—अरुण पुरी
हमारे आसपास लगातार विस्तार पा रहे नए-नवेले राजमार्ग गर्व का विषय हैं. हमारे विकास एजेंडे का मुख्य हिस्सा बन चुके इन राजमार्गों का विस्तार हमारी जीडीपी की वृद्धि दर को बनाए रखने या बढ़ाने के लिए भी बेहद अहम है. हालांकि इसका एक बुरा पहलू भी है—राजमार्गों पर खतरनाक ढंग से बढ़ते जाने वाले हादसे, जो अपने पीछे अक्सर तेज रफ्तार वाहनों और मौतों का ढेर छोड़ जाते हैं. यह संकेत है कि हमारी व्यवस्था और प्रशासनिक प्रणाली विकास की रफ्तार के साथ कदमताल नहीं कर पा रही है.
भारतीय राजमार्गों पर हर साल दुर्घटनाओं में होने वाली मौतें 1,00,000 से भी ज्यादा हैं. इसका मतलब है रोज 274 और हर घंटे 11 लोग जान गंवा रहे हैं. राष्ट्रीय राजमार्ग भारत भर में फैली 63 लाख किमी सड़कों के बमुश्किल 2.1 फीसद हैं, फिर भी कुल मौतों में उनकी हिस्सेदारी बहुत ही ज्यादा 36 फीसद है. यह कोई औचक आंकड़ा नहीं है: सड़क दुर्घटनाओं में लगने वाली औसतन 4,43,000 गंभीर चोटों में से एक-तिहाई के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग जिम्मेदार हैं.
इनमें प्रादेशिक राजमार्गों को भी जोड़ लें तो समीकरण और कसैला हो जाता है: 60 फीसद मौतें सड़कों की कुल लंबाई के महज पांच फीसद पर होती हैं.
हमारा रवैया दुर्घटनाओं को औचक हादसा मानने का होता है, और पैटर्न हमारी नजरों से बच निकलता है. कुल मृत्यु दर अलबत्ता महामारी की मृत्यु दर के बराबर पहुंचने लगी है. समय आ गया है कि भारत इसके कारणों और समाधानों पर गंभीरता से विचार करे. खुशकिस्मती से कमान ऐसे शख्स के हाथ में है जो न केवल कर्मठ है बल्कि हालात के प्रति पूरी तरह सजग भी है. केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी 2004 में खुद राजमार्ग पर दुर्घटना का शिकार हो चुके हैं, जिसमें उनकी कई हड्डियां टूट गई थीं.
इसीलिए वे चीजों को दुर्घटना के पीड़ितों के नजरिये से देख पाते हैं. 2014 में जब उन्होंने कमान संभाली, पहले कामों में एक यह किया कि सभी राष्ट्रीय और प्रादेशिक राजमार्गों का सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य कर दिया. उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) से दुर्घटनाओं के ब्लैकस्पॉट की पहचान करने को कहा. नतीजे आंख खोलने वाले थे. 2021 तक एनएचएआई ने 2016-2018 के बीच हुई दुर्घटनाओं और मौतों के डेटा के आधार पर 5,352 ब्लैकस्पॉट की पहचान की. तब से 4,005 ब्लैकस्पॉट को हमेशा के लिए दुरुस्त कर दिया गया है. इंजीनियरिंग की खामियों को खत्म करने पर अब तक 15,700 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं.
रिसर्च से राजमार्गों पर मौतों की वजह बनने वाले पांच कारकों की पहचान हुई है: निहायत ही बुरा ट्रैफिक अनुशासन, खराब और बेपरवाह सड़क इंजीनियरिंग, नियम-कायदे लागू करने में ढिलाई, वाहनों की खराब डिजाइन, और इलाज मिलने में देर. प्रमुख राजमार्गों पर इंजीनियरिंग की खामियां देखकर शोधकर्ता चौंक गए.
पुराने मुंबई-पुणे राजमार्ग के अपने सुरक्षा ऑडिट में एनजीओ सेवलाइफ फाउंडेशन को ड्राइवर की नजर में बाधा डालने वाली 37 रुकावटें, सड़क किनारे लगे 21 पेड़, फुटपाथ के 67 पत्थर, 162 तीखे मोड़, सड़क पर कंक्रीट के 275 ढांचे और 218 किमी की संकरी पट्टियां मिलीं. इसमें आवारा पशुओं की तो बेशक गिनती ही नहीं है. हादसों के उस एक और शिकार—पैदलयात्री—का तो जिक्र ही क्या, जो सड़क के अनुशासन में उतना ही बराबर से शरीक है और भारत की सड़क डिजाइन में जिसके बारे में ज्यादातर अक्सर बाद में ही सोचा जाता है. इसीलिए हाल के वक्त में पैदल चलने वालों के लिए अंडरपास और ओवरब्रिज सरीखे सुरक्षित रास्ते बनाने पर बहुत ध्यान दिया गया है.
