—अरुण पुरी
साल 2024 के बारह महीने उथल-पुथल और बेहद अहम घटनाओं से भरे थे. राजनैतिक रूप से यह साल इससे ज्यादा घटनाओं भरा नहीं हो सकता था. बिल्कुल शुरुआत में ही तीन दशकों की कशमकश खत्म करते हुए अयोध्या में राम मंदिर का प्राण- प्रतिष्ठा समारोह हुआ. साल के ऐन बीचो-बीच आम चुनाव हुए.
तीन महीने तक सारे भारत का ध्यान लंबा वक्त खपाने वाले चुनाव अभियान, सात चरणों में मतदान और फिर नई सरकार के गठन की कसरत चलती रही. नरेंद्र मोदी ने जवाहरलाल नेहरू के बाद लगातार तीसरा कार्यकाल जीतने वाले पहले प्रधानमंत्री बनकर इतिहास रच दिया.
मगर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) साधारण बहुमत से काफी पीछे रह गई और इंडिया उसके दशक भर पुराने दबदबे को खत्म करने के नजदीक पहुंचने वाले विपक्ष के पहले गठबंधन के रूप में खिला. जल्द ही हरियाणा और महाराष्ट्र हारकर इंडिया गुट ने दिखा दिया कि स्थिति उतनी अच्छी भी नहीं जितनी मालूम देती थी. फिर भी सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर समीकरण तो बदल ही गए, जहां भाजपा 2014 और 2019 के विपरीत अब सहयोगी दलों पर निर्भर रहने को विवश है.
सत्ता के इस बदलते तानेबाने में सुर्खियों के सरताज: चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार का पुनर्जन्म हुआ. आंध्र प्रदेश के दिग्गज नेता ने चौथे कार्यकाल के लिए अपना राज्य जीतकर और साथ ही नई दिल्ली में दमदार सहायक भूमिका हासिल कर तकरीबन गुमनामी से हैरतअंगेज वापसी की. बिहार के उनके समकक्ष ने भी उतनी ही हैरतअंगेज कलाबाजी का प्रदर्शन किया. कहां वे इंडिया गुट के संस्थापक हुआ करते थे लेकिन जनवरी में नीतीश ने वह जहाज छोड़ दिया और भाजपा के साथ फिर जुड़कर और चुनाव के बाद बहुमत का निशान पार करने में उसकी मदद कर अपने पूर्व गठबंधन के मुख्य विरोधी बन गए.
दूसरी जगहों पर भी वीर नायकों की कमी न थी. राजनैतिक रूप से इंडिया गुट के तीन नेता इस साल सुर्खियों के सरताज रहे. उमर अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर का दशक भर में पहला और गफलत तथा उलझन में डालने के इरादे से तैयार घालमेल के खिलाफ कठिन चुनाव जीता. हेमंत सोरेन ने जेल की सजा काटी, जिससे उनकी वाक्पटु पत्नी कल्पना आगे आईं और इस जोड़ी ने झारखंड में एनडीए के खिलाफ अपनी जमीन मजबूती से थामे रखी.
ममता बनर्जी ने आर.जी. कर बलात्कार-हत्या के मामले के बाद शायद अपनी सबसे कठिन परीक्षा का सामना किया, लेकिन 2025 में फिर भी उन्हें पश्चिम बंगाल पर अपनी मजबूत पकड़ कायम रखते देखा जाएगा. एक और तिकड़ी महायुति के देवेंद्र फडणवीस-एकनाथ शिंदे-अजित पवार ने सारे पूर्वानुमानों को धता बताते हुए महाराष्ट्र में जबरदस्त जीत हासिल की. अरविंद केजरीवाल ने अपने को अस्तित्व की लड़ाई लड़ते पाया—अगले साल दिल्ली के चुनाव इस पटकथा का फैसला कर देंगे. दूसरों ने भी अपनी छाप छोड़ी: राजनैतिक समझदारी के अपने नसीहत भरे आह्वानों के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने और अपने न्यायशास्त्र के साथ पूर्व प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने.
