—अरुण पुरी
भारत में राजनीति को कभी सांस लेने की फुर्सत ही नहीं मिलती. लोकसभा चुनाव के चार महीने बाद अक्तूबर के आरंभ में जम्मू-कश्मीर के साथ हरियाणा में मतदान हुआ. वैसे ये विधानसभा चुनाव अपेक्षाकृत छोटे थे लेकिन क्षेत्रीय मैदान से इतर राजनीति की दशा-दिशा को व्यापक स्तर पर प्रभावित करने वाले साबित हुए. खासकर हरियाणा ने तो इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया कि भाजपा की धार अब कुंद पड़ने लगी है.
अपनी रणनीति पर कड़ी मेहनत करके टीम मोदी ने साबित कर दिया कि वह किसी भी मोर्चे पर लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है और माहौल प्रतिकूल होने पर तो और बेहतर नतीजे के साथ चौंकाने की ताकत रखती है. शानदार जनादेश हासिल होने से टीम मोदी को आगे के मोर्चों के लिए ताकत मिली है. अपने पक्ष में बने इस माहौल के साथ वह विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक से राष्ट्रीय स्तर की राउंड-रॉबिन लीग यानी सभी महारथियों से अलग-अलग मोर्चा लेने को पूरी तरह तैयार है.
प्रतिष्ठा फिर दांव पर है और जीतने वाले के खाते में आएगा एक बड़ा राज्य—महाराष्ट्र. वहीं, झारखंड में भी दो चरणों में मतदान होना है—पहला 13 नवंबर को और फिर 20 नवंबर को महाराष्ट्र में होने वाले मतदान के साथ. तीन दिन बाद, चुनाव नतीजे हमारे सामने होंगे और ये बहुत ज्यादा खास भी होंगे.
महाराष्ट्र 288 विधानसभा सीटों के साथ एक वृहद चुनावी क्षेत्र है, जहां पिछले 30 साल से केवल गठबंधन सरकारों का दौर जारी है. राजनैतिक समीकरण यहां इतने उलझे हैं कि भाजपा ही नहीं, मैदान में उतरने वाले किसी प्रमुख खिलाड़ी के लिए अपने दम पर जीत हासिल करना मुश्किल है. सीधे तौर पर देखें तो यह सत्तारूढ़ महायुति और विपक्षी गठबंधन महा विकास अघाड़ी (एमवीए) के बीच वर्चस्व की लड़ाई है.
महायुति का केंद्र तो भाजपा है, और साथ दे रहे हैं दो दलों से टूटे गुट—मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे-नीत शिवसेना और उपमुख्यमंत्री अजित पवार-नीत राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी). वहीं, एमवीए इन दोनों दलों के दूसरे गुटों यानी उद्धव ठाकरे-नीत शिवसेना (यूबीटी) और शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी (एसपी) के साथ कांग्रेस का गठबंधन है.
यह कहना गलत नहीं होगा कि दोनों ही गठजोड़ कुछ हद तक अव्यवस्थित हैं, क्योंकि इनके गठन का आधार विचारधारा से ज्यादा राजनैतिक निहितार्थ साधने पर टिका है, और यही वजह है कि आंतरिक टकराव भी आम बात है. विरोधी गठबंधन के साथ कड़ी प्रतिद्वंद्विता और दुश्मनी का साझा भाव उन्हें एक-दूसरे से बांधे रखता है. यह बैर-भाव 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद उपजा और वहीं से रिश्तों में खटास आई. हम एक ऐसी लड़ाई के गवाह बन रहे हैं जो कई व्यक्तिगत पहलुओं को समेटे है.
मान सकते हैं कि कई व्यक्तिगत मोर्चों की जंग के साथ यह एक मल्टी-स्टार कास्ट कैनवास भी है. खुद को शिवसेना की विरासत का असली हकदार साबित करने के लिए उद्धव ठाकरे की प्रतिष्ठा दांव पर है, जो शिंदे के साथ सीधे मुकाबले में घिरे हैं. शरद पवार भतीजे अजित की तरफ से उपजा खतरा हमेशा के लिए खत्म करना चाहते हैं और एनसीपी को फिर अपने कब्जे में लेना चाहते हैं. सत्ता तक पहुंचे मामूली मोहरे के तौर पर देखे जाने वाले शिंदे ने खुद को चतुर खिलाड़ी साबित किया है.
