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प्रधान संपादक की कलम से

एक दूसरे को काटती इन तमाम अंतर्धाराओं के बावजूद इस हकीकत का दिल से स्वागत करना चाहिए कि तमाम रंग-रूप के राजनैतिक दल और निर्दलीय चुनाव में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं. आखिरकार कश्मीर का भविष्य जो गढ़ा जा रहा है

इंडिया टुडे कवर : कितना कुछ दांव पर
इंडिया टुडे कवर : कितना कुछ दांव पर
अपडेटेड 30 सितंबर , 2024

—अरुण पुरी

जम्मू-कश्मीर ऐतिहासिक मोड़ से गुजर रहा है. पूरे 10 साल बाद यहां के लोग विधानसभा के लिए वोट डाल रहे हैं. घाटी के भीतरी ग्रामीण इलाके भी घर-घर और नुक्कड़-नुक्कड़ प्रचार अभियानों से गुलजार हैं. 30 साल में पहली बार चुनाव बहिष्कार का कोई आह्वान नहीं है. मगर ऐसा भी नहीं है कि जन्नत फिर हासिल कर ली गई है और अशांति को हमेशा के लिए दफन कर दिया गया है.

राजनैतिक मिट्टी बीते दशक में आए फैसलाकुन बदलावों से अब भी खदबदा रही है. नरेंद्र मोदी सरकार ने 2019 में अनुच्छेद 370 रद्द कर दिया और लद्दाख को अलग करके जम्मू-कश्मीर का दर्जा घटाकर उसे केंद्र शासित प्रदेश बना दिया. जिन कामों पर सामान्यत: राज्य विधानसभा की मुहर लगवाना जरूरी होता, उन्हें राष्ट्रपति शासन के तहत कर दिया गया.

आम तौर पर तो इसके लिए राज्य विधानसभा की मंजूरी की जरूरत होती, मगर राष्ट्रपति शासन के तहत कर लिया गया. खुशी की बात है कि यह बहस जनभागीदारी के बीच मतदान तक ले जाई जा रही है. 18 सितंबर को मतदान के पहले चरण में अभूतपूर्व 59 फीसद वोट डाले गए, जो लोकसभा चुनाव के 58 फीसद मतदान से आगे निकल गए. इस जनादेश से जो कुछ निकलकर आता है, उस पर लोकतंत्र की सबसे पवित्र मुहर—जनाकांक्षा—की छाप होगी.

वृहद स्तर पर यह भाजपा और इंडिया ब्लॉक की सहयोगी कांग्रेस के समर्थन से लैस नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के बीच दबदबे की लड़ाई है. पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) इस त्रिकोण का बनिस्बतन छोटा तीसरा कोण है, जिसे पटकथा से भटका हुआ माना जा रहा है. परिसीमन की बदौलत जम्मू-कश्मीर की सीटें, लद्दाख के अलग होने के बाद भी, 87 से बढ़कर 90 हो गई हैं. जम्मू का हिस्सा छह सीट बढ़कर 43 हो गया है और घाटी एक के इजाफे के साथ 47 पर पहुंच गई है.

भाजपा लंबे वक्त से जम्मू-कश्मीर में अपना मुख्यमंत्री बनाने का सपना देखती आ रही है. उसे ''एनसी और पीडीपी के बिना सरकार बना'' पाने के लिए जम्मू की 30-35 सीटें जीतनी होंगी, फिर कश्मीर के सहयोगी दलों और निर्दलीयों के साथ बहुमत के आंकड़े को पूरा करना होगा. उसे पटखनी देने के लिए एनसी को घाटी की बहुतायत सीटें जीतनी होंगी और कांग्रेस भी जम्मू में इतनी पर्याप्त सीटें जीते कि भाजपा को सरकार बनाने के दायरे से दूर रख सके.

पूर्ण बहुमत के लिए जरूरी 46 सीटें जुटाना किसी भी पक्ष के लिए आसान नहीं होगा. हाल के लोकसभा चुनाव में भाजपा की कुल वोट हिस्सेदारी 2019 के 46.7 फीसद से घटकर 24.4 फीसद (जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में) पर आ गई. असंतोष की लहर—एक पूर्व उपाध्यक्ष निर्दलीय चुनाव लड़ रहे लोगों में शामिल हैं—की भरपाई के लिए वह नए चेहरों को भर्ती करती रही है. तिस पर भी लोकसभा चुनावों में उसे जम्मू और उधमपुर की 37 विधानसभा सीटों में से 29 पर ही बढ़त मिली.

