न्यायिक मील के पत्थरों और शांत प्रतीकवाद के पलों से भरपूर इस साल में भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ बेहद अहम बहसों को नए सिरे से गढ़ने वाली शख्सियत के रूप में उभरे, जिसकी गूंज सालों तक सुनाई देगी.
उनके न्यायिक फलसफे के मूल में निष्पक्षता और संवैधानिक नैतिकता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता थी. यह इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार देकर रद्द कर देने वाले उनके ऐतिहासिक फैसले से ज्यादा कहीं और जाहिर नहीं था.
इसे नागरिकों के जानने के अधिकार का उल्लंघन और स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अतिक्रमण करार देकर चंद्रचूड़ के मातहत अदालत ने लोकतंत्र के उस बुनियादी सिद्धांत की तस्दीक की कि पारदर्शिता जवाबदेह सरकार की जीवनी-शक्ति है.
यही लोकाचार उनके आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज बलात्कार मामले से निबटने में भी था, जिसमें सांस्थानिक जवाबदेही पर अदालत के जोर देने से लैंगिक हिंसा के पीड़ितों की रक्षा में न्यायपालिका की भूमिका का महत्व सामने आया.
हालांकि यह कइयों के लिए देर से हुआ, पर 'बुलडोजर न्याय’-न्यायेतर तोड़-फोड़ को बताने के लिए इस्तेमाल शब्द के उभार को संबोधित करते हुए चंद्रचूड़ की पीठ ने कार्यपालिका की शक्ति के बेजा इस्तेमाल पर सवाल उठाए और कानून के शासन के क्षरण के खिलाफ चेतावनी दी.
चंद्रचूड़ की कार्यसूची में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के उपवर्गीकरण सरीखे बेहद जटिल और सूक्ष्म भेद के सवाल भी थे. यहां कोर्ट ने सकारात्मक कार्रवाई के व्यापक ढांचे की रक्षा करते हुए ऐतिहासिक रूप से दरकिनार समूहों के भीतर समानता को संतुलित करने की जरूरत को मान्यता दी.
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक दर्जे पर उनके विमर्श में भी ऐसी ही संवेदनशीलता की झलक मिली, जब उन्होंने समानता के प्रति संवैधानिक प्रतिबद्धता को कमजोर किए बिना सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों का अनुमोदन किया.
उनका न्यायशास्त्र संघवाद और आर्थिक राजकाज के उलझे हुए क्षेत्रों तक फैला था. खदानों और खनिजों पर कर लगाने और औद्योगिक अल्कोहल को विनियमित करने के राज्यों के अधिकार के बारे में चंद्रचूड़ के फैसलों से स्पष्ट हुआ कि भारत की अर्ध-संघीय प्रणाली के भीतर राज्य की स्वायत्तता की सीमाएं क्या हैं.
निजी संपत्ति के स्वरूप पर उनके फैसले ने व्यक्तिगत अधिकारों और सामूहिक कल्याण के बीच विकसित होते तनाव पर गहराई से विचार किया और इस बात की गहरी समझ दी कि शहरी विकास और जमीन अधिग्रहण से जुड़े विवादों के बीच कानून कैसे रास्ता निकाल सकता है.
तो भी 2024 में चंद्रचूड़ को पहले 2022 में ज्ञानवापी मस्जिद की सुनवाई के दौरान कही गई अपनी मौखिक बातों के नतीजों में उलझते देखा गया. उनकी इस टिप्पणी से कि धार्मिक पूजास्थल अधिनियम 1991 धार्मिक स्थलों के 'मूल चरित्र’ की जांच-पड़ताल पर रोक नहीं लगाता, मुकदमेबाजी की नई लहर दौड़ पड़ी.
विवादित मस्जिद स्थल को वापस पाने की याचिका से जुड़ा संभल और अजमेर शरीफ, जहां ऐतिहासिक सूफी दरगाह की मिल्कियत को लेकर सवाल उठाए गए, लगातार ध्रुवीकृत होती जाती बहस के ज्वलंत बिंदु बन गए. आलोचकों का कहना है कि उनकी टिप्पणियों ने ऐतिहासिक जख्म फिर से खुलने का जोखिम पैदा कर दिया और न्यायपालिका को सामाजिक-धार्मिक विवादों के बीचोबीच ठेल दिया.
न केवल उनके फैसले बल्कि उनकी साफ-दिली और खरापन भी विश्लेषण का विषय बना. उनके उस भाषण ने तीखी बहस छेड़ दी जिसमें उन्होंने खुलासा किया कि अयोध्या का फैसला सुनाने से पहले उन्होंने प्रार्थना की थी. अपने घर पर गणेश पूजा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेजबानी करके भी उन्होंने आलोचनाओं को न्योता दिया. सेवानिवृत्ति के बाद दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने न्यायपालिका और राजनैतिक विपक्ष के बीच बेचैनी भरे रिश्तों पर भी खुलकर बात की और कहा कि ''विपक्ष न्यायपालिका से उसकी भूमिका निभाने की उम्मीद करता है.’’
इस टिप्पणी की व्याख्या व्यापक रूप से दलीय टकरावों में न्यायपालिका को उलझाने की कोशिशों की तीखी आलोचना के रूप में की गई. चंद्रचूड़ की विरासत बौद्धिक दृढ़ता और विभाजित लोकतंत्र के मुद्दों और मतभेदों के साथ निर्भीक रूप से टकराने की विरासत है. इन पेचीदगियों के बीच से रास्ता बनाते हुए वे अपने पीछे ऐसी न्यायपालिका छोड़ गए हैं जो मजबूत भी है और राष्ट्र की लोकतांत्रिक यात्रा में सदैव प्रासंगिक भी.
इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को खारिज कर पूर्व सीजेआइ ने रेखांकित किया कि पारदर्शिता किसी भी सरकार की जीवनी-शक्ति है.
स्पष्टता के साथ किए फैसले
● इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित करने वाला ऐतिहासिक फैसला, जिसने इस बात को रेखांकित किया कि पारदर्शिता लोकतंत्र की आधारशिला है.
● आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज बलात्कार मामले और 'बुलडोजर न्याय’ पर फैसलों ने संवैधानिक जवाबदेही और कार्यपालिका की शक्तियों के दुरुपयोग को प्रमुखता से सामने रखा.
● एससी/एसटी के उपवर्गीकरण और एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे पर गहरे और व्यापक अर्थ वाले फैसले दिए.
● 2022 में ज्ञानवापी मस्जिद मामले की सुनवाई के दौरान की गई पूर्व सीजेआइ की टिप्पणियों से अन्य ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों को लेकर ध्रुवीकृत मुकदमेबाजी का रास्ता खुल गया.
● गणेश पूजा के लिए प्रधानमंत्री मोदी की मेजबानी करने समेत चंद्रचूड़ के कुछ कामों से न्यायिक स्वतंत्रता और पारदर्शिता को लेकर बहसें छिड़ गईं.
● उस भाषण को लेकर भी कुछ भौंहें तनीं जिसमें उन्होंने अयोध्या के फैसले से पहले प्रार्थना करने की बात स्वीकार की.

