राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने इस बार अपने दशहरा संबोधन में हिंदुओं के संगठित होने की जोरदार अपील की. साथ ही सख्त लहजे में चेताया, दुर्बल बने रहना अपराध है जिसे भगवान भी पसंद नहीं करते. इस वर्ष के शुरू में बांग्लादेशी हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की भयावहता को उन्होंने एक गंभीर उदाहरण के तौर पर सामने रखा, जो बताती है कि समुदाय अगर संगठित नहीं होगा तो अत्याचारों को आमंत्रित करेगा.
इससे ठीक एक हफ्ते पहले, कुछ इसी नक्शेकदम पर चलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी राज्य महाराष्ट्र में भाजपा की रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस पर तीखा हमला बोला, और विपक्षी दल पर विभाजनकारी राजनीति में लिप्त होने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, ''कांग्रेस जानती है कि हिंदू जितने ज्यादा विभाजित होंगे, उसे उतना ही ज्यादा फायदा मिलेगा.''
संघ परिवार के दो दिग्गजों का इस तरह एक ही सुर में बोलना ऐसे समय सामने आया, जब उनके बीच मतभेदों की अटकलें जारी थीं. खासकर इस वर्ष के शुरू में ऐसी खबरें आई थीं कि लोकसभा चुनाव के दौरान आरएसएस के स्वयंसेवकों ने व्यापक स्तर पर भाजपा के चुनाव अभियान से दूरी बना ली. बहरहाल, उनका इस तरह सामंजस्यपूर्ण संदेश देना एक साझा रणनीति का संकेत भी देता है. देश एक बार फिर चुनावी रंग में रंगा है, निर्वाचन आयोग ने महाराष्ट्र और झारखंड में चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी है और कुछ उपचुनाव भी होने वाले हैं, इसलिए भाजपा का एक बार फिर इस नैरेटिव पर लौटना एक बड़ा सियासी दांव माना जा सकता है.
हाल में संपन्न हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों ने भाजपा कार्यकर्ताओं की रगों में जोश भर दिया है. पार्टी ने राज्य में ऐतिहासिक हैट्रिक के साथ 48 सीटें अपनी झोली में डालीं और 39.94 फीसद वोटशेयर भी हासिल किया. वहीं, उत्तर में हिंदू बहुल जम्मू में बेहतरीन प्रदर्शन के साथ भाजपा ने 28 सीटों पर कब्जा जमाया. लोकसभा चुनाव में कमजोर प्रदर्शन के बाद अब इस तरह से फिर उभरना पार्टी के लिए संजीवनी से कम नहीं है. लोकसभा चुनाव में हरियाणा में जहां पूरी 10 सीटों से घटकर इसकी संख्या आधी रह गई थी, तो महाराष्ट्र में मराठों और दलितों की नाराजगी की वजह से भाजपा-नीत गठबंधन की सीटों की संख्या कुल 48 में से महज 17 सीट पर सिमट गई थी.
अब, सारी नजरें महाराष्ट्र और झारखंड पर टिकी हैं, जहां भाजपा अपने हिंदुत्व कार्ड को एक बार फिर परखने के लिए कमर कस रही है. पार्टी के जानकार पूरी तरह आश्वस्त हैं कि नए सिरे से इस पर फोकस किया जाना पार्टी कार्यकर्ताओं को जाट, राजपूत, मराठा और यादव जैसे प्रभावशाली जाति समूहों के बीच गहरी पैठ बनाने में जुटने के लिए प्रेरित करने में कारगर साबित होगा. दलित और आदिवासी समुदायों का जिक्र नहीं किया जा रहा क्योंकि उन पर पार्टी की पकड़ कमजोर पड़ चुकी है.
यह नैरेटिव फिर से अचानक नहीं उभरा है. उत्तर प्रदेश के तेजतर्रार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बांग्लादेश में बवाल के बीच चेताकर पहले ही मंच तैयार कर दिया था: 'बटेंगे तो कटेंगे.' वैसे तो योगी को भी राज्य में पार्टी का जनाधार फिर से मजबूत करने की कड़ी चुनौती से जूझना पड़ रहा है, खासकर ऐसे समय में जब 13 नवंबर को यूपी के नौ विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव होने हैं. लोकसभा चुनाव में राज्य में भाजपा की सीटें 62 से घटकर महज 37 रह गई थीं और इसे लेकर योगी की कार्यशैली पर अंगुलियां उठने लगी थीं.
संगठित हिंदू वोट बैंक को साधने की भाजपा की यह नई कवायद विपक्ष की जाति-आधारित सियासी रणनीति का मुकम्मल जवाब मानी जा रही है. करीब एक साल से कांग्रेस नेता राहुल गांधी जाति जनगणना की मांग कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर ओबीसी और दलित समुदायों के साथ भी जुड़ती है. भाजपा नेतृत्व पर पिछड़े समुदायों की उपेक्षा करने के आरोप लगते हैं और पार्टी इसे दूर करने के लिए भी खासी मशक्कत कर रही है. संघ परिवार के नैरेटिव की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाते हुए ही हिंदू धर्म के 13 मठों में सबसे बड़े मठ जूना अखाड़ा ने दलित और आदिवासी पृष्ठभूमि के 71 संतों को महामंडलेश्वर की उपाधि देने की योजना घोषित की है. समावेशिता की दिशा में यह कदम पूरी तरह भाजपा के संगठित हिंदू समाज के दृष्टिकोण के अनुरूप ही है.
