—अरुण पुरी
देश और दुनिया में समस्याओं की कमी नहीं. युद्ध, सत्ता परिवर्तन, चुनाव, भ्रष्टाचार और घोटाले, हमारे यहां सब थोक में चल रहे हैं. फिर बेचारे लड्डू की क्या बिसात, आप शायद पूछें. जी हां, भारत में धर्म से जुड़ी कोई भी चीज अत्यंत ज्वलनशील पदार्थ होती है. फिर यह कोई पड़ोस के हलवाई का लड्डू भी नहीं. माहौल में खटास पैदा करने वाली यह मिठाई वह पवित्र प्रसाद है जो तिरुपति में आपको मिलता है.
आंध्र प्रदेश का यह मंदिर देश भर के हिंदू तीर्थयात्रियों को अपनी ओर खींचने वाला विशाल चुंबक है, जहां हर साल हैरतअंगेज 3-4 करोड़ तीर्थयात्री आते हैं. इसीलिए चार दिनों तक राष्ट्रीय सुर्खियों में एक सवाल छाया रहा, जिसे सुनकर बाहरी लोग तो शायद चकरा जाते - क्या तिरुपति के लड्डू बनाने के लिए इस्तेमाल घी जानवर की चर्बी से दूषित और अपवित्र था?
अपने पूर्ववर्ती वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी को निशाना बनाने की गरज से मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने इस अटकल को हवा क्या दी, इसने इतना तूल पकड़ लिया कि सुप्रीम कोर्ट 'भगवानों को राजनीति से दूर रखने' की कड़ी चेतावनी देने को मजबूर हो गया. नेक जज्बात, पर क्या यही कहना होगा - कोई आसार नहीं?
आंध्र प्रदेश की राजनीति इस विवाद से स्वाभाविक ही सुलग उठी, पर यह इस तटीय राज्य तक सिमटा मुद्दा नहीं है. घी हिंदू धर्म में सबसे पवित्र 'शुद्ध' सात्विक खाद्य पदार्थों में से एक है, और इसमें जानवर की चर्बी की मिलावट होने की भनक भर ने दूर-दूर तक इतनी दुखती रगें छेड़ दीं कि अयोध्या के नए राम मंदिर और ओडिशा में सदियों पुराने पुरी के जगन्नाथ मंदिर के प्रसाद शुद्धता की जांच के लिए भेज दिए गए.
उत्तराखंड में पवित्र बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिरों ने भी दोषमुक्त प्रसाद के नए नियम ईजाद किए. लड्डू गहन राजनैतिक भावनाओं के बीच एक तरह से बिजली का जलता तार बन गए. एक स्तर पर इससे उस सरगर्म बहस को खुराक मिल रही है कि मंदिरों के प्रशासन में सरकार को जरा भी मौजूद रहना चाहिए या नहीं.
मसलन, कुल 36 अरब डॉलर (3.02 लाख करोड़ रुपए) की संपत्ति के साथ सबसे अमीर हिंदू मंदिर बोर्ड तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) कहने को तो 'स्वतंत्र' न्यास है, पर राज्य सरकार के अधीन है. लेकिन 'जन' स्तर पर इस विषय ने इसलिए आग पकड़ ली क्योंकि सामाजिक जमीन को खान-पान से जुड़ी 'शुद्धता' की ज्यादा व्यापक राजनीति से अत्यधिक गरमाए रखा गया है, जो उत्तर प्रदेश से शुरू होकर और हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र पहुंचकर समूचे भारत को अपनी चपेट में लेती मालूम दे रही है.
तिरुपति में, जहां रोज 60,000 और खास मौकों पर 1,00,000 के बीच श्रद्धालु आते हैं, हर दिन 3,00,000 लड्डू बांटे जाते हैं. इसके लिए हैरतअंगेज 15 टन गाय के घी की जरूरत होती है. मौजूदा विवाद तब शुरू हुआ जब टीटीडी ने गुजरात स्थित राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के हाथों संचालित प्रयोगशाला को नमूने जांच के लिए भेजे. घी की गुणवत्ता को लेकर तभी से धीरे-धीरे शक पैदा होने लगा था जब 2019-20 में सत्यापन के मानदंडों में हेरफेर करके उन्हें कम सख्त बनाने के बाद नए आपूर्तिकर्ता लाए गए.
