एक बार फिर लद्दाख में भारत-चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) सुर्खियों में है जहां मई 2020 से भारतीय और चीनी सेनाओं की तैनाती को लेकर गतिरोध जारी है. रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में ब्रिक्स (ब्राजील-रूस-भारत-चीन-दक्षिण अफ्रीका) बैठक में हिस्सा लेने पहुंचे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने 13 सितंबर को सम्मेलन से इतर चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की. इस दौरान दोनों पक्षों ने सीमा पर गतिरोध वाले अन्य स्थानों से पूर्ण सैन्य वापसी के प्रयास तेजी करने पर सहमति जताई.
उसी दिन भारत-चीन वार्ता में प्रगति को रेखांकित करते हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि सैन्य वापसी से जुड़े 75 फीसद मसले सुलझा लिए गए हैं. कुछ लोग 'पूरी तरह सैन्य वापसी' शब्द के इस्तेमाल को बेहद अहम मान रहे हैं क्योंकि सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर वार्ता के जरिए विवाद सुलझाने के हरसंभव प्रयास कर लिए जाने के बाद दोनों देशों के बीच उच्च-स्तरीय राजनैतिक वार्ता का मंच तैयार किया जा रहा है.
माना जा रहा है कि अब इस मसले का संतोषजनक समाधान शीर्ष राजनैतिक नेतृत्व पर ही निर्भर है. वांग, डोभाल और जयशंकर के उम्मीद भरे संदेशों को जल्द ही होने वाले तीन बड़े कूटनीतिक आयोजनों से पहले ठोस जमीन तैयार करने से जोड़कर देखा जा रहा है. गौरतलब है कि सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) का 79वां सत्र होना है और अक्टूबर में कजान में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन प्रस्तावित है. फिर, अक्टूबर में ही इस्लामाबाद में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन होना है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूएनजीए सत्र में भाग लेने के लिए न्यूयॉर्क जाएंगे, जहां चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी मौजूद होंगे. मोदी और शी फिर ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (22 से 24 अक्टूबर) में भी हिस्सा लेने वाले हैं. हालांकि, एससीओ शिखर सम्मेलन के लिए पाकिस्तान ने पीएम मोदी को आमंत्रित किया है लेकिन अभी इस पर तस्वीर साफ नहीं है कि वे इसमें हिस्सा लेने जाएंगे या नहीं.
ब्रिक्स देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के सम्मेलन के दौरान मिले डोभाल और वांग भारत-चीन सीमा वार्ता प्रक्रिया के विशेष प्रतिनिधि की भूमिका भी निभा रहे हैं. बैठक के बाद जारी एक प्रेस बयान में भारत ने कहा कि "सीमा क्षेत्रों में शांति-स्थिरता और एलएसी का सम्मान किया जाना द्विपक्षीय संबंधों में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए आवश्यक है."
साथ ही उसने पिछले समझौतों के पालन की अपील भी की. हालांकि, चीनी विदेश मंत्रालय ने काफी सतर्कता के साथ बयान जारी किया. इसमें कहा गया, "दोनों पक्षों ने सीमा मसले पर हालिया वार्ता में प्रगति पर चर्चा की और माना कि भारत-चीन संबंधों की स्थिरता दोनों देशों के लोगों के मौलिक और दीर्घकालिक हित में है. साथ ही क्षेत्रीय शांति और विकास के लिए भी जरूरी है." इसमें कहा गया है कि दोनों पक्षों ने "आपसी समझ और विश्वास बढ़ाने और द्विपक्षीय संबंधों में सुधार को उपयुक्त माहौल बनाने के प्रयास करने पर सहमति जताई."
इससे दोनों देशों के नजरिये में अंतर नजर आता है. भारत गतिरोध खत्म करने के लिए स्पष्ट और उपयुक्त कदम उठाने का पक्षधर है, जबकि चीन का रुख गैर-प्रतिबद्धता वाला है, जिससे विवाद पूरी तरह निबटे बिना टकराव के जारी रहने की गुंजाइश बनी रहती है.
13 सितंबर को चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माओ निंग ने कुछ और बातें भी कहीं, "हालिया वर्षों में दोनों देशों ने मौजूदा स्थिति का आकलन करने के बाद गलवान घाटी समेत पश्चिमी सेक्टर के चार क्षेत्रों में अग्रिम मोर्चों से अपनी सेनाओं को हटा लिया है. चीन-भारत सीमा की स्थिति आम तौर पर स्थिर और नियंत्रण में है." यह बयान ऐसे समय पर आया जब एक दिन पहले ही जयशंकर ने जिनेवा सेंटर फॉर सिक्योरिटी पॉलिसी के एक संवाद सत्र के दौरान '75 फीसद' वाली टिप्पणी की थी. जयशंकर ने कहा कि जून 2020 में गलवान घाटी में झड़पों ने भारत-चीन संबंधों की 'पूरी तरह' से हिला दिया था. उन्होंने एलएसी के घटनाक्रम पर भारत का पुराना रुख भी दोहराया—सीमा पर संघर्ष की स्थिति के बाद यह नहीं कहा जा सकता कि बाकी संबंध इससे अछूते हैं.
