
नवंबर के आखिर में ग्लासगो में कॉमनवेल्थ स्पोर्ट जनरल असेंबली के बड़े हॉल में अचानक ढोल की थाप के साथ गरबा नर्तक मंच पर छा गए. यह अहमदाबाद को आधिकारिक तौर पर 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी मिलने का जश्न था.
गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष सांघवी, भारतीय ओलंपिक संघ (आइओए) की प्रमुख पी.टी. उषा और वहां मौजूद दूसरे अधिकारियों के लिए यह फैसला चौंकाने वाला नहीं था. लेकिन इससे आगे की बड़ी जिम्मेदारी साफ हो गई.
कुछ हफ्तों से इसका एहसास होने लगा था. अक्तूबर के मध्य में कॉमनवेल्थ स्पोर्ट के एग्जीक्यूटिव बोर्ड ने अहमदाबाद के नाम की सिफारिश कर दी थी, इसलिए ग्लासगो में मुहर लगना बस औपचारिकता थी. फिर भी 2010 में दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के कड़वे अनुभव के 15 साल बाद भारत को एक तरह से दूसरा मौका मिल रहा है. उस आयोजन में खर्च बढ़ने, ढांचागत खामियों और राजनैतिक विवादों ने काफी नुक्सान पहुंचाया था. इस बार अधिकारी कह रहे हैं कि दांव सिर्फ 11 दिन के खेल आयोजन तक सीमित नहीं है.
अम्दावाद 2030 के नाम वाले इस शताब्दी संस्करण ने एक गैर मेट्रो शहर को भारत की वैश्विक खेल महत्वाकांक्षाओं के केंद्र में ला खड़ा किया है. यह 2036 समर ओलंपिक की मेजबानी के लिए भारत की बोली से पहले एक अहम रिहर्सल होगा. गुजरात ने अपने प्रस्ताव में कहा था कि कॉमनवेल्थ गेम्स अम्दावाद को देश के प्रमुख स्पोर्ट्स हब के तौर पर उभरने को रफ्तार देगा.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा पर जोर देते हुए एक्स पर लिखा कि ''भारत अब मजबूती से वैश्विक खेल नक्शे पर है.’’ लेकिन अम्दावाद 2030 का मूल्यांकन सिर्फ चमक-दमक से नहीं होगा; गवर्नेंस, फंडिंग, खेलों की गहराई और कामकाज के तरीके सब कसौटी पर होंगे. यह अहमदाबाद के ओलंपिक सपने के लिए परीक्षा का अवसर है.
अहमदाबाद कैसे जीता
असल में गुजरात की मुहिम जनवरी 2025 में शुरू हुई. शीर्ष नीति नियंताओं ने माना कि ज्यादा
अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों की मेजबानी करने से भारत का ओलंपिक दावा मजबूत होगा. पहली चुनौती घरेलू राजनीति थी. गठबंधन सरकार में अहमदाबाद को मेजबान बनाने पर सहमति बनानी थी, जबकि भुवनेश्वर, हैदराबाद और नई दिल्ली भी दौड़ में थे.

आखिरकार अहमदाबाद के चुने जाने पर कई लोगों की भौंहें तन गईं. इस शहर ने कभी इस स्तर का कोई बहु-खेल अंतरराष्ट्रीय आयोजन नहीं किया है. अब तक इसकी सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय इवेंट सितंबर 2025 में हुई एशियन एक्वेटिक्स चैंपियनशिप रही है, जिसमें करीब 1,000 एथलीट शामिल हुए थे. खेलों के मामले में इसकी वैसी साख नहीं है जैसी ओडिशा जैसे राज्यों की है, जो अब हॉकी का बड़ा केंद्र बन चुका है. अहमदाबाद की सबसे बड़ी खेल पहचान आज भी नरेंद्र मोदी स्टेडियम ही है.
फैसला आखिरकार अर्थशास्त्र और जगह पर टिका. अहमदाबाद का तेजी से बढ़ता औद्योगिक आधार और गुजरात की उद्यमी अर्थव्यवस्था को इतने बड़े स्तर के इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास का बोझ उठाने में सक्षम माना गया. यह काम पहले से चल रहा था, क्योंकि शहर एक साल पहले ही 2036 ओलंपिक की मेजबानी की दौड़ में औपचारिक रूप से उतर चुका था. मुंबई के नजदीक होना, और जल्द ही देश की पहली बुलेट ट्रेन से जुड़ना, इस तथ्य ने भी अहमदाबाद की दावेदारी को और मजबूत किया.