लोकसभा चुनाव में उन्होंने यह धारणा खारिज कर दी कि लोकप्रिय सहानुभूति उद्धव के साथ है. उनकी पार्टी ने 15 सीटों पर चुनाव लड़ा और सात पर जीत हासिल की, उद्धव गुट ने 21 सीटों में से नौ पर जीत दर्ज की. हालांकि, अजित पवार इस मुकाबले में घाटे में रहे और चार में से सिर्फ एक सीट ही ला पाए; एनसीपी (एसपी) 10 में से आठ सीटों पर जीती. वैसे, शरद पवार का रुतबा खत्म नहीं हुआ है और अगर इस मुकाबले में भी गेंद उनके पाले में रही तो भतीजे का सियासी भविष्य अंधेरे में डूबने का खतरा उत्पन्न हो सकता है.
दूसरे डिप्टी सीएम और भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस के लिए अपनी पार्टी का समर्थन ही राह आसान करने वाला है. हालांकि, उन्हें सीएम के अधीन रहकर काम करना पड़ रहा है, इसलिए छवि को नुक्सान जरूर पहुंचा है. वे भी अपनी राजनैतिक प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्षरत हैं.
इसलिए, यह चुनाव चार प्रमुख नेताओं और दो क्षेत्रीय दलों के भविष्य का फैसला करने वाला साबित होगा. लेकिन टीम मोदी और कांग्रेस के लिए तो यह राष्ट्रीय स्तर पर सियासी धारणा बनाने-बिगाड़ने वाली प्रतिस्पर्धा है. कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में राज्य में आश्चर्यजनक प्रदर्शन किया, और 17 सीटों में से 13 पर जीत हासिल की. इसके बलबूते ही वह सीट बंटवारे की बातचीत में सहयोगी दलों पर भारी पड़ने का मंसूबा पाले बैठी थी.
लेकिन हरियाणा चुनाव नतीजों ने फिर उसे हकीकत का आईना दिखा दिया. भाजपा ने 28 में से केवल नौ सीटें जीतीं लेकिन हरियाणा की शानदार जीत ने उसका मनोबल बढ़ा दिया. लोकसभा चुनाव के नतीजों ने जिस लड़ाई को बीच में और अनिर्णीत छोड़ दिया, वह इन चुनावों के साथ फिर जोर पकड़ रही है. इसमें पांच क्षेत्रों में बंटा हर विधानसभा क्षेत्र छोटे-मोटे युद्ध के मैदान में तब्दील हो चुका है.
सीनियर एसोसिएट एडिटर धवल एस. कुलकर्णी ताकत-कमजोरी, अवसर-चुनौती के आधार पर मैदान के हर खिलाड़ी की संभावनाओं का विश्लेषण करके हमें यह बता रहे हैं कि कौन कितने पानी में है. बात चाहे राजनीति की हो या फिर वाणिज्यिक राजधानी मुंबई वाले देश के सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक राज्य की विकास गाथा की, हर हाल में महाराष्ट्र गौरव की भावना दांव पर है. यह दीगर है कि जातिगत राजनीति नतीजों को अप्रत्याशित ढंग से प्रभावित करने वाला एक अन्य पहलू है.
ओबीसी दर्जे के लिए मराठा आंदोलन के खिलाफ उन लोगों ने पहले से ही मोर्चेबंदी शुरू कर दी है, जो इस सूची में शामिल हैं. वहीं, एक बड़ी आबादी वाला धनगर समुदाय आदिवासी दर्जे की मांग कर रहा है. हिंदुत्व का मुद्दा भी अभी काफी कारगर है. हरियाणा में सक्रियता दिखाने वाला आरएसएस महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. मध्य प्रदेश की तरह यहां भी महिलाओं को लुभाने के लिए महायुति ने 46,000 करोड़ रुपए की लाडकी बहिन योजना का इस्तेमाल करने की रणनीति अपनाई है.
देखना होगा कि क्या यह रणनीति सफल रहेगी. दोनों गठबंधनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी बागियों और छोटी पार्टियों के तीसरे मोर्चे से निबटना. वरिष्ठ संपादक अमिताभ श्रीवास्तव हमें झारखंड की सियासी बारीकियों से रू-ब-रू करा रहे हैं, जहां हाल ही में जमानत पर रिहा सीएम हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी ने सियासी लड़ाई को भावनात्मक जंग में बदल दिया है. बहरहाल, एक बात तो तय है कि विधानसभा चुनावों के नतीजे स्वाभाविक तौर पर राष्ट्रीय मंच पर असर जरूर दिखाएंगे.
— अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

