है: ''1835 में शुरू हुई वह शिक्षा आज भी भारत की सोच, आत्मविश्वास और ज्ञान परंपरा को बुरी तरह जकड़े हुए है.''

प्रधानमंत्री का दावा है कि 1835 से शुरू हुई यह यात्रा 2035 तक खत्म की जानी है. यानी अगले दस साल में भारत को उस मानसिक गुलामी से मुक्त करना है, जो शिक्षा के जरिए भीतर तक बैठ गई है.

मैकाले ने आखिर किया क्या था?
इंडियन एजुकेशन ऐक्ट, 1835 केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं था, जानकारों के मुताबिक, यह एक सोच का औजार था. ब्रिटिश शासन को लगा कि सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक रूप से समृद्ध समाज को लंबे समय तक गुलाम बनाए रखना मुश्किल है. इसलिए भारतीय ज्ञान परंपरा को पिछड़ा, अवैज्ञानिक और अनुपयोगी साबित करने की रणनीति अपनाई गई.

इस ऐक्ट के जरिए पाठ्यक्रम, किताबें, शिक्षण पद्धति, मूल्यांकन और स्कूल का पूरा माहौल इस तरह बनाया गया कि भारतीय मानस अपनी जड़ों से कट जाए. लक्ष्य साफ था: एक ऐसा वर्ग तैयार करना जो शासन के लिए क्लर्क, दुभाषिया और वफादार कर्मचारी बने. नतीजा यह हुआ कि पीढ़ी दर पीढ़ी शिक्षा आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी सोच की नकल बनती गई.

भारतीय शिक्षा बोर्ड की एंट्री 
मैकाले की इस विरासत को चुनौती देने के लिए सरकार ने 2019 में भारतीय शिक्षा बोर्ड (बीएसबी) को मान्यता दी. पूर्व आइएएस अफसर और बोर्ड के कार्यकारी अध्यक्ष एन.पी. सिंह कहते हैं कि अब जरूरत उस टूटी हुई कड़ी को फिर से जोड़ने की है. उनकी राय में, ''प्रधानमंत्री आधुनिकता के नहीं बल्कि पश्चिमीकरण के खिलाफ हैं. समस्या यह है कि आज का बहुत सारा ज्ञान अंग्रेजी में उपलब्ध है. अगर बच्चे अंग्रेजी में दक्ष नहीं होंगे, तो वे उस ज्ञान से वंचित रह जाएंगे. इसलिए बीएसबी का मकसद अंग्रेजी हटाना नहीं, बल्कि भारतीय दृष्टि के साथ आधुनिक ज्ञान देना है.''

लेकिन आलोचकों का मानना है कि बीएसबी बच्चों पर धार्मिक-सांस्कृतिक संस्कार थोपना चाहता है. सिंह इसे सिरे से खारिज करते हैं, ''भारतीय ज्ञान परंपरा को अक्सर धार्मिकता से जोड़ दिया जाता है, जबकि इसका मूल अर्थ ज्ञान सृजन है.'' बीएसबी का दावा है कि वह सड़ी-गली परंपराओं को आगे नहीं बढ़ा रहा. पाठ्यक्रम में यह बताया जाता है कि अलग-अलग कालखंडों में भारतीय समाज ने समस्याओं का सामना कैसे किया; भाषा, दर्शन, गणित, विज्ञान, कृषि और उद्योग में कैसे प्रयोग किए. यह भी समझाया जाता है कि बारहवीं शताब्दी तक ज्ञान के मामले में अग्रणी रहने वाला भारत पिछले आठेक सौ साल में क्यों पिछड़ा और अब इक्कीसवीं सदी में फिर से नॉलेज क्रिएटर कैसे बने.

बीएसबी के पाठ्यक्रम की खासियत
बीएसबी का जोर केवल अकादमिक ज्ञान पर नहीं है. कृषि व्यवसाय, एग्री इकोनॉमी, जर्नलिज्म और स्थानीय शिल्प/कला से जुड़े कोर्स पढ़ाए जा रहे हैं. हर क्षेत्र की जरूरत के हिसाब से उद्यमिता का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. सिंह मानते हैं कि ''आठवीं तक पहुंचते-पहुंचते छात्र योग के आसन, प्राणायाम और उनकी दार्शनिक पृष्ठभूमि समझ लेगा.'' उनके मुताबिक, नैतिकता अलग से पढ़ाने की चीज नहीं है. वह भाषा, व्यवहार और सोच के जरिए सहज रूप से बच्चे के व्यक्तित्व का हिस्सा बननी चाहिए. स्क्रीन टाइम और सूचनाओं की बाढ़ के सवाल पर बोर्ड का जवाब है कि बच्चों को सूचनाओं से दूर नहीं किया जा सकता. जरूरत सही-गलत का विश्लेषण करने की दृष्टि विकसित करने की है.

बीएसबी की किताबों में खगोल विज्ञान, गणित, चिकित्सा, धातु विज्ञान, वास्तु, संगीत और कृषि में भारतीय योगदान को आधुनिक संदर्भ में रखा गया है. साथ ही संविधान में दिए गए मूल अधिकारों और कर्तव्यों की समझ भी कराई जा रही है. गीता, जैन दर्शन, बौद्ध अष्टांग मार्ग, सांख्य और वेदांत जैसे विचारों को किसी धार्मिक उपदेश की तरह नहीं, बल्कि नैतिक और दार्शनिक विमर्श के रूप में पेश किया गया है.