खर्च का सवाल
इस आयोजन का आधिकारिक बजट अभी घोषित नहीं हुआ है, लेकिन अनुमान है कि करीब 5,000 करोड़
रुपए होगा. यह दिल्ली 2010 से बिल्कुल उलट है, जहां शुरुआती अनुमान 13,566 करोड़ रुपए था और बाद में खर्च बढ़कर 18,532 करोड़ रुपए तक पहुंच गया. दिल्ली के मामले में पांच नए खेल स्थल, 1,100 अपार्टमेंट वाला एथलीट्स विलेज और मौजूदा सुविधाओं के अपग्रेड में ज्यादातर पैसा खर्च हुआ.
गुजरात में खेल, युवा और सांस्कृतिक गतिविधि विभाग के प्रमुख सचिव अश्विनी कुमार कहते हैं, ''दिल्ली में तो फ्लाइओवर, मेट्रो का विस्तार और एयरपोर्ट अपग्रेड जैसे शहरी कामों का बिल भी गेम्स के खाते में जोड़ दिया गया था. ऐसे किसी खर्च को अहमदाबाद गेम्स से नहीं जोड़ा जाएगा...शहर का शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर और पब्लिक ट्रांसपोर्ट उसकी स्वाभाविक बढ़त के लिए विकसित किया जा रहा है.’’
साथ-साथ चल रहे इस निर्माण का पैमाना काफी बड़ा है. साबरमती रिवरफ्रंट को मौजूदा 11.5 किमी से 2027 तक 38.5 किमी तक बढ़ाया जाएगा. यह स्पोर्ट्स वेन्यू के तौर पर भी इस्तेमाल होगा. अभी अहमदाबाद और गांधीनगर में तीन से पांच स्टार श्रेणी में कुल 5,420 होटल कमरे हैं. अगले पांच साल में करीब 3,000 नए होटल कमरे जोड़ने की योजना है, जिनमें 1,500 पांच स्टार कैटेगरी में होंगे.
पांच-सात किमी दायरे में एथलीट्स विलेज 5,000 से ज्यादा खिलाडिय़ों और सपोर्ट स्टाफ के लिए तैयार किया जाएगा. इसमें ज्यादातर स्टूडियो अपार्टमेंट होंगे. एयर कनेक्टिविटी भी बढ़ाई जा रही है. 2024-25 में सरदार वल्लभभाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट से करीब 1.34 करोड़ यात्रियों ने सफर किया. 2026 तक पूरा होने वाला नया इंटीग्रेटेड टर्मिनल क्षमता को दोगुना करने की उम्मीद है.
सिर्फ वही खर्च गेम्स के खाते में जाएंगे जो सीधे आयोजन से जुड़े होंगे, और अश्विनी कुमार कहते हैं कि इसके लिए फंडिंग तैयार है. वे बताते हैं, ''इस खर्च को राज्य और केंद्र मिलकर उठाएंगे.’’ उनका कहना है कि ''ब्रॉडकास्ट राइट्स, टिकट बिक्री, स्पॉन्सरशिप और मर्चेंडाइज से खर्च का बड़ा हिस्सा वापस आ जाएगा.’’
2010 से सबसे बड़ा फर्क प्रशासनिक नियंत्रण में है. अश्विनी कहते हैं, ''दिल्ली में 2003 में मेजबानी का ऐलान हो गया था, लेकिन ऑर्गेनाइजिंग कमेटी 2006 में बनी, जिससे तैयारी में भारी देरी हुई. इस बार जनवरी 2026 से पहले ही कमेटी बना दी जाएगी.’’ वे यह भी कहते हैं, ''2010 के गेम्स किसी एक जिम्मेदार संस्था के अधीन नहीं थे. यहां साफ है कि अंतिम जिम्मेदारी गुजरात सरकार की है, नगर निगम और ऑर्गेनाइजिंग कमेटी उसके साथ होंगे.’’

खेलों की हकीकत
महज इन्फ्रास्ट्रक्चर खेल की कमी को नहीं ढक सकता. क्रिकेट अब भी देश की सोच पर हावी है, जिससे ओलंपिक के ज्यादातर खेलों से संसाधन और लोगों का ध्यान हट जाता है. नतीजा मेडल टेबल पर दिखता है. 2024 के पेरिस ओलंपिक में भारत सिर्फ छह मेडल लेकर लौटा. एक सिल्वर और पांच ब्रॉन्ज.
जुलाई 2025 में केंद्र सरकार ने खेलो भारत नीति, यानी राष्ट्रीय खेल नीति को मंजूरी दी, जिसका मकसद जमीनी स्तर पर भागीदारी बढ़ाना और विश्व स्तर के खिलाड़ी तैयार करना है. लेकिन अधिकारी निजी तौर पर मानते हैं कि सिर्फ नीति से दशकों की अनदेखी नहीं सुधरेगी, इसके लिए लगातार राजनैतिक इच्छाशक्ति चाहिए.
