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क्या श्रीलंका की अराजकता में उम्मीद बनकर उभरेंगे नए राष्ट्रपति दिसानायके?

दिसानायके के लिए नई जिम्मेदारी वाकई कांटों भरा ताज है, क्योंकि श्रीलंका अब तक 2022 के आर्थिक संकट से उबर नहीं पाया है और उस पर 37 अरब डॉलर से अधिक का भारी-भरकम कर्ज है

अनुरा कुमार दिसानायके ने कोलंबो में 23 सितंबर को श्रीलंका के राष्ट्रपति का पद संभाला
अनुरा कुमार दिसानायके ने कोलंबो में 23 सितंबर को श्रीलंका के राष्ट्रपति का पद संभाला
अपडेटेड 9 अक्टूबर , 2024

श्रीलंका में 2022 में आर्थिक अराजकता के खिलाफ अरागल्या यानी गैर-राजनैतिक जन संघर्ष ने बेहद ताकतवर राजपक्षे बंधुओं को राजनैतिक सत्ता से उखाड़ फेंका. बाद में यही लगा कि यह आंदोलन अपना लक्ष्य हासिल करने के बाद खुद ही बिखर गया है. लेकिन लोगों का सत्ता-विरोधी जोश कतई कम नहीं हुआ, यह बात हाल में संपन्न राष्ट्रपति चुनाव में राजनैतिक व्यवस्था में बड़े उलटफेर के नतीजों से साफ है. अरागल्या का सबसे अधिक फायदा वामपंथी झुकाव वाले नेशनल पीपल्स पावर (एनपीपी) को मिला, जिसमें जनता विमुक्ति पेरामुना (जेवीपी) एक मुख्य घटक है.

जेवीपी को उग्र भूमिगत आंदोलन के लिए जाना जाता है, जो समाजवाद के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सशस्त्र संघर्ष के लिए प्रतिबद्ध था. हालांकि, बाद में यह मुख्यधारा का हिस्सा बन गया. देश के चुनावी इतिहास में यह पहला मौका है जब एनपीपी ने सत्ता संभाली है. राजनैतिक भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाकर राष्ट्र निर्माण करने का वादा करने वाले उसके तेजतर्रार नेता अनुरा कुमार दिसानायके ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली.

इस जीत में सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि एनपीपी का गठन 2019 में ही हुआ था. उस साल दिसानायके ने राष्ट्रपति चुनाव लड़ा था तो उन्हें केवल तीन फीसद वोट मिले थे. लेकिन पांच साल बाद स्थिति एकदम अलग रही. अरागल्या आंदोलन के समर्थक बेतरतीब दाढ़ी वाले इस बेहद मुखर 56 वर्षीय करिश्माई नेता ने पहले दौर की मतगणना में 42.3 फीसद वोट हासिल किए. उनके दोनों प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों में से समागी जन बलवेगया (एसजेबी) के सजित प्रेमदास 32.8 फीसद वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे और यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) उम्मीदवार और निवर्तमान राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे 17.2 फीसद वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे.

किसी उम्मीदवार को अपेक्षित 50 फीसद से अधिक वोट नहीं मिल पाए, इसलिए देश के इतिहास में पहली बार दूसरी वरीयता के वोटों की गिनती कराई गई. नतीजे दिसानायके के पक्ष में रहे. लेकिन एक तथ्य यह भी है कि उन्हें मुख्यत: सिंहली बहुल दक्षिणी श्रीलंका से वोट मिले, न कि उत्तर या पूर्वी क्षेत्र से जहां अधिकांशत: तमिल हिंदू और मुसलमान रहते हैं. संकेत साफ हैं कि उन्हें देश की एकजुटता के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी. यहां तीन दशक चले खूनी गृहयुद्ध का अंत 2009 में तब जाकर हुआ था, जब श्रीलंकाई सेना ने लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) के प्रमुख वी. प्रभाकरन को मार गिराया. हालांकि, उसके बाद सत्ता में आई सरकारों ने अल्पसंख्यकों के घावों पर मरहम लगाने के कोई खास प्रयास नहीं किए.

