scorecardresearch

बांग्लादेश में उत्पीड़न की खबरों पर क्या कहते हैं स्थानीय हिंदू संगठन?

सोशल मीडिया पर अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की खबरों और ऐसे दावों के समर्थन वाली सैकड़ों तस्वीरों और वीडियो की भरमार होने से यह पता लगाना बेहद कठिन हो गया है कि आखिर सच क्या है और झूठ क्या

ढाका में 11 अगस्त को हिंसा का शिकार बनाए जाने के खिलाफ प्रदर्शन करते हिंदू समुदाय के लोग
ढाका में 11 अगस्त को हिंसा का शिकार बनाए जाने के खिलाफ प्रदर्शन करते हिंदू समुदाय के लोग
अपडेटेड 16 सितंबर , 2024

सत्तावादी सरकार को हटाने के लिए हुई हिंसक क्रांति हमेशा अपने पीछे संघर्ष के निशान के तौर पर निर्दोष पीड़ितों की लंबी-चौड़ी जमात छोड़ जाती है. बांग्लादेश भी इसका अपवाद नहीं है, जहां 5 अगस्त को शेख हसीना को सत्ता से बेदखल कर दिया गया. इस दौरान हिंसा, लूटपाट, संपत्ति हड़पने और आगजनी की घटनाओं का सबसे ज्यादा खामियाजा अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं को भुगतना पड़ा. हिंसक दौर के बाद जहां बांग्लादेश में हिंदुओं के विरोध-प्रदर्शन बढ़े, वहीं भारत के माथे पर चिंता की लकीरें भी पड़ गईं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 16 अगस्त को बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुखिया और नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस से बात की और पूरे प्रकरण पर चिंता जाहिर की. अब यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि आखिर कहां-कितना नुक्सान हुआ. बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के सबसे बड़े संयुक्त संगठन हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद के सदस्य सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं का ब्योरा जुटाने में लगे हैं. संगठन का दावा है कि 5 से 8 अगस्त के बीच देश के 52 जिलों में सांप्रदायिक उत्पीड़न की 200 से ज्यादा घटनाएं हुईं. ये तथ्य सिर्फ प्रारंभिक सूचनाओं पर आधारित हैं. सूत्रों की मानें तो पिछले तीन सप्ताह में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की लगभग 1,500 घटनाएं हुई हैं.

हालांकि, यूनुस बार-बार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का वादा करने के साथ धार्मिक सद्भाव बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं लेकिन परिषद का कहना है कि जमीनी स्तर पर कोई बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा है.

हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद के महासचिव राणा दासगुप्ता ने चटगांव से इंडिया टुडे को बताया, "हिंसा के शुरुआती दौर की तुलना में लोगों पर हमले और संपत्ति हड़पने की घटनाओं में कमी आई है. लेकिन कट्टरपंथी अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने के नए तरीके अपना रहे हैं." दासगुप्ता के मुताबिक, हिंदू कारोबारियों को धमकाया जा रहा है कि अगर फिरौती की बड़ी रकम नहीं देंगे तो उनके प्रतिष्ठान बर्बाद कर दिए जाएंगे.

यहीं नहीं, सांप्रदायिक आधार पर जोर-जबरदस्ती भी चरम पर है—देशभर में अल्पसंख्यक समूहों के प्रिंसिपल, प्रोफेसर और शिक्षकों को इस्तीफा देने पर बाध्य किया जा रहा है. परिषद की केंद्रीय कार्यकारी समिति के सदस्य दीपंकर घोष कहते हैं, "जब हम शारीरिक दुर्व्यवहार, आगजनी, भूमि हड़पने, बलात्कार, हत्या और अन्य प्रताड़नाओं से जुड़ी घटनाओं का ब्योरा जुटा लेंगे तो इसका डेटा प्रकाशित करेंगे. हम यह मुद्दा संयुक्त राष्ट्र के समक्ष उठाने की भी तैयारी कर रहे हैं. हम जबरन इस्तीफों पर विस्तृत जानकारी जुटाने की भी कोशिश कर रहे हैं."

हालांकि, बांग्लादेश का ही एक हिंदू संगठन परिषद के दावों का खंडन कर रहा है. बांग्लादेश जातीय हिंदू महाजोत के महासचिव गोबिंद प्रमाणिक कहते हैं कि अल्पसंख्यकों के कथित उत्पीड़न की कई घटनाएं अफवाह मात्र हैं. उनका दावा है कि शेख हसीना की अवामी लीग सरकार के दौरान हिंदुओं पर अत्याचार बढ़े थे, फिर भी "सब कुछ दबा दिया गया" क्योंकि पूर्व पीएम को "अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि बरकरार रखनी थी." प्रमाणिक कहते हैं, "उन्होंने हिंदुओं को वोटबैंक के तौर पर इस्तेमाल किया और इस तरह की धारणा बना दी कि उनकी अनुपस्थिति में अन्य राजनैतिक दल हमें बांग्लादेश से बाहर कर देंगे. लेकिन उनके तानाशाही रवैये ने हिंदुओं को कभी नहीं बख्शा."