खेलों ने हमें भर-भरकर दिया. भारतीय क्रिकेट ने 13 साल लंबा सूखा खत्म होते देखा जब रोहित शर्मा की टीम ने रोमांचक फाइनल में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ जीत हासिल करके टी20 ट्रॉफी अपने नाम की. पेरिस ओलंपिक ने हमें और भी खुशियां दीं: जोशोखरोश से भरी मनु भाकर ने निशानेबाजी में ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनकर हमारा दिल जीत लिया. किसी भी भारतीय ने इस साल दुनिया भर में कंसर्ट स्टेडियम उस तरह नहीं भरे जैसे पंजाबी पॉप स्टार दिलजीत दोसांझ ने; हमने उन्हें परेशान कर देने वाली नेपथ्य की राजनीति का हिम्मत और दिलेरी से सामना करते भी देखा.
हमारा ताज अलबत्ता शतरंज के नए राजाओं और रानियों को मिलता है. भारत के युवा ग्रैंडमास्टरों ने इस साल दुनिया की बुलंदी पर पहुंचाकर हमारे सामूहिक गौरव को ऊंचा उठा दिया. गुकेश डोम्माराजू का नाम मैंने कुछ महीनों पहले तक सुना भी नहीं था. वैश्विक मंच पर धूम मचा देने वाले भारत के चमत्कारी बच्चों की फौज के अगुआ गुकेश सबसे युवा विश्व शतरंज चैंपियन होने के नाते इस हफ्ते हमारे आवरण पर हैं.
इससे आपको पता चलेगा कि चेन्नै के इस 18 वर्षीय लड़के का उदय कितना धूमकेतु की तरह रहा, जिसने पांचवीं कक्षा के बाद नियमित स्कूल जाना बंद कर दिया था ताकि चौसठ खानों की बिसात के खेल पर ध्यान दे सके. आपको लगेगा कि यह माइक्रोबायोलॉजिस्ट मां और ईएनटी सर्जन पिता का अपने बेटे के लिए अस्वाभाविक कदम था. मगर यहां तो पिता ने भी तरुण गुकेश को रास्ता दिखाने और उसकी देखभाल करने के लिए अपने करियर को तिलांजलि दे दी. विश्व चैंपियन बनने का उनका सपना सात साल की उम्र में जन्मा जब उन्होंने पथप्रदर्शक विश्वनाथन (विशी) आनंद को अपने ताज का बचाव करते देखा.
हमारी सितारा भूमिकाओं में अर्जुन एरिगैसी (21), आर. प्रज्ञानंद (19) और विदित गुजराती (30) भी हैं, जो सभी ओलंपियाड 2024 की स्वर्ण पदक विजेता टीम में थे, और सभी फिडे के टॉप 20 में हैं. शतरंज का इन दिनों भारत में कुछ ऐसा जुनून है, जो इससे उभरकर आ रही प्रतिभाओं की गहराई में दिखाई देता है. भारत में अब 85 ग्रैंडमास्टर हैं. कभी इस फेहरिस्त में हमारा एक अकेला नाम हुआ करता था: विशी, जो इस नई पौध के रहनुमा हैं.
डिप्टी एडिटर सुहानी सिंह ने चेन्नै में गुकेश का इंटरव्यू किया और उनका अनुशासन, रोज-ब-रोज उनका बेहद थकाऊ शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण, आने वाले सालों में भी शिखर पर बने रहने का उनका फौलादी संकल्प और उम्र से कहीं आगे की उनकी परिपक्वता देखकर वे दंग रह गईं.
विश्व चैंपियनशिप में शतरंज की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाने वालों को उनका करारा जवाब: ''मेरा मानना है कि कोई भी मेरी उस तरह आलोचना नहीं कर सकता जिस तरह मैं खुद अपनी करता हूं." हम इन युवा ग्रैंडमास्टरों को सुर्खियों के सरताज के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, क्योंकि वे दुनिया में सर्वश्रेष्ठ होने के दमखम के साथ कुछ भी कर गुजरने की भावना का अनोखा मेल हैं. इसे शह-मात कहिए!
— अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