एक सैन्य पर्यवेक्षक के मुताबिक, सैन्य वापसी से जुड़े '75 फीसद' मामले सुलझ जाने संबंधी जयशंकर के बयान का गलत आशय निकाला गया. उनका कहना है, "इसका मतलब है कि भारत ने उन बफर जोन को स्वीकार कर लिया है जहां पहले हमारे जवान गश्त पर जाते थे और जिन्हें (गतिरोध वाले बिंदुओं पर) टकराव टालने के उद्देश्य से बनाया गया था."
उन्होंने कहा कि कुछ सैनिकों को वापस बुलाए जाने के बावजूद दोनों पक्षों की तरफ से बड़े पैमाने पर सैन्य तैनाती और बुनियादी ढांचा निर्माण में तेजी के कारण विवादित सीमा पर जोखिम घटा नहीं है. लेह स्थित 14 (फायर ऐंड फ्यूरी) कोर के पूर्व कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल राकेश शर्मा (सेवानिवृत्त) कहते हैं, "अविश्वास अब भी बरकरार है. बफर जोन दोनों देशों के बीच सीधी झड़प को टालने में मददगार हो सकते हैं. लेकिन जब तक दोनों पक्ष 2020 से पहले की स्थिति में नहीं लौट जाते, तब तक सेना का पीछे हटना एक अस्थायी उपाय मात्र है." उन्होंने कहा कि स्थिति वास्तव में तभी सामान्य कही जा सकती है जब दोनों पक्ष सैन्य वापसी के साथ तनाव घटाने और अपने-अपने रुख से पीछे हटने को तैयार हों.
शर्मा ने कहा, "कूटनीतिक स्तर पर कुछ प्रगति हुई है...डेप्सांग और डेमचोक में एलएसी की स्थिति पर बात आगे बढ़ने की पूरी संभावना है." उन्होंने आगाह किया, ''इसका यह मतलब कतई नहीं कि चीन अन्य क्षेत्रों में घुसपैठ की कोशिश नहीं कर सकता. जैसा उसने यांग्त्से (दिसंबर 2022 में अरुणाचल प्रदेश में) में किया था.'' उपग्रहों से हासिल तस्वीरों से पता चला है कि चीन ने एलएसी के करीब हेलिपैड बनाए हैं. डेप्सांग-गोगरा जैसे क्षेत्रों के नजदीक सैन्य मौजूदगी इस का संकेत है कि उसने तीव्रता से तैनाती की रणनीति पर ध्यान केंद्रित कर रखा है.
बहरहाल, दोनों देशों के उच्च पदस्थ अधिकारियों ने भले ही आशावादी रुख अपना रखा हो पर मोदी और शी के व्यक्तिगत प्रयासों के सहारे ही अविश्वास की खाई को पाटा जा सकता है और एलएसी पर बिगड़ी बात को बनाया जा सकता है.
टकराव से अब तक
> लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर मई 2020 से भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने हैं
> गतिरोध दूर करने के लिए 21 दौर की सैन्य वार्ता और 31 दौर की कूटनीतिक वार्ताएं हो चुकी हैं
> गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स, पीपी-14, पीपी 17ए और पैंगांग शो जैसे स्थानों पर गतिरोध दूर हो गया है
> लेकिन डेप्सांग और डेमचोक जैसे अहम स्थानों पर गतिरोध कायम है
> एस. जयशंकर ने 13 सितंबर को कहा कि ''75 फीसद सीमा विवाद सुलझा लिया गया है''
> उसी दिन एनएसए अजित डोभाल चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मिले और सीमा विवाद के ''संपूर्ण समाधान'' का संकल्प लिया
> माना जा रहा है कि ये टिप्पणियां एक ऐसी जमीन तैयार करने का काम करेंगी जिसको आधार बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपनी अगली मुलाकात में समाधान वार्ता को आगे बढ़ा सकें
> दोनों नेताओं को संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन में न्यूयॉर्क मंी और फिर ब्रिक्स सम्मेलन (22-24 अक्टूबर) में रूस में मिलना है

