
दशकों इंतजार के बाद पूरी तरह 'मेड इन इंडिया’ फाइटर जेट इंजन बनाने का भारत का सपना आखिरकार पूरा हो सकता है. नई दिल्ली और पेरिस एक अत्याधुनिक लड़ाकू जेट इंजन संयुक्त रूप से विकसित करने की तैयारी में हैं. ये ऐसी परियोजना है जो भारत को हाइ-थ्रस्ट इंजन तकनीक तक पहुंच वाले विशिष्ट देशों में शामिल करा सकती है.
टर्बाइन अनुसंधान प्रतिष्ठान (जीटीआरई,) जो रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) का हिस्सा है, के विशेषज्ञ फ्रांस के सफ्रान एयरक्राफ्ट इंजन के साथ संयुक्त रूप से 120-140 केएन (किलोन्यूटन) श्रेणी के इंजन के डिजाइन और निर्माण को लेकर बातचीत के अग्रिम चरण में हैं.
यह भारत के 5वीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर, डबल इंजन वाले एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एएमसीए) और एयरक्राफ्ट कैरियर के लिए डबल इंजन वाले डेक-आधारित फाइटर (टीईडीबीएफ) को शक्ति देगा.
करीब 100 इंजनों के लिए यह सौदा 7 अरब डॉलर (62,149 करोड़ रुपए) के आसपास होने का अनुमान है. केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने टेक्नोलॉजी के 100 फीसद ट्रांसफर के साथ इंजन के साझा रूप से डिजाइन, विकास, परीक्षण और उत्पादन को लेकर सफ्रान के साथ साझेदारी की. यह महत्वपूर्ण घोषणा रक्षा मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के उस संबोधन के ठीक एक हक्रते बाद की थी, जिसमें उन्होंने भारतीय प्रतिभाओं से स्वदेशी जेट इंजन बनाने की अपील की थी.
हालांकि, सफ्रान के साथ प्रस्तावित साझेदारी प्रधानमंत्री के आह्वान के मुताबिक पूरी तरह आत्मनिर्भर या स्वदेशी नहीं हो सकती, फिर भी यह उस दिशा में एक कदम है जिसे आगे बढ़ाने का सैद्धांतिक निर्णय लिया जा चुका है. प्रस्ताव को अंतिम अनुमोदन के लिए सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति के समक्ष रखे जाने से पहले अंतर-रक्षा और अंतर-मंत्रालयी मंजूरियों का इंतजार किया जा रहा है. एएमसीए के 2035 तक उत्पादन के लिए तैयार होने की उम्मीद है. कुल मिलाकर, भारत को 2035 तक अपने लड़ाकू विमान कार्यक्रमों के लिए लगभग 1,100 इंजनों की आवश्यकता होगी.

एएमसीए इंजन के विकास के लिए सफ्रान को साझेदार के तौर पर चुनने का निर्णय कई अंतरराष्ट्रीय एयरोस्पेस कंपनियों के साथ विचार-विमर्श के बाद लिया गया. हालांकि ब्रिटेन की रॉल्स-रॉयस भी दावेदारी में थी लेकिन अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक (जीई) की जगह लेने के लिए सफ्रान पर भरोसा जताया गया. अन्य दो स्वदेशी लड़ाकू जेट विमान हल्के फाइटर विमानों (एलसीए) तेजस एमके-1ए और तेजस एमके-2 के इंजन जीई निर्मित हैं और इसमें प्रगति असंतोषजनक रही है.
जीई इंजन की सप्लाइ अनुमानित समयसीमा से पीछे चल रही है, जिसकी वजह से तेजस कार्यक्रम बाधित हो रहा है. एचएएल अपने तेजस एमके-1ए लड़ाकू जेट विमानों के लिए जीई एयरोस्पेस से जीई एफ404-आइएन20 इंजन खरीदने की प्रक्रिया में है, जिसके लिए 2021 में 99 इंजनों के लिए 5,375 करोड़ रुपए का सौदा हुआ था और 113 इंजनों के लिए 1 अरब डॉलर (8,559 करोड़ रुपए) के सौदे पर जल्द हस्ताक्षर होने की उम्मीद है.
हालांकि सप्लाइ मार्च 2023 में शुरू होनी थी, जीई एयरोस्पेस ने इस साल चार इंजन उपलब्ध कराए हैं. नतीजतन, भारतीय वायु सेना को सौदे के तहत शुरुआती 83 एमके-1ए में से एक की भी आपूर्ति नहीं हो पाई है. जीई ने देरी के लिए ग्लोबल सप्लाइ चेन में व्यवधान को जिम्मेदार ठहराया है, जिसके कारण भारत को कंपनी पर जुर्माना लगाना पड़ा है.
