अगस्त की 24 तारीख को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एकीकृत पेंशन योजना (यूपीएस) को मंजूरी दे दी, जिसके तहत सरकारी कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद एक सुनिश्चित पेंशन मिलेगी. यह योजना 1 अप्रैल, 2025 से प्रभावी होगी. यह पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) और नई पेंशन व्यवस्था (एनपीएस) के बीच का रास्ता तलाशने की कोशिश करती है. दो दशक पहले अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली भाजपा सरकार के दौरान इस विवादास्पद नई योजना के आने के बाद ओपीएस को चरणबद्ध तरीके से खत्म कर दिया गया था. यूपीएस का फायदा करीब 23 लाख केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों और इसमें शामिल होने वाले राज्य के कर्मचारियों को मिलने की उम्मीद है. कर्मचारियों के साथ-साथ रिटायर हो चुके लोगों को भी यूपीएस को चुनने या बाजार से जुड़ी अंशदायी योजना एनपीएस को जारी रखने का विकल्प होगा.
विपक्ष ने केंद्र सरकार पर लोकसभा चुनाव में कमजोर प्रदर्शन के बाद एक और 'यू-टर्न' लेने का आरोप लगाया, जबकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे "लचीले और विकल्प देने वाले राजकाज" की निशानी बताया. इससे मोदी 3.0 सरकार पर पहले ही साल 6,250 करोड़ रु. का खर्च पड़ने का अनुमान है.
सेवानिवृत्ति के बाद वित्तीय सुरक्षा हर शख्स के लिए बहुत अहम होती है. सरकारी कार्यबल (राज्य सरकारों सहित) के साथ 1 जनवरी, 2004 से पहले जुड़ने वालों के लिए एक स्पष्ट सेवानिवृति लाभ योजना थी. उन्हें अपनी आखिरी तनख्वाह पर आधारित पेंशन मिलती थी और इसमें हर कुछ साल बाद वेतन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक सुधार होता था. इस निश्चित लाभ (डीबी) योजना से कर्मचारी को सेवानिवृत्ति के बाद भी निश्चित आमदनी होती रहती थी.
जनवरी 2000 में केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को सौंपी एक रिपोर्ट में सामाजिक उद्देश्य हासिल करने के लिए डीबी पेंशन योजना के परे भी विकल्पों पर विचार करने की जरूरत पर जोर दिया गया. मगर ज्यादा अहम यह था कि इसमें भविष्य की पेंशन का भुगतान करने के लिए केंद्रीय बजट पर बढ़ते दबाव को लेकर चिंता जाहिर की गई. इसी के चलते एनपीएस लाई गई जो निश्चित योगदान (डीसी) मॉडल पर आधारित थी.
पहले चरण में यह 1 जनवरी, 2004 से कार्यबल में जुड़ने वाले केंद्र सरकार के सभी कर्मचारियों (सशस्त्र बलों को छोड़कर) के लिए शुरू की गई. कर्मचारियों के पास न कोई विकल्प था और न कुछ कहने का अधिकार; उन्हें पेंशन के लिए अपनी आमदनी के 10 फीसद का योगदान देना होता और इतनी ही रकम सरकार देती थी. 2009 में यह योजना सभी भारतीय नागरिकों के लिए खोल दी गई.
अपने स्वरूप में एनपीएस में मजबूत प्रणाली बनने की संभावना थी. मगर यह 2007-08 में ही हुआ कि कॉमन पूल में पड़े कोष का प्रबंधन करने के लिए अग्रणी संस्थानों—एसबीआई, एलआईसी और यूटीआई—की रिटायरमेंट शाखाओं को लाया गया. बुनियादी तौर पर जो लोग 2004 से 2007 तक एनपीएस का हिस्सा थे, उन्हें ईपीएफओ (कर्मचारी भविष्य निधि संगठन) पर आधारित निश्चित रिटर्न मिला. इस अवधि में ब्याज दरें 100 बेसिस पॉइंट घटीं और शेयर बाजार बढ़ रहे थे.
