—अरुण पुरी
यह दुनिया की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी है. यह एक दशक से ज्यादा वक्त से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर राज भी कर रही है. यह दुर्लभ स्थिरता का प्रमाण है—टिकाऊ किस्म की स्थिरता जो काफी कुछ प्रतिष्ठान बन चुकी संस्थाओं को ही हासिल होती है. मोदी के कालखंड में राज्यतंत्र ने अपने को केंद्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की गहरी और प्रचंड मौजूदगी के हिसाब से बदल और संजो लिया है.
इस कदर कि भाजपा के अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने मई में यह मशहूर बात कही थी कि पार्टी अब अपना कामकाज खुद चलाने में 'सक्षम' है, जो इस बात का इशारा था कि वह अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की पिछलग्गू नहीं है. फिर भी इस जून में हुए लोकसभा चुनाव में उम्मीद से कमतर प्रदर्शन के बाद भाजपा के पैर जमीन पर उतने मजबूती से टिके नहीं हैं जितने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले दो कार्यकालों के दौरान टिके थे.
अफसरशाही में लेटरल एंट्री को वापस लेना और वक्फ (संशोधन) विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति को भेजना गलत, आधे-अधूरे और पीछे हटे कदमों के छोटे लेकिन बढ़ते पुलिंदे को उजागर करता है.
इस फेहरिस्त में सबसे नया नाम जाति जनगणना का हो सकता है, यानी वह राजनैतिक मुद्दा जिसे भगवा पार्टी ने "हिंदुओं को बांट सकने वाला" कदम बताकर हमेशा रोकने का जतन किया. भविष्य में संभवत: रुख नरम पड़ने का इशारा तब मिला जब भाजपा की वैचारिक जननी आरएसएस ने ऐसे कदम का सीमित अनुमोदन किया. इनमें से ज्यादातर भारी प्रतिष्ठा के मुद्दे हैं जिन पर भाजपा अपने तय रास्ते से हट गई है.
आम चुनाव में झकझोर देने वाले झटके के बाद पार्टी कई स्तरों पर मंथन से गुजर रही है. हाल के वक्तों में हुई जबरदस्त वृद्धि भाजपा को कामयाबी के एक छलावे की तरफ ले गई. बढ़ने की खातिर बढ़ने की विचारधारा अब उसे सता रही है. दलबदलुओं के आयात से संगठन के भीतर स्थानीय प्रतिस्पर्धा बढ़ गई.
बरसों से अथक मेहनत कर रहे पुराने लोग खुद को दरकिनार पाते हैं, जबकि पार्टी के आका विचारधारा से मुक्त उन घुमक्कड़ों या खानाबदोशों को खुश करना चाहते हैं जो उसमें या तो महज सत्ता की खातिर हैं या अपने पिछले पापों से उद्धार के वास्ते हैं. मतभेद और असहमति के अंदरूनी स्वर तेज से तेजतर होते जा रहे हैं.
इसी पृष्ठभूमि में बिहार, हरियाणा और राजस्थान के नए प्रमुख नामजद किए गए. कई अन्य राज्य इकाइयों में भी खलबली मची है. केंद्रीय स्तर पर पार्टी नया अध्यक्ष तय नहीं कर पा रही है—कुछ प्रमुख विधानसभा चुनावों में सहारे के लिए नड्डा का कार्यकाल 2025 की शुरुआत तक बढ़ा दिया गया है.
इस अनिश्चितता से आरएसएस के साथ रिश्तों का गुरुत्वाकर्षण केंद्र खिसकने की झलक मिलती है. अब इरादा परस्पर स्वीकार्य चेहरा चुनने का है, जो भाजपा की तरफ से ग्लानि भरे समझौते का संकेत है. आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की इस परोक्ष आलोचना ने कि "सच्चे सेवक को कभी अहंकार नहीं करना चाहिए", ताकत के उलटने की पूर्व सूचना दी. केरल में 2 सितंबर को अपने राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन पर आरएसएस के प्रवक्ता सुनील आंबेकर ने पितृ स्वर में इसकी यह कहकर तस्दीक कर दी कि यह 'पारिवारिक मामला' है जो 'चर्चाओं' से सुलझा लिया जाएगा.
