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महाराष्ट्र: आजकल बदले-बदले से क्यों नजर आने लगे हैं अजित पवार?

अजित पवार मुस्कराते हुए और महिलाओं के साथ संवाद करते भी देखे जा सकते हैं जो उनके रुखे व्यक्तित्व के विपरीत है

अजित पवार 22 सितंबर को सोलापुर के मोहोल में जन सम्मान यात्रा के दौरान
अजित पवार 22 सितंबर को सोलापुर के मोहोल में जन सम्मान यात्रा के दौरान
अपडेटेड 21 अक्टूबर , 2024

इन दिनों महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार पर गुलाबी रंग का असर दिखता है. चाहे उनकी जैकेट हो या होर्डिंग, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के अध्यक्ष को सादगी के रंग में देखा जा सकता है. माना जाता है कि यह शेड महिला मतदाताओं को ज्यादा अपील करता है, जिनके हितों के बारे में उनकी पार्टी कहती है कि हाल ही की मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना ने उनको पूरा किया है. इस योजना के तहत करीब 2.5 करोड़ महिलाओं को प्रति माह 1,500 रुपए दिए जाते हैं.

महायुति सरकार ने भले ही इस योजना की घोषणा की हो लेकिन चूंकि अजित वित्त विभाग देखते हैं लिहाजा उनकी पार्टी दावा करती है कि इसका श्रेय उन्हीं को जाना चाहिए. वे मुस्कराते हुए और महिलाओं के साथ संवाद करते भी देखे जा सकते हैं जो उनके रुखे व्यक्तित्व के विपरीत है. अब जबकि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में रंगने के लिए तैयार है, जिसकी घोषणा कभी भी हो सकती है, तो उन्होंने समर्थन जुटाने और जनता तक पहुंचने के लिए राज्यव्यापी जन सम्मान रैली भी शुरू की है.

बदले हुए अजित पवार का आखिर कारण क्या है? यह छवि चमकाने की कवायद का हिस्सा है, जिसके लिए एनसीपी के प्रमुख ने जुलाई में इमेज कंसल्टेंट नरेश अरोड़ा की राजनैतिक अभियान प्रबंधन कंपनी डिजाइनबॉक्स्ड को रखा है. परिधान वाले आमूल बदलाव से कहीं ज्यादा दूसरी चीजों को दुरुस्त करने के लिए अजित को अपनी उस खराब छवि से उबरने की जरूरत है—जो 2019 में तीन दिन की सत्ता के लिए देवेंद्र फड़नवीस के साथ अवसरवादी सहयोगी के रूप में और 2023 में उपमुख्यमंत्री पद की एवज में चाचा शरद पवार को छोड़ने और पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह अपने साथ ले जाने के कारण बन गई.

इसे छोड़ दें तो भी अब वे सत्तारूढ़ गठजोड़ में अलग-थलग दिखते हैं. भाजपा और शिवसेना 'स्वाभाविक' सहयोगी नजर आते हैं क्योंकि हिंदुत्व के मुद्दों पर उनके विचार मिलते हैं. दूसरी तरफ, अजित को स्पष्ट रूप से रणनीतिक कारणों से लाया गया था—शरद पवार के नेतृत्व वाली मूल पार्टी को तोड़ने के लिए, जैसा उसने शिवसेना के साथ किया था. साथ ही महायुति का यह विश्वास कि अकेले शिंदे लोकसभा चुनाव में नैया पार नहीं लगा पाएंगे. ऐसा हुआ भी, अजित भी नैया पार नहीं लगा पाए. महायुति को मई के आम चुनाव में हार देखनी पड़ी और विपक्षी महा विकास आघाड़ी (एमवीए) ने कुल 48 सीट में से 31 सीटें जीत लीं. चार सीटों पर लड़ने वाली एनसीपी को एक पर जीत मिली.

