चार साल के आरव मेनन ने अपने बेंगलूरू स्थित अपार्टमेंट परिसर में खेलना शुरू ही किया था कि कुछ ही मिनटों के बाद उसकी सांस फूलने लगी लेकिन उसके माता-पिता ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया.
उनका तर्क था, ''आरव आमतौर पर अपनी उम्र के बच्चों से बस थोड़ा ज्यादा स्वस्थ है.'' आखिरकार जब उन्होंने उसका वजन मापा तो वह पूरे 28 किलो का निकला. अस्पताल में डॉक्टरों ने पाया कि न सिर्फ उसका वजन ज्यादा है बल्कि उसका इंसुलिन स्तर भी बढ़ा हुआ है.
आइटी में काम करने वाले उसके पिता रोहन मेनन कहते हैं, ''हमें लगा था कि वह बस अच्छे से खाता-पीता है. मैंने कभी नहीं सोचा था कि इस उम्र में मोटापा एक मेडिकल इमरजेंसी बन सकता है.''
आरव की कहानी असामान्य भले ही लगे लेकिन यह भारतीय घरों में चुपके-चुपके पैर फैलाती एक महामारी को इंगित करती है. एक लंबे समय तक कुपोषण की समस्या से जूझते रहे देश में अब दूसरा पहलू यानी अतिपोषण एकदम आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ रहा है. चूंकि बच्चों के विकास क्रम में उनकी लंबाई और वजन दोनों बढ़ते हैं, इसलिए इस पर नजर रखना बेहद मायने रखता है.
लंबाई बढ़े बिना ही वजन में वृद्धि खतरे की घंटी हो सकती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के बाल विकास मानकों के मुताबिक, पांच साल से कम उम्र के बच्चे को तब ज्यादा वजन वाला माना जाता है जब उसकी लंबाई के हिसाब से वजन का स्कोर उसकी उम्र के स्वस्थ औसत से दो कदम (+2 मानक विचलन या एसडी) ज्यादा हो, और उसे मोटा तब माना जाता है जब यह तीन कदम (+3 एसडी) ज्यादा हो. इसलिए जरूरी है कि किसी बच्चे के विकास के बारे में जानने के लिए उसके हावभाव या परिवार की धारणा के बजाए बाल रोग विशेषज्ञ से नजर रखना ज्यादा विश्वसनीय होता है.
हाल ही के आंकड़े बताते हैं कि शुरुआत में ही सतर्कता बरतना जरूरी क्यों है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (एनएफएचएस-5) पर आधारित 2024 के कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस अध्ययन में पाया गया कि कई राज्यों में पांच वर्ष से कम उम्र के ज्यादा वजनी बच्चों का अनुपात करीब दोगुना हो गया है, जो पहले के दौर के 1.9 फीसद की तुलना में करीब 4 फीसद पर पहुंच गया है. यूनिसेफ-डब्ल्यूएचओ-विश्व बैंक के संयुक्त बाल कुपोषण अनुमान (2025) के मुताबिक, राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 3.5 फीसद है, जो दो दशक पहले 1.5 फीसद था. उम्र और समृद्धि के साथ जोखिम गहरा रहा है. इंडियन जर्नल ऑफ एंडोक्राइनोलॉजी ऐंड मेटाबोलिज्म ने 2024 की समीक्षा में 2007 से 2022 के बीच किए गए 21 अध्ययनों का विश्लेषण किया गया, जिसमें 5-18 वर्ष की आयु के लगभग 71,500 स्कूली बच्चे शामिल थे. इसमें पाया गया कि निजी स्कूलों में ज्यादा वजन और मोटापे की संयुक्त दर 14 फीसद से ज्यादा है जो सरकारी स्कूलों में दर्ज 7.2 फीसद दर की तुलना में करीब दोगुनी थी. कभी पाश्चात्य बीमारी माना जाने वाला बचपन का मोटापा अब भारत में सबसे तेजी से बढ़ते स्वास्थ्य खतरों में एक बन रहा है.
