पूरी दुनिया में 'कृषि के चार-स्तंभ' के तौर पर नाम लिया जाता है तो बीज, सिंचाई, उर्वरक और कीटनाशक का. इन चारों में भी सबसे पहले बीज की बात होती है. ऐसे में बीजों के नियमन को लेकर अगर कोई पहल हो तो इसके विभिन्न आयामों पर चर्चा और बहस होना स्वाभाविक है.
बीती 13 नवंबर को केंद्र सरकार ने ड्राफ्ट सीड्स बिल, 2025 जारी किया. विधेयक के मसौदे को लेकर सभी स्टेकहोल्डर्स के अपने-अपने दावे हैं. सरकार का दावा है कि यह विधेयक बीजों के विकास, प्रमाणीकरण, विपणन और संरक्षण में व्यापक सुधार लाएगा और जिससे गुणवत्ता, पारदर्शिता और आधुनिकीकरण का पक्का इंतजाम होगा.
हालांकि, किसान संगठन, जैव-विविधता से जुड़े कार्यकर्ता और कुछ राज्य सरकारें प्रस्तावित विधेयक के मसौदे में दर्ज कुछ प्रावधानों को लेकर चिंतित हैं. उनका कहना है कि यह बिल कॉर्पोरेट दबदबे के द्वार खोल सकता है; इससे पारंपरिक बीज संरक्षण प्रथाओं पर पाबंदी की स्थिति पैदा हो सकती है और भारत की समृद्ध कृषि विविधता को नुकसान पहुंच सकता है.
केंद्र सरकार ड्राफ्ट सीड्स बिल 2025 को कृषि क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सुधार के रूप में देख रही है. सरकार का कहना है कि इसका मुख्य उद्देश्य बीजों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना, नकली और खराब गुणवत्ता वाले बीजों की बिक्री रोकना, किसानों को सस्ते और उच्च गुणवत्ता वाले बीज उपलब्ध कराना और नवाचार को बढ़ावा देना है. केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने 13 नवंबर 2025 को इस ड्राफ्ट को सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी किया है. मंत्रालय ने इस मसौदे पर 11 दिसंबर तक सुझाव मांगे हैं.
कानून बनने पर यह विधेयक 1966 के पुराने बीज कानून और 1983 के सीड्स कंट्रोल ऑर्डर की जगह लेगा. विधेयक के प्रमुख प्रावधानों में बीजों का अनिवार्य पंजीकरण, डिजिटल ट्रैकिंग, नकली बीजों पर 30 लाख रुपए तक का जुर्माना और तीन साल तक की सजा का प्रावधान है. इसमें विदेशी संस्थाओं को फील्ड ट्रायल की अनुमति देने का प्रावधान भी शामिल किया गया है.
केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ड्राफ्ट सीड्स बिल, 2025 के बारे में बीती 17 नवंबर को मुंबई में एशियन सीड कांग्रेस का उद्घाटन करते हुए कहा, ''बीजों के मामले में सरकार उच्च मानकों को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है. इसके लिए पहले से ही कई उपाय किए गए हैं. सरकार नकली बीजों और कीटनाशकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रही है. खराब गुणवत्ता वाले बीजों को रोकने के लिए वह एक नया कानून लाएगी.'' इसके बाद भी चौहान ने प्रस्तावित बीज विधेयक, 2025 के प्रावधानों का बचाव करते हुए और इसे संसद के शीतकालीन सत्र में पेश करने की बात अपने कई सार्वजनिक बयानों में दोहराई है. इससे प्रस्तावित विधेयक को लेकर केंद्र सरकार का रुख बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है.
लेकिन किसान संगठनों और कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि विधेयक के कुछ प्रावधानों को बेहतर बनाया जाना चाहिए. इनका तर्क है कि बीजों को लेकर चल रही बहस केवल नीतिगत नहीं बल्कि यह 12 करोड़ से ज्यादा किसानों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और बीज संप्रभुता से जुड़ी हुई है. इनकी एक बड़ी चिंता यह है कि इस मसौदे के प्रावधानों से बीजों की पूरी व्यवस्था 'किसान केंद्रित' न रहकर 'बीज उद्योग केंद्रित' हो जाएगी और इससे भारत की बीज विविधता पर प्रतिकूल असर पड़ेगा.
ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि प्रस्तावित विधेयक में बीजों के 100 प्रतिशत पंजीकरण की बात कही गई है. सबसे ज्यादा फिक्र इसी प्रावधान को लेकर है. किसानों के बीच इस बात को लेकर यह स्पष्टता नहीं है कि जो बीज वे एक साल फसल उगाने के बाद अगले साल के लिए रखते हैं, उनका पंजीकरण भी अनिवार्य होगा?
इस बारे में कृषि मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी अपनी पहचान जाहिर न करने की शर्त पर कहते हैं, ''इसे लेकर स्पष्टता नहीं है. अभी के प्रस्ताव के मुताबिक हर बीज का 'साथी पोर्टल' के माध्यम से पंजीयन कराना अनिवार्य होगा. लेकिन व्यावहारिक तौर पर देखा जाए तो दूर गांवों में बैठे किसानों के लिए ऐसा करना बेहद जटिल होगा. मंत्रालय में भी इस मुश्किल पर चर्चा चल रही है. 11 दिसंबर तक इस मसौदे पर सुझाव आने हैं और उम्मीद है कि जो अंतिम मसौदा तैयार होगा, उसमें इस प्रावधान को लेकर स्पष्टता आएगी.''
किसान संगठनों का यह भी दावा है कि अगर अभी का मसौदा कानून का रूप लेता है तो भारत के बीज क्षेत्र में बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों का दबदबा बढ़ेगा और किसान ज्यादा कीमतों पर बीज खरीदने को बाध्य होंगे. किसान संगठनों का कहना है कि यह बिल किसानों की सदियों पुरानी उस परंपरा पर आघात है जिसके तहत वे न सिर्फ अगली फसल के लिए बीज बचाते हैं बल्कि आपस में बीजों का आदान-प्रदान भी करते हैं. संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने बिल के ड्राफ्ट को वापस लेने की मांग की है, जबकि ऑल इंडिया किसान सभा (एआइकेएस) ने इस मसौदे को लेकर 26 नवंबर को राष्ट्रव्यापी विरोध किया. एसकेएम ने इसे 'कॉर्पोरेट एकाधिकार' का द्वार बताया है, जो बीज संप्रभुता को खतरे में डालता है. एआइकेएस के अनुसार बिल बीजों की कीमतें बढ़ाएगा और किसानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भर बनाएगा.
भारत में एक लाख से ज्यादा स्थानीय किस्मों के बीज बताए जाते हैं. ये भारत की भौगोलिक परिस्थितियों में सूखा, बाढ़ और कीटों का सामना करने में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीजों के मुकाबले ज्यादा सक्षम हैं. एक अंदेशा यह भी व्यक्त किया जा रहा है कि प्रस्तावित विधेयक से मोनोक्रॉपिंग को बढ़ावा मिलेगा. विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसा होने पर मिट्टी की उर्वरता घटती चली जाएगी.
पंजाब, हरियाणा और तेलंगाना समेत कई राज्यों में किसान पहले से ही नकली बीजों से परेशान हैं. 2024-25 में धान की हाइब्रिड किस्मों की असफलता ने खास तौर पर पंजाब और हरियाणा में लाखों किसानों को नुकसान पहुंचाया. इस समस्या से किसानों को बचाने के लिए प्रस्तावित विधेयक में यह प्रावधान किया गया है कि अगर पंजीकृत बीज का इस्तेमाल कोई किसान वैसे ही करता है जैसा कंपनी कहती है, इसके बावजूद बीज नाकाम हो जाए तो किसानों को मुआवजा मिलेगा. हालांकि, इस प्रावधान पर भी शंकाएं हैं. किसान नेता रणदीप सिंह मन्न कहते हैं, ''ड्राफ्ट में फसल के नाकाम होने पर मुआवजे का रास्ता आसान नहीं. इसके लिए किसानों को अदालतों के चक्कर लगाने पड़ेंगे.''
ऐसा नहीं कि 1966 के बीज कानून को बदलने की कोशिश पहले नहीं हुई. दरअसल, 9 दिसंबर, 2004 को राज्यसभा में नया बीज विधेयक पेश किया गया था. लेकिन इसे स्थायी संसदीय समिति के पास भेज दिया गया. समिति ने 26 सितंबर, 2006 को अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें कई प्रावधानों को हटाने की सिफारिश की गई थी. उस समय की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार फिर इस विधेयक पर आगे नहीं बढ़ी. 2019 में मोदी सरकार ने बीज विधेयक का एक मसौदा जारी किया. 2006 की संसदीय समिति की रिपोर्ट की कुछ सिफारिशों को इसमें शामिल किया गया लेकिन तब भी इस पर सहमति नहीं बन पाई और बात आई-गई हो गई. अब छह साल बाद मोदी सरकार फिर से इस दिशा में प्रयास कर रही है.
