—अरुण पुरी
बहादुरी और बुलंदी. मुश्किलों पर फतह. चैंपियन की वापसी. तकदीर बदल देने वाली खेल की फतहों को बयान करने के लिए हम अक्सर ऐसी घिसी-पिटी उक्तियों का सहारा लेते हैं. मगर भावनाओं का अनगढ़पन हमारी मुट्ठी से फिसल जाता है. हम डर की उस अंतर्धारा, घबराहट के उस जानलेवा बोझ और महत्वाकांक्षा की उस आग को महसूस नहीं कर पाते जिससे ओलंपिक पदक गढ़े जाते हैं.
मनु भाकर की कहानी हमारे लिए पेरिस की कहानी है. ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला निशानेबाज. एक ही ओलंपिक में दो पदक जीतने वाली स्वतंत्र भारत की पहली खिलाड़ी. मगर जो बात उनकी उपलब्धि को और भी शानदार बनाती है, वह है उससे पीछे की कहानी जो टोक्यो में हुए उससे पहले के ओलंपिक तक जाती है.
2018 में, जब वे 16 साल की थीं, जसपाल राणा तस्वीर में आए और राष्ट्रीय जूनियर कोच बनकर उन्हें अपनी देखरेख में लिया. अपने वक्त के यशस्वी निशानेबाज राणा ने मनु को 'पिता और दोस्त' की तरह सान पर चढ़ाया, इस किशोरी को जिंदगी के सिरे खोजने दिए, लेकिन कड़ी मेहनत भी करवाई. वे उन्हें 'पितृतुल्य' मानती हैं और उनके तौर-तरीकों में 'अंधा भरोसा' करती हैं.
वे विश्व कप के लिए मेक्सिको गईं और कई पदक जीते. उसी साल कॉमनवेल्थ खेलों का रिकॉर्ड बनाया. माना जा रहा था कि यह जोड़ी टोक्यो में कमाल करेगी. कोविड के प्रकोप से वह ओलंपिक एक साल देर से जुलाई-अगस्त 2021 में हुआ. यहीं से चीजें गड़बड़ होनी शुरू हुईं.
मार्च, 2021 में नई दिल्ली में हुए विश्व कप की विभिन्न स्पर्धाओं में हालांकि उन्होंने तीन स्वर्ण, एक रजत और एक कांस्य पदक जीता, लेकिन कोच और शिष्य के बीच अनबन होने लगी. राणा ने सुझाया कि टोक्यो में वे जिन तीन स्पर्धाओं में हिस्सा लेने का मंसूबा बना रही थीं, उनमें से एक से हट जाएं, क्योंकि यह बहुत भारी पड़ेगा. मनु को लगा कि वे दूसरी खिलाड़ी पर मेहरबान हैं और उन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहे हैं. कटुता हाथों से बाहर चली गई और दोनों तरफ से अहं और दंभ के आरोप लगाए गए.
यहां तक कि टोक्यो से तीन महीने पहले राणा को टीम के कोच पद से हटा दिया गया. उधर, मनु जब बड़े मंच पर जाती हैं तो उनका दिमाग मानो सुन्न हो जाता है. वे 19 बरस की थीं. भविष्यवाणी की जा रही थी कि अपने पहले ओलंपिक में मनु छा जाएंगी. मगर उस पल के अकेलेपन में आत्मसंयम उन्हें चकमा दे देता है. वे इच्छाशक्ति और कार्यशक्ति की अबूझ सुन्नता के भंवर में जा गिरती हैं. उन्होंने इंडिया टुडे को बताया, "मैं बिल्कुल भूल गई कि मैं कैसे शूट करती हूं, मेरी टेक्नीक और मेरा तरीका क्या है."
वे ऐसे मानसिक गर्त में जा गिरती हैं जहां खेल को ही तिलांजलि देने का विचार मन में उठता है. ज्यादातर किशोर तो जिंदगी भर की चोट लगा बैठते. यहीं से उन्होंने जिंदगी के सिरे फिर से जोड़े. दो साल बाद अब भी महज 21 वर्ष की मनु ने अपनी उम्र से कहीं ज्यादा हैरतअंगेज परिपक्वता का परिचय देते हुए सुलह की खातिर दिल्ली के एक कैफे में राणा से मुलाकात की. फिर ठीक यहीं से देश के लिए इतिहास रचने निकल पड़ीं.