गवर्नेंस अब भी सबसे कमजोर कड़ी है. ज्यादातर राष्ट्रीय खेल महासंघों पर नेताओं का दबदबा है, जिन्हें पद से ताकत और आर्थिक फायदे दिखते हैं. पारदर्शिता की कमी, चयन की अस्पष्ट प्रक्रिया और गुटबाजी आज भी बनी हुई है. गुजरात के अधिकारियों के साथ पिछली बैठक में इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी (आइओसी) ने इन दोनों खामियों की ओर इशारा किया था.
यह साफ संदेश था कि स्टेडियम बनाने जितना ही जरूरी संस्थागत सुधार भी है. आइओए की एग्जीक्यूटिव काउंसिल के एक वरिष्ठ पदाधिकारी और नेता कहते हैं, ''हां, सुधार की चुनौती बहुत बड़ी है. लेकिन चुनावी मजबूरियों के बावजूद इस सरकार में इच्छाशक्ति है.’’
उधर गुजरात में मजबूत खेल संस्कृति खड़ी करने की जद्दोजहद जारी है. 1993 में राज्य की नोडल एजेंसी के तौर पर बनी स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ गुजरात (एसएजी) अब तक जमीनी स्तर पर वैसा असर नहीं छोड़ पाई है, जैसा सोचा गया था. इसकी सबसे दिखने वाली पहल खेल महाकुंभ है, जो 2010 में शुरू हुआ इंटर-स्कूल मल्टी-स्पोर्ट्स फेस्टिवल है और आगे चलकर एलीट खिलाडिय़ों पर केंद्रित शक्तिदूत योजना से जुड़ता है.
इसका पैमाना बहुत बड़ा है. 2025 के महाकुंभ में करीब 70 लाख रजिस्ट्रेशन हुए. खेल बजट भी तेजी से बढ़ा है. 2002 में 2.5 करोड़ रुपए से बढ़कर 2025-26 में 521 करोड़ रुपए तक. यह पैसा खेल महाकुंभ के आयोजन, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाने और जिला तथा तालुका स्तर के स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स विकसित करने जैसी चीजों में लगाया जा रहा है.
फिर भी हकीकत यह है कि दावे और डिलिवरी में अंतर है. हाल ही में पेश की गई पब्लिक अकाउंट्स कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि एसएजी कमजोर जमीनी इन्फ्रास्ट्रक्चर, फुल टाइम कोच की कमी, पोषण सपोर्ट की कमी, काम में सुस्ती और फंड के सही इस्तेमाल न होने से जूझ रही है. रिपोर्ट ने साफ नीति दिशा, विशेषज्ञ मार्गदर्शन और ज्यादा मजबूत फंडिंग सिस्टम की जरूरत पर जोर दिया है.
दांव पर लगा विजन
गुजरात के अधिकारी कहते हैं कि ये गेम्स लंबे समय से टलते आ रहे सुधारों को मजबूरन आगे बढ़ाएंगे. अश्विनी कुमार कहते हैं, ''यूके की लॉफबरो यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर अहमदाबाद में स्पोर्ट्स साइंस का सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाने की योजना है, जहां कोच और दूसरे प्रोफेशनल्स को ट्रेनिंग दी जाएगी...हम ग्रांट इन एड मॉडल पर भी काम कर रहे हैं, जिसमें निजी ऑपरेटर खेल सुविधाओं को चलाएंगे और उनका मेंटेनेंस करेंगे, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए खर्च काबू में रहेगा.’’
अम्दावाद 2030 सिर्फ एक खेल आयोजन नहीं है. यह शहरी और आर्थिक बदलाव पर लगाया गया एक बड़ा दांव है. ऐसे मेगा इवेंट्स के बाद हाउसिंग, ट्रांसपोर्ट और हॉस्पिटैलिटी की संपत्तियां बचती हैं. उनकी असली सफलता इस बात पर टिकी होती है कि स्थानीय अर्थव्यवस्था स्टेडियम का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए शहर ज्यादा खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की मेजबानी की योजना बना रहा है. आखिरकार गेम्स का आकलन भरे हुए और चमकदार स्टेडियम से नहीं होगा, बल्कि इस बात से होगा कि भारत राजनीति, गवर्नेंस और खेल को एक साफ राष्ट्रीय विजन में कितनी मजबूती से जोड़ पाता है.