राजमार्ग पर टक्करों में तेज रफ्तार ही 75 फीसद से ज्यादा जिंदगियां लील जाती है. लेकिन रफ्तार अपने बूते हादसों को अंजाम नहीं देती. दिक्कत तब होती है जब इसके साथ भारतीयों के बर्ताव की दूसरी अनोखी खासियतें मिल जाती हैं. सड़क की गलत दिशा में गाड़ी चलाना, लेन की जरा सुध-बुध न रखना और यातायात के ऐसे ही दूसरे अराजक उल्लंघनों को लीजिए. ढीले-ढाले नियम और उससे भी ज्यादा ढीले-ढाले ढंग से उन्हें लागू किया जाना भारत का पुराना अभिशाप रहा है, पर अब इस पर कुछ हलचल दिखाई दे रही है.
नियमों को सख्त बनाने के लिए 2019 से मोटर वाहन अधिनियम को बार-बार संशोधित किया गया है. मसलन, नशे में गाड़ी चलाने का जुर्माना 2,000 रुपए से बढ़ाकर अब 10,000 रुपए और लाइसेंस निरस्त करना कर दिया गया है. एकमात्र तरीका सबसे सुरक्षित राजमार्गों वाले नीदरलैंड, सिंगापुर और नॉर्वे सरीखे देशों का अनुकरण करना है. व्यवहारगत मनोविज्ञान में बदलाव लाने के लिए सख्त जुर्मानों से बेहतर कोई साधन नहीं है. इसे अंजाम देने के लिए समुचित कार्यबल के साथ ईमानदार ट्रैफिक पुलिस कारगर हो सकती है. साथ ही, वाहनों के लिए सुरक्षा से जुड़े नए ग्रेड सर्टिफिकेशन के नतीजे मिलने लगे हैं: उनमें से ज्यादातर अब सभी सवारियों के लिए एयरबैग लगाने को तैयार हैं.
दुर्घटना के बाद आपातकालीन ट्रॉमा सेंटर सुलभ होना मृत्यु दर पर स्वाभाविक ही भारी असर डालता है. पीड़ितों को 'गोल्डन आवर' यानी हादसे के घंटे भर के भीतर चिकित्सकीय सहायता मिलना कुंजी है. मगर इससे चिकित्सा सुविधाओं के समान फैलाव सरीखी दूसरी बातों पर ध्यान जाता है, ताकि राजमार्ग पर कोई भी जगह सुसज्जित ट्रॉमा सेंटर से ज्यादा दूर न हो.
यह नेटवर्क स्थापित करना पेचीदा मामला है क्योंकि स्वास्थ्य समवर्ती सूची में है और राज्य सरकारें भी इसमें आ जाती हैं. सबसे ऊपर हमारे पास न तो पर्याप्त तादाद में एंबुलेंस हैं और न ही पूरे भारत में एकसमान एंबुलेंस नंबर है. राजमार्ग के टोल वाले हिस्सों के बढ़ते निजीकरण से जरूरी तालमेल की मात्रा भी बढ़ती जाती है. तमाशाइयों की बेरुखी भी एक मसला है: अच्छे नेक बंदों की हिफाजत के लिए हमारे कानूनों को हाल ही में बदला गया है.
पहली प्राथमिकता बेशक दुर्घटना के मामलों को कम करना है. इंडिया टुडे से खास बातचीत में गडकरी बताते हैं, "समस्या बहुत ही गंभीर है. यहां तक कि उग्रवादी संगठनों से लड़ाई में या युद्ध में मरने वालों की संख्या भी कहीं कम होती है. सड़क हादसों में होने वाली मौतें देश के शीर्ष हत्यारों में शुमार हैं."
मानवीय पूंजी की बात करें तो उनसे भारत के जीडीपी में हर साल 3.14 फीसद का बट्टा लगने का अनुमान है. इस हफ्ते हम उस विषय पर नजर डाल रहे हैं जिसे अक्सर घिसे-पिटे ढर्रे का मामला कहकर दफना दिया जाता है. मगर सुरक्षा को किसी और दिन के लिए नहीं टाला जा सकता. आखिरकार यह जीने-मरने का मामला है.
— अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