आदिवासी नायकों, क्षेत्रीय साहित्य और भाषाई विविधता को भी जगह दी गई है. दसवीं तक आते-आते छात्र कई भारतीय भाषाओं के बुनियादी शब्द और वाक्य पहचानने लगता है. विज्ञान को रोजमर्रा की जिंदगी, रसोई, प्रकृति और शरीर से जोड़कर पढ़ाया जा रहा है.

बोर्ड का ढांचा और मान्यता
भारतीय शिक्षा बोर्ड को 2019 में वैधानिक स्वरूप मिला और 2022 में इसे सीबीएसई के समकक्ष मान्यता दी गई. नौकरी, उच्च शिक्षा और तकनीकी दाखिलों में इसकी मान्यता अन्य राष्ट्रीय बोर्डों जैसी है. आठवीं तक की किताबें तैयार हो चुकी हैं और कई स्कूलों में पढ़ाई जा रही हैं. देश के 800 से ज्यादा स्कूल इससे जुड़े हुए हैं, जो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान में फैले हैं.

इसके बोर्ड में आइआइटियन जैन मुनि वेद सागर महाराज के साथ बौद्ध, सिख, मुस्लिम यानी सभी धर्मों के विद्वानों को जगह दी गई है. बोर्ड मं. 18 और सोसाइटी में 35 सदस्य हैं. प्रो. एस.सी. वर्मा, भारत भूषण त्यागी जैसे पद्म अवार्डी सोसाइटी में शामिल हैं. जामिया की पूर्व वाइस चांसलर नजमा अख्तर भी इससे जुड़ी हुई हैं. भारत सरकार ने पतंजलि योगपीठ को इसकी स्पांसरिंग बॉडी बनाया है. पतंजलि का काम बिना किसी लाभ के इसका पूरा वित्त पोषण करना और विद्वानों को जोड़ना है.

सीबीएसई से यह किन मायनों में अलग?
सीबीएसई का फोकस मुख्यत: प्रतियोगी परीक्षाओं और एनसीईआरटी फ्रेमवर्क पर है. इसके उलट बीएसबी आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा के मेल पर जोर देता है. बीएसबी में बायोटेक्नोलॉजी से लेकर स्पेस टेक्नोलॉजी तक की पढ़ाई होती है, लेकिन उसके साथ यह भी सिखाया जाता है कि विज्ञान और समाज का रिश्ता क्या है. बोर्ड बच्चों को शौर्यवान के साथ-साथ करुणाशील भी बनाना चाहता है. आइटी, साइबर सिक्योरिटी, डेटा साइंस और मशीन लर्निंग जैसे कोर्स कराए जा रहे हैं. नौवीं से बारहवीं तक इतने व्यावहारिक कोर्स हैं कि छात्र चाहें तो स्कूल के बाद सीधे रोजगार की राह पकड़ सकें. ये कोर्स राष्ट्रीय स्किल क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क से जुड़े हैं.

किसी भी शिक्षा बोर्ड का काम मुख्यत: स्कूलों को मान्यता देना, पाठ्यक्रम तय करना, परीक्षा लेना और मार्कशीट जारी करना होता है. बीएसबी ये सारे काम कर रहा है, साथ ही यह विशेष पाठ्यपुस्तकें तैयार करा रहा है. 

चुनौती आगे की
शिक्षाविद और केंद्र सरकार में संयुक्त सचिव रहे प्रेमपाल शर्मा मानते हैं कि ''भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए गंभीर रिसर्च जरूरी है.'' उनका कहना है कि ''भारत में शोध पर खर्च बहुत कम है और मौलिक काम सीमित है. हमें प्रश्न पूछने और तर्क-वितर्क की संस्कृति को और मजबूत करना होगा. ज्ञान को गुप्त रखने या चुनिंदा लोगों तक सीमित करने से प्रगति नहीं होगी.

2035 तक मैकाले की छाया से बाहर निकलने का लक्ष्य बड़ा है. इसके लिए बीएसबी को तेजी से विस्तार करना होगा.'' इसके अलावा सत्ता और समाज के प्रभावशाली वर्ग को भी भारतीय ज्ञान परंपरा पर भरोसा दिखाना होगा. अगर वे अपने बच्चों को विदेश या महंगे अंग्रेजी स्कूलों में भेजते रहेंगे, तो बदलाव का संदेश कमजोर पड़ेगा.

मैकाले के खिलाफ यह अभियान कोर्स बदलने का सवाल नहीं है. यह उस मानसिकता से मुक्ति का दावा है, जो दो सौ साल से शिक्षा के जरिए गढ़ी गई है. बीएसबी इस दिशा में एक प्रयोग है. सवाल यह है कि क्या यह प्रयोग केवल विकल्प बनकर रह जाएगा या वाकई मुख्यधारा की सोच बदल पाएगा? जवाब अगले दस साल में ही सामने आएगा जब यहां से निकले विद्यार्थियों का समाज में आकलन होगा.

भारतीय शिक्षा बोर्ड के कार्यकारी अध्यक्ष एन. पी. सिंह के मुताबिक, अगर बच्चे अंग्रेजी में दक्ष नहीं होंगे तो वे उस ज्ञान से वंचित रह जाएंगे. इसलिए बीएसबी का मकसद अंग्रेजी हटाना नहीं, बल्कि भारतीय दृष्टि के साथ आधुनिक ज्ञान देना है. 

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