इस पूरे मामले पर एक प्रमुख स्टेकहोल्डर बीज उद्योग भी है. उसने प्रस्तावित विधेयक का स्वागत किया है. नेशनल सीड्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एनएसएआइ) ने एक बयान जारी कर कहा है कि विधेयक में पंजीकरण और ट्रेसेबिलिटी का जो प्रावधान है उससे नकली बीजों की बिक्री रुकेगी, जो बाजार का 20-30 फीसद हिस्सा है. विधेयक निवेश आकर्षित करने का काम करेगा और जीएम के साथ क्रिस्पर तकनीक के क्षेत्र में वैश्विक कंपनियों का निवेश बढ़ेगा.
केंद्र सरकार कुछ समय पहले सीड विलेज कॉन्सेप्ट लेकर आई थी. इसके तहत गांवों को उच्च गुणवत्ता वाले बीज उत्पादन केंद्र बनाने की योजना बनाई गई. कृषि मंत्रालय और सहकारिता मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि अब इस पहल को प्रस्तावित बिल के साथ जोड़ा जा सकता है. सरकार ने राष्ट्रीय सहकारी नीति 2025 के तहत भी बीज क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं. केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह की पहल पर जो तीन नई मल्टी-स्टेट सहकारी समितियां बनाई गई हैं, उनमें से एक है भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड. यह फसल की पैदावार में सुधार लाने और स्वदेशी प्राकृतिक बीजों के संरक्षण-संवर्धन की प्रणाली विकसित करने के लिए सहकारी समितियों के नेटवर्क बनाकर काम कर रही है.
इसके चेयरमैन योगेंद्र कुमार कहते हैं, ''विधेयक भविष्योन्मुखी है. दुनिया में खेती जिस तरह से बदल रही है, उस बदलाव के लिए भारत की खेती भी तैयार रहे, इस दृष्टि से यह बिल बेहद उपयोगी साबित होगा. यह बिल गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता पक्की करने की बात करता है. इससे कृषि उत्पादकता में बढ़ोतरी होगी और कम जमीन पर कम इनपुट में किसान अच्छी उपज लेकर अच्छी कमाई कर सकेंगे. अच्छे बीज न सिर्फ फसल अच्छी होने की बात पक्की करते हैं बल्कि किसी भी देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं.''
विधेयक पर व्यक्त की जा रही आशंकाओं के बारे में कुमार कहते हैं, ''सरकार ने अभी सिर्फ मसौदा जारी किया है. इस पर 11 दिसंबर तक सुझाव मांगे हैं. जिन विषयों को लेकर किसी को ऐतराज है, वह अपने सुझाव दे सकता है. सरकार बीजों की गुणवत्ता पक्की करने के लिए कानून ला रही है तो जाहिर है कि इसमें किसानों के हितों को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाएगी.''
है क्या बिल में
> सार्वभौमिक पंजीकरण: सभी नई किस्मों का अनिवार्य पंजीकरण और मौजूदा किस्मों के लिए डीम्ड रजिस्ट्रेशन होगा ताकि ग्रे मार्केट बंद हो सके.
> ट्रेसेबिलिटी और डिजिटल निगरानी: बीज लॉट की स्कैनिंग आइडेंटिटी होगी जिससे किसान काउंटर पर ही प्रामाणिकता जांच सकेंगे और खराब लॉट तेजी से ट्रेस हो सकेंगे.
> कठोर दंड: नकली या गैर-पंजीकृत बीज बेचने पर 30 लाख रुपए तक जुर्माना और तीन साल तक की कैद का प्रावधान.
> मुआवजा तंत्र: अगर किसान पंजीकृत बीज का इस्तेमाल कंपनी के बताए अनुसार करता है फिर भी बीज नाकाम होता है तो मुआवजे का प्रावधान होगा.
> आयात उदारीकरण: स्थानीय किसानों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करते हुए वैश्विक किस्मों को आसानी से भारत लाने का प्रावधान.
> कीमत नियंत्रण: आपात स्थिति में कीमतों पर नजर रखकर इन्हें नियंत्रित करने के लिए सरकार कदम उठा सकती है.