इसके अलावा, एचएएल और जीई के बीच 98 किलोन्यूटन थ्रस्ट श्रेणी में 80 फीसद टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के साथ भारत में जीई-एफ414 इंजनों के सह-उत्पादन के लिए बहुप्रचारित 1.5 अरब डॉलर (13,317 करोड़ रुपए) के सौदे के व्यावसायिक पहलुओं पर बातचीत अभी जारी है. जीई-414 का इस्तेमाल तेजस एमके-2 लड़ाकू विमान के साथ-साथ एएमसीए के पहले बैच में भी किया जाना है. बताया जा रहा है कि भारत की तरफ से लगाए गए जुर्माने ने बातचीत को जटिल बना दिया है.
एक एयरोइंजन वैज्ञानिक का कहना है कि जीई एफ-414 इंजन एएमसीए और तेजस एमके-2 दोनों के लिए पूरी तरह उपयुक्त नहीं होगा. उनके मुताबिक, ''एएमसीए को 120 किलोन्यूटन थ्रस्ट वाले इंजन के लिए डिजाइन किया गया है.’’ इस तरह, जीई एफ-414, तेजस एमके-2 के लिए पर्याप्त नहीं होगा जो 15-18 टन रेंज वाला एक मध्यम-भार वाला लड़ाकू विमान है और पांच टन का लड़ाकू पेलोड ले जा सकता है.
एक और मुद्दा जीई एफ-414 से जुड़े नए सौदे के खिलाफ जाता है. वैसे, एलसीए एमके-2 और शुरुआती एएमसीए के लिए बने जीई एफ-414 के मामले में 80 फीसद टेक्नोलॉजी ट्रांसफर तय है. फिर भी भारतीय डिजाइनर अच्छी तरह जानते हैं कि पिछले 15 साल में भारत को करीब 20 अरब डॉलर (1.77 लाख करोड़ रुपए) मूल्य की रक्षा सामग्री बेचने के बावजूद अमेरिकी उच्च-स्तरीय तकनीक साझा करने से कतराते रहे हैं. लेकिन भारत को विभिन्न प्रकार के सैन्य उपकरण प्रदान करने वाला फ्रांस अपनी रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने का इच्छुक है.
सफ्रान भारत के साथ जो इंजन विकसित करेगा, वह राफेल में इस्तेमाल 75 केएन इंजन एम-88 का अधिक शक्तिशाली संस्करण होगा. इसके अलावा सफ्रान असेंबली लाइन, परीक्षण सुविधाओं से लेकर जटिल धातु विज्ञान में मदद करने तक डीआरडीओ/एचएएल के साथ पूरी जानकारी साझा करेगा. खास बात यह है कि सभी पुर्जे भारत में ही बनेंगे.
हालांकि, 'टेक्नोलॉजी ट्रांसफर’ अक्सर वादों के अनुरूप पूरा नहीं होता. बतौर उदाहरण, एचएएल और सफ्रान 2003 से एक समान अनुबंध के तहत विभिन्न भारतीय हेलिकॉप्टरों के लिए शक्ति इंजन का संयुक्त उत्पादन कर रहे हैं. लेकिन फुल 'टेक्नोलॉजी ट्रांसफर’ के बावजूद 50 फीसद से भी कम पुर्जे भारत निर्मित होते हैं. रूस के साथ सुखोई एसयू-30एमकेआइ कार्यक्रम, जिसमें 60 फीसद स्वदेशी सामग्री का वादा किया गया था, केवल 13 फीसद भारत निर्मित पुर्जों के साथ पूरा हुआ. एक रक्षा वैज्ञानिक कहते हैं, ''जब तक आप मांगेंगे नहीं, मूल उपकरण निर्माता कभी ऐसी चीज साझा नहीं करेगा जिसे विकसित करने में दशकों लगे हों.’’
एक लंबी यात्रा
यह कैसे हो सकता है कि भारत विश्वस्तरीय एटमी पनडुब्बियां और क्रूज/बैलिस्टिक मिसाइलें बना सकता है, लेकिन जेट इंजन नहीं? रक्षा विश्लेषक गिरीश लिंगन्ना बताते हैं कि जेट इंजन का विकास दशकों के शोध, परीक्षण और विफलता के आंकड़ों का नतीजा है. एकदम तेजी से गति पकड़ने या धीमी करने, उच्च तापमान का सामना करने, ध्वनि की गति से कई गुना तेज चलने. और 1,500 डिग्री सेल्सियस तापमान झेलने में सक्षम थर्मल कोटिंग्स बनाने जैसी प्रक्रियाओं में महारत हासिल करने में पश्चिमी देशों को एक लंबा समय लगा है.
