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साल 2024 में मोहन भागवत के किस दांव से संभली बीजेपी?

बीजेपी के राजनैतिक एजेंडे को दिशा देने को लेकर भागवत का रुख उनके बयानों से साफ झलकता है

मोहन भागवत
मोहन भागवत
अपडेटेड 20 जनवरी , 2025

इस साल लोकसभा चुनाव नतीजे काफी अप्रत्याशित रहे. बीजेपी की सीटें 303 से फिसलकर 240 पर पहुंचने और मोदी सरकार का प्रभाव घटने से राजनैतिक विमर्श में एक संभावित बदलाव का संकेत मिला. ऐसे में विपक्ष की तरफ से हमले होना तो स्वाभाविक था लेकिन असली झटका बीजेपी के वैचारिक गुरु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की तरफ से आलोचनाओं ने दिया. आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक के बाद एक कई टिप्पणियां कीं, जिन्हें लोगों ने बीजेपी नेतृत्व, अभियान की रणनीतियों और यहां तक कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना माना.

भागवत ने कई मोर्चों पर अपनी नाराजगी जाहिर की. उन्होंने कुछ बीजेपी नेताओं की तरफ से इस्तेमाल विभाजनकारी बयानबाजी की निंदा की, अभियान का नैरेटिव पूरी तरह मोदी केंद्रित (मोदी की गारंटी) रखे जाने पर असहजता जताई, और आरएसएस से जुड़े संगठनों के फीडबैक पर ध्यान न दिए जाने की कड़ी आलोचना की. उन्होंने बीजेपी के साथ वैचारिक समानता न रखने वालों को पार्टी में शामिल करने पर भी सवाल उठाए. भागवत अपने पूर्ववर्तियों की ही तरह नपे-तुले अंदाज में मुखर आलोचना के लिए जाने जाते हैं.

जुलाई में झारखंड के गुमला में ग्राम स्तर पर कार्यकर्ताओं की एक बैठक के दौरान उन्होंने जो टिप्पणी की उसे किसी तीखी फटकार से कम नहीं मान सकते. उन्होंने कहा, "फिल्मों में दिखाते हैं कि सुपरमैन के पास असाधारण शक्तियां होती हैं. इन्हें देखकर इंसान ऐसी शक्तियां प्राप्त करना चाहता है...लेकिन यहीं नहीं रुकता. वह फिर देव बनना चाहता है. और देवता कहते हैं कि भगवान हमसे बड़े हैं, इसलिए वह भगवान बनने की कोशिश करने लगता है." संघ के अंदरूनी सूत्रों ने इन शब्दों को परोक्ष रूप से मोदी की आलोचना बताया जिनके व्यक्तित्व को हर स्तर पर महिमामंडित किया जा रहा था.

संगठन के भीतर कई लोगों की राय में भागवत ने यह बयान देकर सामूहिक भावना के साथ काम करने पर जोर दिया. एक वरिष्ठ प्रचारक ने उन्हें स्वयंसेवकों की 'अंतरात्मा की आवाज' बताया, जिनमें से कई चुनाव के दौरान बीजेपी कार्यकर्ता के तौर पर भी काम करते हैं.

भागवत की आलोचनाओं का ठोस असर दिखा. बीजेपी को आखिरकार अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव करना पड़ा, सिर्फ और सिर्फ मोदी पर ध्यान केंद्रित करने के बजाए संघ के एजेंडे को प्राथमिकता मिली. यह बदलाव हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के विधानसभा चुनावों में स्पष्ट दिखा, जहां आरएसएस फिर से मार्गदर्शक की भूमिका के साथ आगे खड़ा था. हालांकि, कुछ लोगों ने इसकी तुलना 'प्रेमी जोड़े के झगड़े' से की, जिसमें बीजेपी और आरएसएस ने आपसी टकराव के बाद एक नया संतुलन स्थापित कर लिया था.

इस सुलह प्रक्रिया के संकेत प्रतीकात्मक और व्यावहारिक दोनों ही तरह से नजर आए. सरकारी कर्मचारियों को आरएसएस कार्यक्रमों में भाग लेने से रोकने वाले पांच दशक पुराने परिपत्र को रद्द करने के केंद्र के फैसले को उसकी तरफ से सद्भावना का संकेत माना गया. वहीं, संघ ने बीजेपी नेताओं के साथ फिर संपर्क साधा और विभिन्न राज्यों में मतभेद दूर करने तथा चुनावी रणनीतियों में सक्रिय भागीदारी के लिए अपने प्रमुख पदाधिकारियों को तैनात किया. संघ के शीर्ष नेता सुरेश सोनी बीजेपी नेताओं के साथ मिलकर उनके नए प्रमुख के चयन की प्रक्रिया आगे बढ़ा रहे हैं.

बीजेपी के राजनैतिक एजेंडे को दिशा देने को लेकर भागवत का रुख इसी महीने उस बयान से साफ झलका, जिसमें उन्होंने धार्मिक विवादों को फिर भड़काने के खिलाफ चेताया और इस पर जोर दिया कि राम मंदिर भले ही आस्था का विषय है लेकिन आगे और संघर्षों से बचा जाना चाहिए. यह जाति, पंथ और भाषा के विभाजन से परे हिंदुओं के बीच एकजुटता पर जोर देने के उनके एजेंडे से मेल खाता है और संघ के 'हिंदू राष्ट्र' के दीर्घकालिक दृष्टिकोण को भी रेखांकित करता है.

आरएसएस प्रमुख भागवत ने चुनावी राजनीति से परे सांस्कृतिक मोर्चे पर भी उतने ही सशक्त ढंग से हस्तक्षेप किया. अक्तूबर में उन्होंने ओटीटी प्लेटफॉर्मों की सामग्री को 'नैतिक भ्रष्टाचार' की जड़ बताते हुए इसकी कड़ी आलोचना की, जिसने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इस पर नियंत्रण की दिशा में कदम उठाने पर विचार करने के लिए प्रेरित किया. यह उन लोगों के खिलाफ उनके व्यापक अभियान के अनुरूप ही है जिन्हें वे 'सांस्कृतिक मार्क्सवादी और 'सक्रिय लोग' कहते हैं, और जिन पर भारत की शिक्षा और संस्कृति को कमजोर करने, संघर्ष भड़काने और सामाजिक सामंजस्य को बाधित करने का आरोप लगाते हैं.

भागवत की तरफ से भारत की जनसंख्या नियंत्रण नीतियों की समीक्षा का आह्वान किया जाना उनके फिर से बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है, और इसने नीतिगत हलकों में नई बहस को जन्म दिया है. यही नहीं, यह अपने राजनैतिक सहयोगी पर आरएसएस प्रमुख के वैचारिक प्रभाव को भी पुष्ट करता है.

वैचारिक वर्चस्व

› भागवत ने बीजेपी के मोदी-केंद्रित अभियान, विभाजनकारी बयानबाजी और आरएसएस के फीडबैक की अनदेखी किए जाने की खुलकर आलोचना की, जिसे संघ परिवार के भीतर बढ़ते तनाव का संकेत माना गया.

› उनकी टिप्पणियों ने बीजेपी को फिर अपने लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करने, चुनावी रणनीतियों में आरएसएस की प्राथमिकताएं शामिल करने और परस्पर मेल-जोल को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया.

› सांस्कृतिक एकता पर जोर देते हुए उन्होंने ओटीटी पर परोसी जा रही सामग्री को 'नैतिक भ्रष्टाचार' की जड़ बताया और इसकी कड़ी आलोचना की. साथ ही जनसंख्या नियंत्रण पर बहस फिर से तेज कर दी.

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