दिसानायके के लिए नई जिम्मेदारी वाकई कांटों भरा का ताज है, क्योंकि श्रीलंका अब तक 2022 के आर्थिक संकट से उबर नहीं पाया है और उस पर 37 अरब डॉलर से अधिक का भारी-भरकम कर्ज है. दिसानायके को सबसे पहले तो देश का कर्ज घटाने की वित्तीय योजना तैयार करने पर ध्यान देना होगा. उन्हें 2.9 अरब डॉलर के बेलआउट पैकेज की अगली किस्त के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) से बातचीत भी करनी होगी. आइएमएफ ने श्रीलंका सरकार को भारी आयकर लगाने और राजस्व की कमी पूरी करने के लिए अन्य कठोर उपाय करने का निर्देश दिया था.

चुनाव प्रचार के दौरान दिसानायके ने वादा किया था कि वे आइएमएफ की शर्तों में कुछ ढील दिलाएंगे. लेकिन आइएमएफ को मनाना कोई आसान काम नहीं है और उसकी मदद के बिना देश नहीं चल सकता. शपथ ग्रहण के बाद राष्ट्र के नाम अपने संक्षिप्त संबोधन में दिसानायके ने स्वीकार किया कि आर्थिक संकट से उबारने के लिए उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है. इस दिशा में उनके प्रयासों के लिए समर्थन और मदद में "आम जनता और हर क्षेत्र के लोगों की भी बड़ी जिम्मेदारी होगी."

संसद में एनपीपी के केवल तीन सांसद हैं, यही वजह है कि दिसानायके ने आवश्यक आर्थिक कार्यों के अलावा सबसे पहला निर्णय यही लिया कि संसद भंग की जाए और नवंबर मध्य में नए चुनाव कराए जाएं. फिर, उन्होंने प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता तथा एनपीपी सांसद हरिणी अमरसूर्या को प्रधानमंत्री नियुक्त किया. इसके पीछे महिलाओं का वोट हासिल करने की रणनीति भी है.

जरूरत इस बात की है कि एनपीपी संसद में बहुमत हासिल करे ताकि राष्ट्रपति की 'अत्यधिक शक्तियों' पर अंकुश लगाने और प्रांतीय शक्तियों का न्यायसंगत बनाने के लिए संविधान में संशोधन करने के पार्टी के वादे को पूरा किया जा सके. लेकिन एसजेबी और यूएनपी ने अगर हाथ मिला लिए, तो एनपीपी के लिए कुल 225 संसदीय सीटों में से साधारण बहुमत के लिए आवश्यक 113 सीटें जीतना चुनौतीपूर्ण कार्य होने वाला है. हाथ मिलाने की स्थिति में उन्हें राष्ट्रपति चुनाव में अलग-अलग हासिल वोट शेयर की तुलना में अधिक मत मिल सकते हैं.

दिसानायके अपने समाजवादी झुकाव के बावजूद काफी व्यावहारिक भी हैं और जानते हैं कि डावांडोल अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए उन्हें विदेशी निवेशकों और घरेलू निजी निवेशकों को आकर्षित करना होगा. चुनाव पूर्व पार्टी का घोषणापत्र जारी किए जाने के मौके पर अपने भाषण में उन्होंने तीन प्राथमिकताओं को रेखांकित किया था जिनमें देश के आर्थिक उत्पादन को अधिकतम करना और रोजगार उपलब्ध कराना; अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए उद्योगपतियों, व्यापारियों और विदेशी निवेशकों के अनुकूल स्थिति पैदा करना और उत्पादन, पर्यटन और समुद्री उद्योग सहित प्रमुख क्षेत्रों में नई जान डालने पर ध्यान केंद्रित करना शामिल है.