दिल्ली के साकेत स्थित मैक्स सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल में पीडियाट्रिक एंडोक्रिनोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ. गणेश जेवालीकर इस स्थिति को 'बेहद चिंताजनक' करार देते हैं क्योंकि 'एडिपोसिटी रिबाउंड' यानी उम्र का वह पड़ाव जब बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआइ) और शरीर का वसा फिर बढ़ने लगता है, पहले करीब छह या सात वर्ष हुआ करता था. जेवालीकर कहते हैं, ''अब इसकी उम्र घट रही है. कम उम्र में ज्यादा वजन वयस्क होने पर मोटापे और मेटाबोलिक सिंड्रोम के खतरे को बढ़ा देता है. लोगों में गैर-संचारी रोग बढ़ना और कम उम्र में इनका शिकार होना भी बचपन के मोटापे का सीधा नतीजा है.''
यह सब कहां से शुरू हुआ
एक ऐसे देश में जहां कभी बच्चों की सेहत को उनके शरीर को मिलने वाली कैलोरी के आधार पर मापा जाता था, अब स्थिति उलट गई है. अब कैलोरी पर नियंत्रण की जरूरत महसूस की जाने लगी है. जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे स्पष्ट तौर पर महामारी का रूप लेती एक समस्या मान रहे हैं, जिसमें कई बार तो एक परिवार में ही कुपोषण और मोटापा एक साथ नजर आता है.
खामोशी से बढ़ती बच्चों की इस समस्या का कारण क्या है? दरअसल, इसकी जड़ें बच्चे के पहला कदम रखने और यहां तक कि कई बार उनके पहली बार सांस लेने से भी बहुत पहले पनपने लगती हैं. कई माताओं का वजन गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक बढ़ जाता है या वे गर्भावधि डायबिटीज की शिकार हो जाती हैं और भ्रूण भी बढ़े ग्लूकोज और इंसुलिन स्तर के संपर्क में आने लगता है. यह स्थिति जीवनभर के लिए मेटोबोलिक या चयापचय प्रणाली पर गंभीर असर छोड़ जाती है. मोटे होने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है. दिल्ली स्थित स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अनीता गुप्ता कहती हैं, ''परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट, मीठे पेय और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से भरपूर मातृ आहार शिशुओं में ज्यादा वजन और ज्यादा वसा की समस्या का कारण बन सकता है. ऐसे शिशुओं का वजन कम उम्र में तेजी से बढ़ता है, जो जन्म से पहले ही पोषण संबंधी प्रभाव का संकेत देता है. भारत में यह सब लगातार बढ़ता नजर आ रहा है.''
जन्म के बाद अगर खानपान संबंधी आदतें स्वास्थ्यकर न हों तो समस्या और गहरा जाती है. पहले दो वर्षों में तेजी से वजन बढ़ना, खासकर उन बच्चों में जिन्हें उच्च प्रोटीन वाला फॉर्मूला दिया जाता है या जो ज्यादा दूध पीते हैं, आगे चलकर मोटापे के खतरे को और बढ़ा देता है. डॉ. गुप्ता कहती हैं, ''नवजात शिशुओं को जरूरत से ज्यादा दूध पिलाना आम बात है. कई माताएं लंबे समय तक स्तनपान कराती रहती हैं, जबकि एक बार में 20 मिनट पर्याप्त है. लंबे समय तक या लगातार दूध पिलाने से उल्टी, नींद में खलल और अतिरिक्त कैलोरी पहुंचने का खतरा बढ़ सकता है.'' वे कहती हैं, लिहाजा शिशुओं को खुद दूध पीने और आंतरिक भूख या तृप्ति नियंत्रित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.