प्रमाणिक ऐसा दावा करने के मामले में एक अपवाद हैं कि 5 अगस्त के बाद से किसी भी हिंदू को केवल उसकी जातीय पहचान की वजह से नहीं मारा गया या किसी अन्य तरह से प्रताड़ित नहीं किया गया. उनके मुताबिक, अधिकांश हिंसक हमले राजनैतिक थे. वे कहते हैं, "अवामी लीग का हिस्सा रहे (हिंदू) नेताओं या उनके करीबियों पर हमला किया गया. यह उनकी धार्मिक पहचान के कारण नहीं था."

इस बीच, सोशल मीडिया पर अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की खबरों और ऐसे दावों के समर्थन वाली सैकड़ों तस्वीरों और वीडियो की भरमार होने से यह पता लगाना बेहद कठिन हो गया है कि आखिर सच क्या है और झूठ क्या. दरअसल, बीबीसी और डीडब्ल्यू के फैक्ट-चेकर्स ने सोशल मीडिया पर ऐसे कई दावों को झूठा साबित किया है. मिसाल के तौर पर, डीडब्ल्यू ने पाया कि बांग्लादेश के पूर्व क्रिकेटर और अवामी लीग के सांसद मशरफे मुर्तजा के घर में आगजनी की तस्वीरों को हिंदू क्रिकेटर लिटन दास के घर पर हमले के तौर पर पेश किया गया था. बीबीसी वेरीफाइ ने एक रिपोर्ट में दिखाया कि चटगांव में अवामी लीग कार्यालय फूंके जाने की घटना को मंदिर पर हमले के तौर पर पेश किया गया. 5 अगस्त के बाद छात्रों और मुस्लिम समुदाय के लोगों के हिंदू मंदिरों की रखवाली के कई मामले भी सामने आए हैं.

वैसे, फर्जी खबरें अक्सर वास्तविक घटनाओं को विकृत ढंग से पेश करने का ही एक रूप होती हैं. बांग्लादेश में कट्टरपंथियों, जमात-ए-इस्लामी कार्यकर्ताओं और अन्य असामाजिक तत्वों की तरफ से हिंदुओं पर अत्याचार के आरोप दशकों से लगते रहे हैं. यूनुस ने राष्ट्र के नाम अपने पहले संबोधन में कहा कि अल्पसंख्यकों पर हमले 'एक साजिश' का हिस्सा हैं और नई सरकार सबकी सुरक्षा का दायित्व निभाने को तैयार है. उन्होंने हिंदुओं के साथ एकजुटता दिखाने के लिए 13 अगस्त को पुराने ढाका में स्थित प्रसिद्ध ढाकेश्वरी मंदिर का दौरा किया. उन्होंने 26 अगस्त को जन्माष्टमी के अवसर पर हिंदू नेताओं के साथ मुलाकात भी की. बैठक के दौरान यूनुस ने कहा, "हमारी जिम्मेदारी हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा और न्याय सुनिश्चित करना है."

परिषद ने 13 अगस्त को यूनुस को लिखे एक पत्र में अपील की कि सांप्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों को मुआवजा दिया जाए और पुनर्वास की गारंटी दी जाए. संगठन ने अल्पसंख्यक संरक्षण कानून, अल्पसंख्यकों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग और विशेष मंत्रालय बनाने की मांग की और कहा कि भेदभाव उन्मूलन अधिनियम पर अमल सुनिश्चित किया जाए. इसके साथ ही अन्य मांगों में चटगांव हिल ट्रैक्ट्स समझौते और चटगांव हिल ट्रैक्ट्स क्षेत्रीय परिषद अधिनियम पर ठीक से अमल किया जाना शामिल है. इसमें स्वदेशी पहाड़ी लोगों (मुख्यत: बौद्ध) के अधिकारों को मान्यता दी गई है, साथ ही दुर्गा पूजा, प्रबर्ण पूर्णिमा (बौद्धों का त्योहार) और ईस्टर संडे पर राष्ट्रीय अवकाश का प्रावधान है.

- अर्कमय दत्त मजूमदार

Advertisement
Advertisement