गठबंधन के उनके साथी दलों ने नाराजगी स्पष्ट कर दी है. संघ परिवार के साप्ताहिकों ऑर्गेनाइजर (अंग्रेजी) और विवेक (मराठी) में प्रकाशित लेखों में गठजोड़ को लेकर खुले तौर पर असंतोष जताया गया है. आरएसएस के एक सूत्र का कहना है, "भाजपा सबसे अलग पार्टी होने का दावा करती थी और फिर भी उसे एनसीपी के साथ गठजोड़ करने में दिक्कत नहीं हुई." उन्होंने इशारों में कहा कि कैसे ये खुद भाजपा के ही नेता थे जिन्होंने अजित और उनकी पार्टी के लोगों पर रिश्वत का आरोप लगाया था. भाजपा के एक मंत्री कहते हैं, "भाजपा को विपक्ष में बैठना चाहिए था. अजित को साथ लेना और सरकार बनाना गलत था."

अब यह नफरत बाहर आना शुरू हो गई है. अगर भाजपा की आशा बुचके ने अगस्त में पुणे के जुन्नर में अजित के काफिले का काले झंडों से स्वागत किया तो शिवसेना के जन स्वास्थ्य मंत्री तानाजी सावंत ने कहा कि उन्हें एनसीपी के मंत्रियों के साथ बैठते हुए लगता था जैसे वहां "फेंक दिया गया" हो. इससे एनसीपी के प्रवक्ता उमेश पाटील इतना क्षुब्ध हुए कि उन्होंने कहा कि लगातार अपमान झेलते जाने से ज्यादा बेहतर होगा कि पार्टी सरकार से बाहर हो जाए.

लोकसभा में बुरी तरह हारने के बाद एनसीपी महायुति की सबसे कमजोर कड़ी बन गई है. मुंबई में हाल ही में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में भाजपा नेता और साथी उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने कहा कि लोकसभा चुनाव में एनसीपी के वोट उतनी संख्या में भाजपा को ट्रांसफर नहीं हुए जितनी उम्मीद थी. लेकिन इस बेमेल गठजोड़ के बावजूद सहयोगी दलों के पास इसे निभाते रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

जैसा कि भाजपा के एक वरिष्ठ विधायक कहते हैं, "गठजोड़ से हमें नुक्सान हो रहा है लेकिन हम उनके साथ संबंध नहीं तोड़ सकते क्योंकि इससे यह धारणा बनेगी कि हम स्वार्थी हैं." न केवल उनके खुद के सहयोगियों का ही चुनाव जितवाने की अजित की क्षमता पर से भरोसा उठ गया है बल्कि विपक्ष तक के खेमे का भी मानना है कि अब वे चुक गए हैं. कांग्रेस के एक पूर्व मंत्री के अनुसार यह धारणा कि अजित ने केंद्रीय जांच एजेंसियों की आंच से बचने के लिए भाजपा का दामन थामा. इससे उनकी छवि को बुरी तरह नुक्सान पहुंचा है.

इन हालात में अजित ने संकेत दिया है कि वे बारामती से दूर रह सकते हैं, जिसका वे 1991 से प्रतिनिधित्व करते आ रहे हैं. यह भी संभावना है कि उनके छोटे बेटे जय को वहां से खड़ा किया जा सकता है और अजित पुणे में शिरूर से लड़ सकते हैं. बहरहाल अजित ने अपने पत्ते संभालकर रखे हैं. वे यही कहते हैं कि इसका फैसला पार्टी संसदीय बोर्ड करेगा.

एनसीपी (एसपी) भी अजित के छोटे भाई श्रीनिवास के पुत्र युगेंद्र को या शरद पवार के बड़े भाई दिनकर राव उर्फ अप्पासाहेब के बेटे राजेंद्र को बारामती से उतार सकती है. एनसीपी (एसपी) के एक सूत्र को हालांकि यकीन है कि अपने "कार्यकर्ताओं के दबाव" के बाद अजित के पीछे हटने और बारामती से चुनाव नहीं लड़ने की संभावना है.

हरियाणा में सकारात्मक चुनाव नतीजों के बाद अजित भी अपनी स्थिति में क्षरण महसूस कर सकते हैं. हरियाणा की जीत ने भाजपा का विश्वास बढ़ा दिया है और साथी दलों पर निर्भरता घटा दी है.