संघ अब नैतिक अभिभावक के रूप में जोर-शोर से लौट आया है, और एक बार फिर ड्राइवर की सीट संभालने को तत्पर है. बीच मंच पर आरएसएस के विचारक राम माधव की वापसी देखिए. संकटग्रस्त राज्यों में घूमनेवाले और 'तमाम वैचारिक धाराओं में दोस्तों' के साथ वे कभी पार्टी के ताकतवर महासचिव हुआ करते थे, लेकिन 2020 में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ अनबन के बाद उन्हें बेकाम कर दिया गया. मगर अब अगस्त के आखिर में उनके पुराने मुकाम जम्मू और कश्मीर के चुनाव प्रभारी के रूप में उनके नाम की घोषणा की गई है. यह सटीक सार है कि चीजें किस तरह घूम-फिरकर वहीं लौट आई हैं.
आरएसएस राज्य इकाइयों के प्रमुखों के चयन सहित दूसरे अहम फैसलों में भी शामिल है. संघ के बड़े नाम अरुण कुमार पिछले दिनों लखनऊ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निवास पर उप-मुख्यमंत्रियों केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक के साथ नेता के 'मसले’ सुलझाते देखे गए. निरंतर कूटनीति के नतीजतन एक किस्म की सुलह हुई है, जिसमें जल्द होने जा रहे 10 विधानसभा सीटों के उपचुनाव की कमान आदित्यनाथ को संभालने दी गई है. आरएसएस के एक शीर्ष नेता ने कहा, "मौसम बदल रहा है."
इस हफ्ते की आवरण कथा में डिप्टी एडिटर अनिलेश एस. महाजन नए सिरे से किए जा रहे इस ढांचागत समायोजन की पूरी प्रक्रिया की परतें खोल रहे हैं. आगे पुनराविष्कार का बेहद अहम दौर है और उसके साथ चार प्रमुख विधानसभाओं—पहले हरियाणा और जम्मू व कश्मीर, उसके बाद झारखंड और बेशकीमती महाराष्ट्र—के चुनाव भी. दूसरे दलों के बरअक्स उसकी उस परभक्षी आक्रामकता को लेकर भी कुछ न कुछ आत्मनिरीक्षण होने लगा है जो कार्यकर्ताओं की जमात में नाराजगी की वजह थी, जनस्वीकृति के सवालों की तो खैर बात ही छोड़ दें.
मगर भाजपा के रणनीतिकारों ने वह रास्ता पूरी तरह छोड़ा नहीं है. झारखंड में जेएमएम के दिग्गज नेता चंपाई सोरेन को लाया गया है, जबकि पुराने भगवावादी बाबूलाल मरांडी को अभी तक मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर पेश नहीं किया गया है. उधर, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी अपने तत्कालीन बॉस मनोहर लाल खट्टर की लंबी छाया में उससे जुड़ी सत्ता-विरोधी भावना के बोझ से जूझ रहे हैं. महाराष्ट्र में भाजपा तोड़-फोड़ पर आमादा महा विकास अघाड़ी के खिलाफ अपनी सबसे मुश्किल लड़ाई से घिरी है. दोनों राज्यों में खोई जमीन फिर पाने के लिए पार्टी अब जनकल्याणकारी योजनाओं पर जोर दे रही है.
पहले से बता पाना मुश्किल है कि यह पुनराविष्कार किस तरह फलीभूत होगा. विधानसभा चुनावों में अगर भाजपा अपने दम पर टिकी रहती है, तो इससे उसका आत्मविश्वास मजबूत होगा. भाजपा लोचदार पार्टी है. 1984 में महज दो सीटों से वह 30 साल तक टिकी रही, जब तक कि उसने अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर लिया, उस कामयाबी को एक बार फिर दोहराया, और अब तीसरे कार्यकाल के लिए सत्ता में है. नए बदलावों से क्या उसे अपना पुराना जादू और पुराना तिलिस्म वापस पाने में मदद मिलेगी?
— अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

