भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय मीडिया कार्यालय से 14 दिसंबर की शाम एक मामूली-सा संदेश आया कि बिहार की नई सरकार में चुपचाप काम करने वाले सार्वजनिक कार्य मंत्री नितिन नबीन को पार्टी का 'कार्यकारी अध्यक्ष' बनाया गया है. यह पार्टी में सबसे बड़े राष्ट्रीय ओहदे पर बैठाए जाने का शुरुआती कदम है. नबीन अगले साल दायित्व संभालते समय महज 46 साल की उम्र में अब तक के सबसे कम उम्र के भाजपा अध्यक्ष होंगे. वे नितिन गडकरी का रिकॉर्ड तोड़ेंगे, जो 52 साल की उम्र में उस ओहदे पर पहुंचे थे.
सन 1980 में भाजपा के औपचारिक गठन के बाद जन्मे नबीन मिलेनियल पीढ़ी के पहले नेता हैं, जो पार्टी के राष्ट्रीय संगठन के मुख्य पद पर पहुंचेंगे. पार्टी के बाहर (और अंदर भी) यह नाम ज्यादा जाना-पहचाना नहीं है. हालांकि, भाजपा में इससे लंबी उलझन छंटी है क्योंकि अध्यक्ष पद पर नियुक्ति लंबे समय से टलती आ रही थी. मौजूदा पार्टी प्रमुख जे.पी. नड्डा का कार्यकाल जनवरी 2023 में ही खत्म हो गया था. तब से वे एक्स्टेंशन पर चलते आ रहे थे.
सूत्रों का कहना है कि लगभग डेढ़ साल से पार्टी नेतृत्व और आरएसएस इस पर माथापच्ची कर रहे थे कि भाजपा की संगठनात्मक मशीनरी के शीर्ष पर किसे बैठाया जाए? कौन होगा जो भविष्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केंद्रीय भूमिका से हटने के बाद पार्टी को आगे लेकर जाएगा? इससे पहले चर्चा में कई नाम थे लेकिन उनमें से किसी पर रजामंदी नहीं बन पाई. बिहार के नेता की नियुक्ति से यह गतिरोध कुछ इस अंदाज में खत्म हुआ, जिसकी उम्मीद शायद ही किसी ने की होगी.
गुमनाम खिलाड़ी
नबीन को बिहार के बाहर चंद लोग ही जानते रहे होंगे. अमित शाह पार्टी अध्यक्ष (2014-20) थे, तो उन्हें पार्टी की युवा शाखा भारतीय जनता युवा मोर्चा का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया था. नबीन पहली बार राष्ट्रीय नेतृत्व की नजर में उस वक्त आए जब उन्हें 2023 में छत्तीसगढ़ में चुनाव सह-प्रभारी बनाकर भेजा गया था. उस समय भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार मजबूत लग रही थी, और चुनाव के शुरुआती आकलन में भाजपा के लिए ज्यादा संभावना नहीं दिख रही थी.
छत्तीसगढ़ चुनाव अभियान में जुड़े रहे पार्टी अधिकारियों का कहना है कि नबीन उन पहले लोगों में से थे जिनकी दलील थी कि राज्य में जमीनी हालात बदल रहे हैं. उन्होंने सत्ता विरोधी लहर के संकेत भांप लिए और संगठन मजबूत करने पर ज्यादा जोर दिया. उनके आकलन ने आखिरकार शाह को मना लिया और वे राज्य में प्रचार में ज्यादा सक्रिय हुए और संसाधनों की आमद बढ़ा दी. भाजपा की अप्रत्याशित जीत ने पार्टी के आंतरिक फीडबैक सिस्टम के मूल्यांकन के तरीके को बदल दिया. उसके बाद नबीन को 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए छत्तीसगढ़ का प्रभार दिया गया, जिसमें पार्टी ने 11 में से 10 सीटें जीतकर फिर से शानदार जीत हासिल की.
बिहार में नबीन पहली बार 26 साल की उम्र में विधायक बने. वे अपने पिता भाजपा नेता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा की मौत के बाद खाली हुई पटना पश्चिम विधानसभा सीट से जीते थे. अब वे पांच बार के विधायक हैं. उन्होंने पटना के बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र को राज्य में भाजपा की सबसे मजबूत शहरी सीटों में से एक बना दिया है. 2025 के चुनाव में उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल की रेखा कुमारी को 51,000 से ज्यादा वोटों से हराया.