कर्नाटक की शीर्ष डेयरी सहकारी संस्था के ब्रांड नंदिनी घी की आपूर्ति पहले तिरुपति को 400 रुपए प्रति किलो पर की जाती थी, पर फिर उसने कम बोली पर समझौता करने से इनकार कर दिया. सारा ध्यान अब तमिलनाडु में डिंडीगुल के नए आपूर्तिकर्ता पर आ गया, जिसने मात्र 320 रुपए दाम लिए. जुलाई में टीटीडी ने उसके घी के चार टैंकर नामंजूर करके फर्म को ब्लैकलिस्ट कर दिया. लैब रिपोर्ट में मिलावट का साफ इशारा किया गया, पर मिलाई गई चीजों के बारे में रिपोर्ट किसी नतीजे पर नहीं पहुंची. संभावना के तौर पर उसने तमाम किस्म के वनस्पति तेलों के साथ गाय और सूअर की चर्बी का भी जिक्र किया.
अंग्रेजी की एक कहावत में कहें तो चर्बी आग में थी, यानी तूफान के लिए दरवाजे खोल दिए गए थे. मुख्यमंत्री नायडू इस खबर को ले उड़े. उन्होंने प्रसाद अपवित्र करने का आरोप लगाया और इसके लिए जगन की हुकूमत के दौरान घी की खरीद के नियमों में किए गए फेरबदल को जिम्मेदार ठहराया. और तो और, नायडू ने इसे जगन के धर्मपरायण ईसाई होने से जोड़ दिया. जगन ने ''नायडू के पापों का प्रायश्चित करने के लिए'' तिरुमला जाने का प्रण किया. लेकिन जब मुख्यमंत्री ने उन पर तंज कसते हुए कहा कि तिरुपति में प्रवेश करने से पहले उन्हें ईष्टदेव में और इस तरह हिंदू धर्म में अपनी आस्था की औपचारिक घोषणा करनी चाहिए, तो उन्होंने पैर पीछे खींच लिए.
इस बीच आंध्र की राजनीति के तीसरे कारक, अभिनेता और उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण, जिनकी जन सेना पार्टी भाजपा के करीब है, एक अन्य वेंकटेश्वर मंदिर में प्रायश्चित के लिए निकल पड़े. कल्याण ने भी, जिन्हें आंध्र की राजनीति में भाजपा के रणनीतिक औजार के रूप में अपने आगे हिंदुत्व के भविष्य का अंदाजा हो गया मालूम देता है, मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण के खिलाफ भावनाओं को भड़काने में अपने हिस्से का योगदान दिया. उन्होंने 'अपवित्र किए जाने' को रोकने और 'धार्मिक प्रथाओं' की रक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर 'सनातन धर्म रक्षणा बोर्ड' बनाने का प्रस्ताव रखा.
हैदराबाद में इस सबको करीब से देख रहे सीनियर डिप्टी एडिटर अमननाथ के. मेनन आपके लिए राजनीति में धर्म की मिलावट के इस प्रसंग का संपूर्ण आद्योपांत दर्शन लेकर आए हैं. फिर एक और दिलचस्प मामले से घटनाक्रम पेचीदा और रहस्यमयी हो जाता है. यह महाराष्ट्र में तीर्थस्थलों की दुकानों को दिया जा रहा 'ओम' प्रमाणपत्र है, जिसका आशय यह बताना है कि विक्रेता मुसलमान नहीं है और इसलिए वस्तुएं 'अपवित्र' नहीं हुई हैं.
एसोसिएट एडिटर धवल एस. कुलकर्णी नासिक के त्र्यंबकेश्वर मंदिर से इसके बारे में बता रहे हैं. एसोसिएटर एडिटर आशीष मिश्र उस उत्तर प्रदेश के हालात का जायजा ले रहे हैं जो 'खाद्य शुद्धता' को लेकर पैदा इस सारी खलबली का मूल आरंभ बिंदु रहा था. जुलाई में कांवड़ यात्रा के दौरान दुकानदारों को अपने नाम प्रदर्शित करने के योगी आदित्यनाथ की सरकार की तरफ से दिए गए निर्देश को सुप्रीम कोर्ट की फटकार झेलनी पड़ी थी. लेकिन योगी सरकार ने राज्यस्तरीय अभियान शुरू करते हुए उसी तर्ज पर नए निर्देश जारी कर दिए हैं.
हमारे लोकतंत्र में हरेक को अपनी-अपनी समझ के अनुसार अपने धर्म को मानने और उसका पालन करने का अधिकार है. हमारी आध्यात्मिक विरासत की सच्ची परीक्षा अलबत्ता भय और घृणा से अपने को नष्ट कर लेने में नहीं बल्कि आस्था को भाईचारे और शांति की राह बनने देने में है.
— अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