इस हफ्ते की आवरण कथा वह पूरी अंतर्कथा सामने लाती है जिसमें मनु ने टोक्यो 2020 की नाकामी के प्रेतों को दफनाया और पिस्तौल दनदनाते हुए पेरिस 2024 में गरजदार वापसी की. डिप्टी एडिटर सुहानी सिंह ने मनु, उनके परिवार, दोस्तों, साथी निशानेबाजों, और सबसे अहम, कोच राणा से बात करके इस प्रेरक गाथा का तानाबाना बुना है और बताया है कि भीतर से चैंपियन कैसे गढ़े जाते हैं. आपको उन हैरतअंगेज तस्वीरों की शृंखला भी मिलेगी, जो उन्होंने हाथ में बंदूक लिए अलग-अलग मुद्राओं में पूरी खेल भावना से खिंचवाई.
ग्रुप फोटो एडिटर बंदीप सिंह की तस्वीरें मनु भाकर की कहानी को दूसरी चीजों जितनी ही विविधता और बारीकी से पकड़ती हैं—खुशमिजाज लड़की, जिसे शॉपिंग करना अच्छा लगता है, पहनावे के विकल्पों में 'रचनात्मक’ होना पसंद करती है और ध्यानाकर्षण का केंद्र होने से कोई गुरेज नहीं. मगर इस शख्सियत का मर्म बंदूक की उस गोली जितना ही कठोर और अचूक है जो जानती है कि उसे कहां जाना है.
वहां पहुंचने में उन्हें ज्यादा वक्त नहीं लगा. उनका जन्म हरियाणा के एक गांव, लेकिन खुशहाल और शिक्षित परिवार में हुआ. पिता मर्चेंट नेवी में चीफ इंजीनियर हैं और मां संस्कृत की शिक्षिका और अपने दादा के हाथों स्थापित गांव के स्कूल में प्रिंसिपल हैं. मनु "मजबूत होना और ताकतवर महसूस करना" चाहती हैं और मुक्केबाजी, कबड्डी, कराटे और मणिपुरी मार्शल आर्ट थंग-ता की तरफ जाती हैं.
फिर एक दिन जब उन्हें "सोने या खाने" की वजह से इतिहास की कक्षा से निकाल दिया जाता है, यह 14 बरस की लड़की घूमते-घामते स्कूल की शूटिंग रेंज में पहुंच जाती है और लक्ष्य को ताकने, बंदूक से निशाना लगाने, अपनी सांस और दिमाग को शांत रखने, और ट्रिगर दबाने के सम्मोहक जादू के फेर में पड़ जाती है. वे इसमें इस कदर निखरकर आती हैं कि साल भर के भीतर राष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीत लेती हैं.
निशानेबाजी खेल के तौर पर शिकार और जंग से विकसित हुई. धैर्य और शारीरिक दमखम उसकी बुनियाद हैं. आपको अपने हाथ की बंदूक को आंख की सीध में लाना होता है और चट्टान-सी स्थिरता से थामे रखना होता है, और इसे बार-बार ऊपर-नीचे करना होता है. मार्शल आर्ट के शुरुआती प्रशिक्षण ने उनकी देह के ऊपरी हिस्से को ताकत दी. मगर आपको अपने 'बंदर दिमाग’ को काबू में रखने के लिए एक योगी सरीखी ध्यान की अवस्था भी पानी होती है और सामने एक ही बिंदु पर ध्यान एकाग्र करना होता है. पेरिस में उन्होंने पक्के इरादे के बूते इतिहास रचने वाले जो दोहरे कांस्य पदक जीते, वे लंबे वक्त के लक्ष्यों पर अटूट निशाना साधने की मिसाल हैं.
हमारी आखिरी महिला खेल स्टार पी.वी. सिंधू के पोडियम से फिसलने के बाद भारत ने इस युवा मनमोहक बंदूकधारी वीरांगना को अपनाया है. वे अपने नए हासिल स्टारडम को सहजता और संक्रामक मुस्कान के साथ धारण करती हैं. फैशन वीक में वे रैंप पर चल रही हैं. सोशल मीडिया पर उनके फॉलोअर लाखों में पहुंच गए हैं.
जेन जेड के किसी भी अन्य युवा की तरह वे मूल डिजिटल बाशिंदे की सहजता से इंस्टाग्राम पर चहलकदमी करती हैं, जिसे आकर्षक दिखने से कोई परहेज नहीं है. लेकिन वे समझदार भी हैं, इतनी कि जानती हैं कि निशाना साधते वक्त बाहर के शोर को भीतर आने से रोककर मन को कैसे स्थिर कर लेना है. उनका अगला लक्ष्य लॉस एंजेलिस 2028 में स्वर्ण पदक जीतना है. हमारी दोहरी पदकधारी चैंपियन के लिए यह ज्यादा मुश्किल नहीं होना चाहिए.
— अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