जैसा उन्होंने कहा, "हम हर निवेशक, घरेलू और विदेशी दोनों से कहेंगे कि बिना किसी हिचकिचाहट के अपने प्रस्ताव लेकर आएं. हम सिर्फ इस बात पर गौर करेंगे कि प्रस्तावित परियोजना से देश को लाभ होगा या नहीं." उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्रों में सुधार की भी प्रतिबद्धता जताई है. कुल मिलाकर, उनका लक्ष्य हर नागरिक को 'एक समृद्ध देश और एक सुगम जीवन' मुहैया कराना है.

भारत की बात करें तो उसकी सारी उत्सुकता और चिंताएं पूरी तरह दिसानायके की विदेश नीति पर केंद्रित हैं. नए राष्ट्रपति ने "मजबूत और स्थिर विदेश नीति" पर जोर देते हुए कहा है, "यह हमारी समुद्री, भूमि या वायु सीमा के किसी ऐसे इस्तेमाल की अनुमति नहीं देगी जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करती हो. साथ ही यह भी तय करेगी कि सभी आर्थिक लेन-देन देश के लिए फायदेमंद हों."

बांग्लादेश—जहां भारत ने पूरी तरह शेख हसीना सरकार का समर्थन किया था—के विपरीत श्रीलंका के मामले में विदेश मंत्रालय ने यह आश्वस्त किया कि सभी प्रमुख दलों और उनके नेताओं के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे जाएं. आर्थिक संकट के दौरान भारत ने आड़े वक्त पर करीब पांच अरब अमेरिकी डॉलर की वित्तीय सहायता देकर अपनी साख बढ़ाई है. दिसानायके ने इस साल फरवरी में भारत का दौरा भी किया और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात करने के अलावा गुजरात और केरल की यात्रा की. अमूल सहकारी संस्था के कामकाज को समझने में उन्होंने विशेष दिलचस्पी दिखाई और कहा कि वे श्रीलंका में इस डेयरी उद्योग मॉडल को अपनाना चाहते हैं.

दिसानायके ने निजी बातचीत में कथित तौर पर कहा है कि वे भू-राजनैतिक संदर्भ में एक प्रमुख किरदार और व्यापारिक साझेदार के तौर पर भारत के महत्व को समझते हैं और द्विपक्षीय संबंध बढ़ाने के इच्छुक हैं. लेकिन सार्वजनिक तौर पर यही कहा कि पवन ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की अदाणी की 10 अरब डॉलर की परियोजना की समीक्षा करेंगे.

भारत के लिए एनपीपी की चीन से नजदीकी और दिसानायके के कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) के साथ घनिष्ठ संबंध चिंता का विषय हो सकता है. इसलिए भारतीय विदेश मंत्रालय को इंतजार रहेगा कि नए राष्ट्रपति विभिन्न प्रतिद्वंद्वी ताकतों के साथ अपने देश की विदेशी नीति को कैसे संतुलित करते हैं.

बहरहाल, दिसानायके ने 2022 में अरागल्या आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी और वे भलीभांति जानते हैं कि आम लोगों में किस कदर बेचैनी है और अगर वे अगले साल अपने वादों को पूरा करने में असमर्थ रहे तो उन्हें भी जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ेगा.

कौन हैं अनुरा कुमार दिसानायके?

24 नवंबर,1968 को सेंट्रल प्रोविंस के गालेवाला में हुआ जन्म

1992-1995 में केलेनिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान मार्क्सवादी संगठन जनता विमुक्ति पेरामुना (जेवीपी) की छात्र इकाई सोशलिस्ट यूथ ऑर्गेनाइजेशन में शामिल. जेवीपी ने 1971 और 1987-89 में दो बार तत्कालीन सरकारों को उखाड़ फेंकने के लिए सशस्त्र आंदोलन किया

1990 के दशक में जेवीपी मुख्यधारा की राजनीति में शामिल

1997 में दिसानायके सोशलिस्ट यूथ ऑर्गेनाइजेशन के संयोजक बने

1998 में जेवीपी की केंद्रीय समिति के सदस्य बनाए गए और 2000 में नामित सदस्य के तौर पर संसद पहुंचे