चुनावी रणभूमि का पारा जैसे-जैसे चढ़ रहा है, आरएसएस स्वयंसेवकों के साथ-साथ भाजपा के खांटी कार्यकर्ता हिंदू एकता का यह संदेश घर-घर पहुंचाने में जुटे हैं. हरियाणा में इसी जमीनी अभियान की बदौलत ही पार्टी ने नाराज जाट और दलित मतदाताओं को साधने में सफलता हासिल की. भाजपा के चुनावी रणनीतिकार पार्टी के समर्पित सदस्यों के बीच उपजी यह भावना भुनाने में जुटे हैं कि लोकसभा में पार्टी के बहुमत से पीछे रह जाने से पीएम मोदी की ताकत घटी है, जिससे हिंदुत्व विरोधी ताकतों को अपनी जड़ें मजबूत करने का मौका मिल गया. इसमें व्यापक हिंदुत्व की धारा के तहत संघ परिवार के 'समग्र सामाजिक न्याय' के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाना भी शामिल है.
बहरहाल, पुरानी गलतियों से सीखकर भाजपा नेता अधिक गहन दृष्टिकोण अपना रहे हैं और लोकसभा अभियान में हावी रही भड़काऊ बयानबाजी से परहेज कर रहे हैं. पार्टी को लगता है कि पुरानी रणनीति नुक्सानदेह साबित हुई, जिससे मुस्लिम वोट बैंक उसके खिलाफ लामबंद हो गया, जबकि हिंदुत्व नैरेटिव के सहारे हिंदुओं को एकजुट करने में सफलता नहीं मिली. अब, पार्टी और संघ के नेता अपेक्षाकृत कम हो-हल्ले के साथ अभियान चला रहे हैं. जब भागवत बांग्लादेश में विदेशी ताकतों के गड़बड़ी फैलाने या वहां उभरते भारत विरोधी माहौल का जिक्र करते हैं तो संघ कार्यकर्ता यह संदेश घर-घर पहुंचाते हैं और यह आह्वान करते हैं कि ऐसी छद्म ताकतों से निबटने के लिए पीएम मोदी के हाथ मजबूत करें.
महाराष्ट्र और झारखंड में जटिल राजनैतिक समीकरणों के बावजूद पार्टी नेताओं को भरोसा है कि वे इसके सहारे स्थानीय गुटबाजी से निबटने, बगावती सुरों पर काबू पाने और अपने कार्यबल से अपेक्षित अधिकतम नतीजे हासिल करने में सफल रहेंगे. संघ ने 150 स्वयंसेवकों की संभाग-स्तरीय समितियां और विधानसभा-वार समूह बनाए हैं जो जमीनी स्तर पर जुड़ने, मोदी सरकार की योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने और हिंदुत्व के मुद्दों पर चर्चा करने में जुटे हैं. मराठवाड़ा में मुस्लिम समुदाय के सदस्यों के व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन जैसी हालिया घटनाओं ने यह नैरेटिव आगे बढ़ाने के लिए तो खुला मौका दे दिया है.
झारखंड में भाजपा आदिवासी महिलाओं के अंतर-धार्मिक विवाहों को एक बड़ा मुद्दा बना रही है और इसे एक आदिवासी के मुख्यमंत्री रहते आदिवासियों की जमीन हड़पने की एक चाल के तौर पर पेश कर रही है. अब, यह तो आगामी कुछ हफ्तों के बाद ही पता चल पाएगा कि हिंदू एकता के लिए बहुत सोच-समझकर तैयार की गई यह रणनीति जातिगत राजनीति और क्षेत्रीय असहमति के असंगत सुरों को दबा पाएगी या नहीं.
सारी लड़ाई है नैरेटिव की
> आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री मोदी ने हिंदू एकता पर जोर दिया है और इस नैरेटिव से पार्टी को आगामी विधानसभा चुनावों में फायदा मिलने की उम्मीद है
> इस रणनीति का उद्देश्य विपक्ष की जाति आधारित राजनीति का मुकाबला करना और प्रभावशाली जाति समूहों के बीच हिंदू वोटों को एकजुट करना है
> हरियाणा में भाजपा की सफलता ने हालिया लोकसभा चुनाव में झटके के बाद उसके आत्मविश्वास को और मजबूत किया है
> लेकिन पार्टी नेताओं और आरएसएस स्वयंसेवकों ने एक बारीक, सादा दृष्टिकोण अपनाया है, जो जमीनी स्तर पर संपर्क और स्थानीय मुद्दों को व्यापक हिंदुत्व के संदर्भ में रखने पर केंद्रित है