बातचीतः अजित पवार

''चुनाव के बाद चुना जाएगा मुख्यमंत्री''

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं. ऐसे दौर में उपमुख्यमंत्री और एनसीपी अध्यक्ष अजित पवार ने सीनियर एसोसिएट एडिटर धवल एस. कुलकर्णी के साथ विभिन्न मसलों पर अपने विचार साझा किए. इनमें महायुति का मुख्यमंत्री उम्मीदवार, सर्वोच्च पद के लिए उनकी महत्वाकांक्षा और चाचा शरद पवार के साथ वापसी जैसे मसले शामिल थे. संपादित अंश:

• चुनाव में महायुति के मुद्दों पर:
हम मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन जैसी कल्याण योजनाओं पर भरोसा कर रहे हैं. अगर राज्य सरकार की भी वही विचारधारा है जो केंद्र सरकार की है तो इससे राज्य को अधिक धन मिलने और विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में मदद मिलती है.

गठजोड़ के मुख्यमंत्री उम्मीदवार पर:
एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री हैं और हम दो उप-मुख्यमंत्री हैं. हम चुनाव का एकसाथ सामना करेंगे. मुख्यमंत्री पर फैसला चुनाव के बाद लिया जाएगा.

सीएम पद की अपनी महत्वाकांक्षा पर:
मैं इस पर टिप्पणी कर कोई नया विवाद पैदा नहीं करना चाहता. हमारा पहला उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि महायुति को अधिक से अधिक संख्या में सीटें मिलें. 

लाडकी बहिन जैसी योजनाओं के आर्थिक औचित्य पर:
ये लाभ किसे मिल रहे हैं? उनको जिनकी सालाना आय 2.5 लाख रुपए या 20,000 रु. महीने से कम है. अगर हम उनकी मदद करते हैं तो इसमें गलत क्या है? सिस्टम में किसी तरह के लीकेज को ठीक किया जा सकता है और दिखावे के किसी भी तरह के खर्च को रोका जा सकता है.

• इस पर कि क्या लोकसभा चुनाव के नतीजे विधानसभा में भी दोहराए जाएंगे:
लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मतदाता अलग-अलग तरीके से सोचते हैं. 1999 में जब महाराष्ट्र में एक साथ चुनाव कराए गए थे, कांग्रेस और एनसीपी राज्य में सत्ता में आई थी और केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में सरकार थी. 

भाजपा और शिवसेना नेताओं के भड़काऊ बयानों पर:
मैंने बुल्ढाणा में अपने भाषण में इसका जिक्र किया है जहां मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री मौजूद थे...मैं बोलता हूं जब और जहां जरूरत होती है. हमने उनके आलाकमान के साथ चर्चा की है और आवश्यक परिवर्तन किए जाएंगे. यह हमारी पार्टी या महायुति की पोजीशन नहीं है.

उन्हें लेकर आरएसएस की असहजता पर:
मैंने सरकार में शामिल होने से पहले संघ से बातचीत नहीं की. मैं भाजपा के वरिष्ठ नेतृत्व के साथ बातचीत कर रहा था. विधायकों के चुनाव क्षेत्र में काम करवाने और विकास जैसे मसलों पर सरकार में शामिल होने से पहले विचार किया गया था.

 इस पर कि क्या वे या उनके बेटे बारामती से चुनाव लड़ेंगे:
पार्टी का संसदीय मंडल इस पर फैसला करेगा. 

चाचा शरद पवार के साथ संभावित मेल-मिलाप पर:
यह अटकलबाजी है. आज हम महायुति के साथ हैं और उसी हिसाब से अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं.

एनसीपी की जन सम्मान यात्रा के जरिए प्रचारित किए जा रहे उनके नरम संस्करण पर:
इससे पहले मैं पार्टी के कार्यकर्ता के रुप में काम कर रहा था. लेकिन अब मैं उसका अध्यक्ष हूं. पार्टी प्रमुख के तौर पर, मैं जिस तरीके से काम और व्यवहार करता हूं वह मुझे बदलना चाहिए क्योंकि मेरी जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं. इससे पहले मेरे सीनियर चीजों का ध्यान रखते थे. अब मुझे ध्यान रखना होता है.

इस अटकल पर कि उनके विधायक एनसीपी (एसपी) की तरफ जा सकते हैं:
ऐसी ही बातों का विधान परिषद के चुनाव के दौरान भी दावा किया जा रहा था. हमारे दो उम्मीदवार जीते. हालांकि हमें 7 वोट कम मिले. इसका मतलब है कि मेरे विधायक मेरे साथ हैं. हम संगठन को मजबूत करने के लिए साथ-साथ काम कर रहे हैं.

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