सरहद पर बसे पहाड़ी जिलों राजौरी और पुंछ की आठ सीटें उसके फोकस का नया केंद्रबिंदु हैं. पहाड़ी समुदाय को जनजाति का दर्जा देने से उसकी संभावनाएं प्रबल हो गई हैं. वाल्मीकियों को मूलवासी का दर्जा और अब तक न मिले आरक्षण के लाभ देने से अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सात सीटों पर संभावनाओं के दरवाजे खुल गए हैं. भाजपा का प्राथमिक नैरेटिव राष्ट्रवाद है. उसमें उसने कई दिखाने लायक सुरंगों, पुलों और एक्सप्रेसवे के साथ विकास को भी जोड़ लिया है.

लोकसभा चुनाव में 22.3 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ एनसी ने कश्मीर की 34 विधानसभा सीटों पर बढ़त हासिल की थी. मगर उसकी दिक्कत सिर्फ यह नहीं है कि कांग्रेस जम्मू में पूरा जोर लगा पाती है या नहीं. गर्मियों में राष्ट्रीय पार्टी ने 19.4 फीसद वोट हासिल किए थे, पर वह नेताओं के पार्टी छोड़ने की मुश्किल से जूझ रही है.

एनसी के नेता उमर अब्दुल्ला कहते हैं, भाजपा की रणनीति ''जम्मू में अपना गढ़ मजबूत करते हुए घाटी के जनादेश को बांटने'' का जतन करने की है. तथाकथित राजाओं की दो-एक पार्टियां इसमें मदद कर रही हैं. हालांकि उन्होंने भाजपा के साथ जुड़ने के कलंक से बचने के लिए खुद को दूर रखा है, पर वोट काट सकती हैं. मगर शतरंज का एक और नया-नवेला मोहरा है जो इंडिया ब्लॉक के मंसूबों पर पानी फेर सकता है. पूर्ववर्ती अलगाववादियों की एक पूरी जमात पहली बार मैदान में है.

विवादों से घिरे 'इंजीनियर' रशीद ने आम चुनाव में तिहाड़ जेल से ऐसा एवजी अभियान चलाया कि बारामूला से उमर और सज्जाद लोन पर हैरतअंगेज 4,72,481 वोटों की जीत हासिल की. अब उन्हें अपनी अवामी इत्तेहाद पार्टी के 34 उम्मीदवारों के लिए प्रचार अभियान की खातिर अंतरिम जमानत दे दी गई है. हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की कट्टर सदस्य और चुनावी बहिष्कारों की नियमित समर्थक रही प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी ने भी दशकों बाद औपचारिक राजनीति में छद्म वापसी की है. उसके कई निर्दलीय उम्मीदवार भारी भीड़ खींच रहे हैं.

इस हफ्ते की आवरण कथा के लिए ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा और ग्रुप फोटो एडिटर बंदीप सिंह ने जम्मू और घाटी का चप्पा-चप्पा छाना, विभिन्न तबकों के नेताओं से मिले और भीतरी इलाकों में चुनाव रैलियों का जायजा लिया. हर राजनैतिक रंग-रूप—एनसी, पीडीपी, भाजपा, कांग्रेस, आजादी के पूर्व पैरोकारों—की आवाजों को अलग हिस्से में जगह दी गई है.

''नई दिल्ली ने हमसे जो छीन लिया, उसे वापस पाने की दिशा में यह पहला कदम है.'' अपनी पार्टी के प्रमुख अल्ताफ बुखारी के इन शब्दों से जमीनी मिजाज की झलक मिलती है. अनुच्छेद 370 और राज्य के दर्जे को लेकर राय और विचार अब भी बहुत आवेग से भरे हैं. आखिरी मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का कहना है कि कश्मीर के किसी भी समाधान को ''अनुच्छेद 370 की बहाली से शुरू होना पड़ेगा.''

लेकिन उमर का कहना है कि वे ''इतने यथार्थवादी तो हैं ही कि उन्हें पता है... इसे बहाल करने की कोशिश की लड़ाई कल खत्म होने वाली नहीं है.'' दूसरे संघीय समाधान के तौर पर इसकी बात करते हैं. ''घड़ी का कांटा पीछे घुमाने'' के सख्त खिलाफ भाजपा इस बात पर जोर दे रही है कि पुराने वक्त का ''मानसिक डर'' कैसे तिरोहित हो गया है और आतंक का ग्राफ सबसे निचले स्तर पर है.

एक दूसरे को काटती इन तमाम अंतर्धाराओं के बावजूद इस हकीकत का दिल से स्वागत करना चाहिए कि तमाम रंग-रूप के राजनैतिक दल और निर्दलीय चुनाव में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं. आखिरकार कश्मीर का भविष्य जो गढ़ा जा रहा है—वह भी बैलट से, न कि बंदूकों से.

— अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

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