बाल रोग विशेषज्ञों का कहना है कि यह पैटर्न अक्सर माता-पिता की चिंताओं और धारणाओं से उपजते हैं. डॉ. जेवालिकर के मुताबिक, ''एक गोल-मटोल शिशु प्यारा या सेहतमंद माना जाता है. लेकिन वजन, बीएमआइ और अन्य चयापचय मापदंड जैसे रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर या रक्त शर्करा का संबंध बचपन से वयस्कता तक बना रहता है. एक मोटे बच्चे के वयस्क होने पर मोटापे के शिकार होने की संभावना अधिक होती है.''
आधुनिक जीवनशैली इन जोखिमों को और बढ़ा देती है. देर रात का खाना, शर्करायुक्त स्नैक्स और अत्यधिक स्क्रीन टाइम से शारीरिक गतिविधि कम हो जाती है और नींद का चक्र बिगड़ जाता हैं—और ये दोनों ही चयापचय को दुरुस्त रखने में महत्वपूर्ण निभाते हैं. दिल्ली स्थित मणिपाल इंस्टीट्यूट ऑफ मिनिमल एक्सेस, बैरिएट्रिक, जीआइ ऐंड रोबोटिक सर्जरी के अध्यक्ष डॉ. संदीप अग्रवाल का कहना है, ''मोटापे से जुड़े ज्यादातर मामलों में नींद एक अहम पहलू होती है. जिन शिशुओं को पर्याप्त या अच्छी नींद नहीं मिलती, उनमें भूख बढ़ाने वाले हॉर्मोन का स्तर ज्यादा होता है और उनका वजन ज्यादा तेजी से बढ़ता है. बदकिस्मती से अनियमित नींद और देर तक न सोने की आदत अब छोटे बच्चों में भी आम हो गई है.''
दो छोटे बच्चों का मामला दर्शाता है कि यह समस्या कितनी गंभीर होती जा रही है. पुणे की अनाया सिंह का वजन 4.2 किलो था और शर्करायुक्त सीरियल्स (अनाज) उसका मुख्य भोजन था. जब उसके माता-पिता वर्क फ्रॉम होम कर रहे होते तो वह घंटों कार्टून देखा करती थी. तीन वर्ष की उम्र में उसका वजन 18 किलो हो गया और फैटी लिवर के शुरुआती संकेत दिखाई देने लगे. नोएडा के ढाई साल के तरन को उसके दादा-दादी गोलू-मोलू देख जमकर प्रेम उड़ेलते थे. उसे हर दो घंटे में दूध की बोतलें और दिनभर क्रीम बिस्कुट दिए जाते थे. उसका स्क्रीन टाइम उसके खेलने के समय से कहीं ज्यादा था. जब उसके प्रीस्कूल टीचर ने लगातार प्यास और कम ध्यान देने की आदत देखी, तो ब्लड टेस्ट कराया गया, जिसमें लिवर एंजाइम्स में वृद्धि का पता चला.
मुंबई के वॉकहार्ट अस्पताल में डायबिटीज ऐंड बैरिएट्रिक सर्जन डॉ. रमन गोयल कहते हैं, ''दशकों से भारत में विज्ञापन और शिशु-आहार विपणन रणनीति ने एक गोल-मटोल शिशु की छवि को सेहतमंद बच्चे की आदर्श छवि के तौर पर सामने रखा है. यह छवि सांस्कृतिक मानस का हिस्सा बन चुकी है. लेकिन शैशवावस्था में अधिक वजन अच्छी सेहत के बजाए मेटाबोलिज्म संबंधी समस्या का प्रारंभिक संकेतक हो सकता है.'' वे यह भी कहते हैं कि कई माता-पिता शुरुआती मोटापे को गंभीर नहीं मानते या फिर नजरअंदाज कर देते हैं. उनके मुताबिक, ज्यादातर तो यह सोचते भी नहीं कि शिशु का वजन ज्यादा हो सकता है. लेकिन बच्चे के शरीर प्रत्येक कैलोरी उसे खिलाने वाले वयस्क की ही देन होती है.''