भारत ने 1986 में कावेरी इंजन परियोजना शुरू की, जिसका उद्देश्य अपने एलसीए तेजस के लिए एक स्वदेशी जेट इंजन विकसित करना था. जीटीआरई के पूर्व निदेशक टी. मोहन राव कहते हैं कि भारत का स्वदेशी इंजन थ्रस्ट में केवल 10 फीसद कम रह गया. वे कहते हैं, ''एक गैस-टर्बाइन इंजन में लगभग 30,000 घटक होते हैं. यहां तक कि रूस, अमेरिका या फ्रांस जैसे देशों को भी इस तकनीक में महारत हासिल करने में 30 से 35 साल लग गए.’’
उन्होंने कहा कि उस समय भारत में सिंगल-क्रिस्टल टर्बाइन ब्लेड और विशेष बियरिंग जैसी तकनीकें उपलब्ध नहीं थीं और कोई भी देश इन्हें साझा करने को तैयार नहीं था.’’ भारत ने कावेरी के नौ प्रोटोटाइप विकसित किए लेकिन 3,000 करोड़ रुपए की लागत के बावजूद, उनमें से कोई भी लड़ाकू विमान के मानकों पर खरा नहीं उतरा. ये परियोजना 2011 में स्थगित कर दी गई.
इसलिए, सफ्रान के साथ प्रस्तावित सहयोग भारत के एयरोस्पेस उद्योग की एक बड़ी जरूरत है. भारत उन विदेशी सप्लायरों पर निर्भर नहीं रह सकता जो संकट के समय पुर्जे देने से इनकार कर सकते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को सफ्रान से संपूर्ण डिजाइन/बौद्धिक संपदा अधिकार हासिल होने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए बल्कि खुद डिजाइन करना चाहिए. सफलता इस समझौते पर हस्ताक्षर होने में नहीं, इसमें निहित है कि फ्रांसीसी इंजीनियर स्वदेश लौटने से पहले भारत को कितनी तकनीकी ताकत सौंपकर जाएंगे.
हालांकि एएमसीए को इंजन बनाने के लिए सफ्रान के साथ साझेदारी करना जरूरी है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि भारत यह उम्मीद नहीं कर सकता कि कंपनी पूरा डिजाइन या बौद्धिक अधिकार भारत को सौंप देगी.
जेट इंजन: आमने-सामने
जनरल इलेक्ट्रिक का एफ-414 तेजस एमके-2 और एएमसीए के पहले बैच के लिए चुना गया इंजन है. इसके बाद एएमसीए में सफ्रान के साथ सह-विकसित इंजन इस्तेमाल किया जाएगा. दोनों कंपनियां भारत के सामने क्या पेशकश कर रही हैं और ये सौदे किस चरण में हैं?
जनरल इलेक्ट्रिक
● 2023 के समझौते के तहत तेजस एमके-2 और शुरुआती एएमसीए के लिए जीई एफ-414 का निर्माण भारत में किया जाएगा और इसमें 80 फीसद टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा.
● लेकिन सौदे की व्यावसायिक बारीकियों पर अभी काम जारी है.
● एफ-414 एक आक्रटरबर्निंग टर्बोफैन इंजन है जिसमें 97.9 किलोन्यूटन थ्रस्ट है.
● कंपनी 2021 में हुए 5,375 करोड़ रुपए के सौदे के तहत तेजस एमके-1ए लड़ाकू विमान के लिए 99 जीई एफ-404 इंजन मुहैया कराएगी.
● इसने 2025 में केवल चार एफ-404 भेजे हैं, जिसे लेकर भारत ने देरी से आपूर्ति पर जुर्माना लगाया है.
सफ्रान
● डीआरडीओ/ एचएएल और सफ्रान, स्टेल्थ एएमसीए के आधुनिक संस्करण के लिए 120-140 किलोन्यूटन श्रेणी के जेट इंजन का सह-विकास करने की योजना बना रहे हैं, जिसका उत्पादन 2035 तक शुरू हो जाएगा.
● सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की अंतिम मंज़ूरी से पहले प्रस्ताव को अंतर-मंत्रालयी मंजूरी का इंतजार है.
● योजना लगभग 100 इंजनों के लिए 100 फीसद टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की है, सभी पुर्जे भारत में बनेंगे.
● यह इंजन राफेल में इस्तेमाल एम-88 का ज्यादा शक्तिशाली संस्करण होगा.
● सफ्रान ने एचएएल के साथ मिलकर शक्ति हेलिकॉप्टर इंजन विकसित किया है.
● शक्ति में सभी भारतीय पुर्जों को शामिल करने की बात थी लेकिन 50 फीसद से भी कम पूरी तरह स्वदेशी हैं.