नबीन कायस्थ हैं और वे अपनी जाति से बिहार या पूर्वी भारत से आए पहले भाजपा प्रमुख होंगे. कायस्थ अगड़ी जाति है लेकिन दो बातें उसके पक्ष में हैं. बिहार में कायस्थ सिर्फ 0.6 फीसद हैं, यानी उसकी संख्या ज्यादा नहीं है. और दूसरा, कायस्थों के साथ मोटे तौर पर सामंती बर्ताव का दाग नहीं है, जिससे मुख्य राज्यों में ऊंची जातियों से इतर के भाजपा समर्थकों के बीच नबीन की स्वीकार्यता में मदद मिलनी चाहिए.
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि जब संघ के नेताओं ने कुछ दूसरे नामों (जिसमें जाहिरा तौर पर कुछ केंद्रीय मंत्री भी शामिल थे) पर भौं टेढ़ी की तो शाह ने नबीन का नाम आगे बढ़ाया. केंद्रीय गृह मंत्री ने 12 दिसंबर को अंडमान में वीर सावरकर स्मृति कार्यक्रम के मौके पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को नबीन के नाम पर फैसले की जानकारी दी.
सूत्रों के मुताबिक, इस फैसले से पार्टी में स्थिरता आई है, खासकर जब पार्टी मोदी के बाद का नेतृत्व तय करने के लिए बदलाव के दौर से गुजर रही है. भाजपा में बतौर राज्य क्षत्रप उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान जैसे मजबूत नेता हैं. नबीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती युवा पीढ़ी के साथियों के साथ नई भाजपा बनाने की होगी, इसके अलावा सरकार और संघ से जुड़े संगठनों के साथ पार्टी का दबदबा भी बनाए रखना होगा. यह मुश्किल काम है क्योंकि मोदी कैबिनेट में लगभग सभी भाजपा मंत्री उम्र और अनुभव दोनों में पुराने हैं. भाजपा के एक अंदरूनी सूत्र का कहना है, ''जब उन्हें कमान मिलेगी, तो यह उन पर निर्भर करेगा कि वे अपनी काबिलियत दिखाएं...पार्टी की मौजूदा छवि को बदलें, जिसे मोदी-शाह-नड्डा की तिकड़ी चला रही है.''
चली पुरवाई
नबीन के आगे बढ़ने से चुपचाप एक क्षेत्रीय बदलाव भी दिख रहा है. भाजपा के संगठनात्मक नेतृत्व पर लंबे समय से पश्चिम, उत्तर और मध्य भारत के लोगों का दबदबा रहा है. बिहार जैसे राज्य से किसी युवा नेता को आगे बढ़ाने से मौजूदा सत्ता-ढांचे को छेड़े बिना उसका दायरा बढ़ गया है. भाजपा और संघ का जोर पूर्वी भारत में असर बढ़ाने पर है. 2024 में पार्टी ओडिशा की सत्ता से आखिरकार नवीन पटनायक के बीजू जनता दल (बीजद) को हटाने में कामयाब रही, और अब पश्चिम बंगाल पर निशाना साध रही है. इत्तेफाक से नबीन अच्छी बांग्ला बोलते हैं, और वहां का विधानसभा चुनाव इस युवा नेता के लिए अग्निपरीक्षा जैसा हो सकता है.
इस बीच, पार्टी के जानकारों का कहना है कि नबीन का चयन पार्टी में अधिकार और उत्तराधिकार को मैनेज करने के तरीके का भी अंदाजा देता है. उनका आगे बढ़ना शिखर पर सत्ता के ढांचे में किसी बदलाव का संकेत नहीं है. मोदी-शाह की जोड़ी के हाथ में पार्टी की रणनीति की कमान है. एक सूत्र के मुताबिक, जो बदलेगा, वह है 'मिडिल लेयर' यानी बीच के स्तर का ढांचा, जो फिलहाल जे.पी.नड्डा के जिम्मे है और जो फैसलों पर अमल करने के जिम्मेदार हैं. जो बात खुलकर नहीं कही जा रही, वह यह कि नड्डा की तरह नितिन नबीन भी ऐसे नेता हैं जिनका अपना कोई स्वतंत्र जनाधार या ताकत नहीं, जो आगे चलकर गुटीय दबाव में बदल सके. यह भी कोई नई बात नहीं है.
नई पारी की शुरुआत
> नितिन नबीन (46 वर्ष) सबसे कम उम्र के भाजपा अध्यक्ष होंगे. इस तरह वे नितिन गडकरी का रिकॉर्ड तोड़ेंगे
> 2023 में छत्तीसगढ़ चुनाव में जीत की पटकथा लिखने के बाद वे मोदी-अमित शाह की नजर में आए.
> बिहार के इस युवा नेता के सामने पार्टी कार्यकर्ताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अपेक्षाओं का संतुलन साधना बड़ी चुनौती होगा
युवा नितिन नबीन के उभार को भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्वी भारत में विस्तार की योजनाओं के नजरिए से भी देखा जा रहा है.