दिनचर्या में बदलाव जरूरी
बड़े बच्चों के लिए जीएलपी-1 एगोनिस्ट जैसी नई मोटापा-रोधी दवाओं का दुनियाभर में परीक्षण हो रहा है लेकिन विशेषज्ञ इस पर सहमत हैं कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों का सबसे अच्छा इलाज पर्यावरण और दिनचर्या में ही छिपा है (देखें: आदतें और उपाय). डॉ. अग्रवाल का कहना है, ''ज्यादातर छोटे बच्चों में मोटापे का कोई निश्चित चिकित्सा उपाय नहीं है. अत्यंत गंभीर मामलों में सर्जरी एक जीवन रक्षक उपाय बन जाती है...लेकिन यह असाधारण परिस्थितियों में ही की जाती है. निरंतर व्यावहारिक उपाय अपनाना ही सबसे कारगर है. व्यवस्थित दिनचर्या, ठीक से भोजन, पर्याप्त नींद लेने और खेल-कूद जैसी शारीरिक गतिविधियों से बेहतर कुछ नहीं है. पारिवारिक स्तर पर आदतें बदलना किसी भी इलाज से कहीं ज्यादा प्रभावी है.''
प्रमाण इसकी पुष्टि भी करते हैं. चिकित्सा विज्ञान पत्रिका क्यूरियस ने भारतीय रोकथाम रणनीतियों की 2024 की समीक्षा में पाया कि स्कूल जाने की उम्र से पहले पोषण परामर्श, सक्रिय खेलकूद और स्क्रीन-टाइम में कमी को मिलाकर एक बहुआयामी दृष्टिकोण व्यवहार्य और प्रभावी है. नीतियां जंक फूड के विपणन पर अंकुश लगाने, खेल के स्थानों को सुधारने और माता-पिता को शिक्षित करने में मददगार हो सकती हैं. लेकिन बड़ा बदलाव तभी होगा जब इसकी शुरुआत घर पर ही हो.
सबसे अच्छी बात यह है कि छोटे बच्चे जल्दी सीखते हैं. उनका जैविक विकास अनुकूलनशील होता है और आदतें बदलने में उनमें एक लचीलापन होता है. शुरुआत में ही कोशिश की जाए, खासकर स्कूल जाना शुरू करने से पहले, तो नतीजे स्थायी असर दिखा सकते हैं. अंतत: सफलता को सिर्फ पैमाने पर ही नहीं मापा जा सकेगा, बल्कि यह बच्चे की स्वस्थ सांसों, ऊर्जा, आत्मविश्वास और आनंद के साथ खेलने-कूदने में नजर आएगी. ऐसा बचपन किसी अतिरेक से नहीं, बल्कि संतुलन से परिभाषित होगा.
आदतें और उपाय -
बच्चों को मोटा बना रही रोजमर्रा की आदतें और उनसे निबटने के कुछ आसान उपाय
आदत: रात में बोतल से दूध पीने की आदत बच्चों में थोड़ा बड़े होने तक भी बनी रहती है
उपाय: अगर डॉक्टर ने न कहा हो तो 18-24 माह की उम्र तक बोतल से दूध पिलाना बंद कर दें
आदत: बच्चे नियमित भोजन के बजाए दिनभर कुछ न कुछ 'खाते' रहते हैं
उपाय: व्यवस्थित तरीका अपनाएं: तीन बार पूरा भोजन दें और बस दो बार नाश्ता कराएं
आदत: खाने की जगह शक्कर मिला दूध और जूस पीना पसंद करते हैं
उपाय: तरल चीनी की जगह फल और सादा दही दें
आदत: स्क्रीन पर अधिक समय के कारण नींद में खलल पड़ता है
उपाय: स्वस्थ नींद के लिए बेडरूम को स्क्रीन से मुक्त रखें
आदत: कम गतिविधियां, बैठे-ठाले समय गुजरने में रुचि
उपाय: रोजाना शारीरिक गतिविधि को प्रोत्साहित करें, भले ही जगह कितनी भी छोटी क्यों न हो