2004 के चुनाव में कुरुनेगाला से निर्वाचित, श्रीलंका फ्रीडम पार्टी के साथ गठबंधन सरकार में मंत्री बने

2014 में सोमवंश अमरसिंघे को हटाकर जेवीपी प्रमुख बनाया गया; जेवीपी को मुख्यधारा में लाने में मदद की और भ्रष्टाचार से लड़ने और सामाजिक न्याय पर दिया

2015 के चुनाव में कोलंबो से विजयी हुए; संसद में विपक्ष के मुख्य सचेतक नियुक्त

2019 में युवा और महिला समूहों, मजदूर संघों और जेवीपी सहित वाम झुकाव वाले विभिन्न दलों के बुद्धिजीवियों के नए नेशनल पीपल्स पावर (एनपीपी) गठबंधन के राष्ट्रपति पद उम्मीदवार बनाए गए

2022 में आर्थिक संकट के दौरान जेवीपी ने अरागल्या आंदोलन को समर्थन दिया, जिसकी वजह से राजपक्षे सरकार का पतन हुआ

2024 के राष्ट्रपति चुनाव में एनपीपी उम्मीदवार के तौर पर पहली गिनती में 42.31 फीसद मत प्राप्त कर निर्वाचित. देश के सिंघली बहुल दक्षिण और मध्य में शानदार प्रदर्शन किया. एनपीपी नेता हरिणी अमरसूर्या को प्रधानमंत्री बनाया

नई दिल्ली की दृष्टि में दिसानायके
राष्ट्रपति चुनाव में दिसानायके के जीतने के बाद भारत के लिए नफा-नुक्सान के नजरिए

भारत की शुभकामनाएं श्रीलंका में भारत के उच्चायुक्त संतोष झा ने 23 सितंबर को अनुरा दिसानायके से मुलाकात की

पक्ष में
दिसानायके ने इस साल फरवरी में नई दिल्ली के निमंत्रण पर भारत का दौरा किया और विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से मुलाकात की

भारत यात्रा के दौरान गुजरात में स्थित अमूल के प्लांट का दौरा किया और श्रीलंका में भी इसी प्रकार की दुग्ध सहकारी प्रणाली स्थापित करने में रुचि दिखाई

उन्होंने भारत के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने का संकल्प लिया और पड़ोस तथा क्षेत्रीय स्तर पर इसकी अहमियत को स्वीकार किया

इस बात को बार-बार दोहराया कि 2022 के आर्थिक संकट के दौरान भारत ने श्रीलंका को चार अरब अमेरिकी डॉलर का अनुदान देकर काफी उदारता दिखाई है

चुनौतियां

दिसानायके 1980 के दशक में भारतीय 'दखलअंदाजी' के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में शामिल थे. चीन से जेवीपी के संबंधों को देखते हुए उन्हें बीजिंग के करीब माना जाता है. भारत को वहां चीन के बढ़ते प्रभाव से सतर्क रहना होगा

उन्होंने भारत-श्रीलंका के बीच समझौते के तहत देश के संविधान में हुए 13वें संशोधन का विरोध किया, जिसमें तमिल अल्पसंख्यकों को अधिकार देने के प्रावधान हैं

अदाणी की 450 मेगावाट पवन ऊर्जा परियोजना की समीक्षा करना चाहते हैं. उनका कहना है कि यह श्रीलंका की 'ऊर्जा संप्रभुता' का उल्लंघन करती है

रानिल विक्रमसिंघे ने 2023 में भारत-श्रीलंका आर्थिक साझेदारी दृष्टिकोण-पत्र पर हस्ताक्षर किए थे. भारत-श्रीलंका के बीच पुल बनाने पर सहमति थी लेकिन दिसानायके के आने के बाद इन दोनों में अनिश्चितता गहराई

दिसानायके ने एनपीपी सांसद हरिणी अमरसूर्या को प्रधानमंत्री नियुक्त किया, इससे उन्हें महिलाओं के वोट मिलने की उम्मीद

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