लिहाजा, नए सदस्य दोनों फायदों से हाथ धो बैठे. एनपीएस की रूपरेखा 2013 में पेंशन निधि नियामक और विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) अधिनियम पारित होने के बाद बीते एक दशक में बदली है, पर उसमें सरकारी कर्मचारियों का अपनी निधियों के निवेश के तौर-तरीकों पर बहुत कम नियंत्रण था. यही नहीं, एनपीएस मॉडल को बदलती परिस्थितियों के हिसाब से बार-बार अपडेट किया जाता रहा, जिससे गफलत ही बढ़ी और कर्मचारियों के बड़े तबके में इसे वापस लेने की मांग उठने लगी.
बीते दोएक साल में यह ज्वलंत सियासी मुद्दा बन गया, जब राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब जैसे राज्यों की विपक्ष शासित सरकारें ओपीएस की ओर लौट गईं. बढ़ते आक्रोश से मजबूर होकर केंद्र सरकार ने गैर-अंशदायी और वित्तीय तौर पर नुक्सानदायक ओपीएस की ओर लौटे बिना एनपीएस के फायदों में सुधार लाने के तरीके खोजने के लिए मार्च 2023 में वित्त सचिव टी.वी. सोमनाथन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया.
यूपीएस में सरकार पेंशन निधि में अपनी ओर से जरूर पैसा लगाएगी, पर इसमें सदस्यों के योगदान को भी बरकरार रखा गया है. फाइनल पेंशन में ओपीएस की तरह एक गारंटीशुदा हिस्सा होगा, जो रोजगार के आखिरी 12 महीनों के औसत मूल वेतन का 50 फीसद होगा, और एनपीएस की तरह एक बदलता रहने वाला हिस्सा होगा. इसमें ओपीएस की तरह महंगाई सूचकांकन, परिवार पेंशन और न्यूनतम पेंशन की भी व्यवस्था है. बदलने वाले हिस्से को कैसे वापस लिया जा सकता है और सरकार कैसे योगदान देगी, इसके ब्योरे ऑपरेशनल फ्रेमवर्क जारी होने के बाद साफ होंगे. बदकिस्मती से नए रिटायर होने वाले सदस्य शायद इतने खुशकिस्मत न हों, मगर यूपीएस के लागू होने के बाद रिटायर होने वाले लोगों के लिए सेवानिवृत्ति के कम तनावपूर्ण होने की संभावना है.
तीन पेंशन योजनाओं की तुलना
पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) की जगह राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) 1 जनवरी, 2004 को लागू की गई. दो दशक बाद, 1 अप्रैल, 2025 से संयुक्त पेंशन योजना (यूपीएस) लागू होने वाली है, जिसमें पहली दोनों योजनाओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई है
नियोक्ता का अंशदान
ओपीएस कोई अंशदान नहीं
एनपीएस वेतन का 10%
यूपीएस वेतन का 10%
सरकार का अंशदान
ओपीएस सरकार से वित्तपोषित
एनपीएस वेतन का 14%
यूपीएस वेतन का 18.5%
पारिवारिक पेंशन सुविधा
ओपीएस हां, पारिवारिक पेंशन उपलब्ध
एनपीएस ऐसी कोई सुविधा नहीं, यह चुनी गई एन्यूटी के प्रकार पर निर्भर
यूपीएस हां, मूल पेंशन का 60%
महंगाई इंडेक्सेशन
ओपीएस हां, डीए में इजाफे के साथ पेंशन बढ़ी
एनपीएस नहीं, पेंशन बाजार से जुड़ी
यूपीएस हां, औद्योगिक कर्मियों के लिए अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित
टैक्सेशन
ओपीएस पेंशन को आय माना जाता था और टैक्स लगता था
एनपीएस अंशदान पुरानी कर व्यवस्था के तहत टैक्स लाभ के योग्य. निकासी के वक्त 60% राशि एकमुश्त निकाली जा सकती है और यह टैक्स-फ्री है, बाकी 40% एन्यूटी के रूप में दी जाती है, पर टैक्स लगता है
यूपीएस अभी स्पष्ट नहीं
आपको क्या मिलेगा
एनपीएस
> मान लें कि कोई सरकारी कर्मचारी 2004 में एनपीएस में 10 लाख रु. प्रति वर्ष वेतन (डीए सहित) के साथ शामिल हुआ, जो हर चार साल में 10% बढ़ता गया
> मानक योगदान और 20 साल में अर्जित 8.5% ब्याज को देखते हुए, 2024 में कुल पैसा यानी कॉर्पस 1.49 करोड़ रु. होगा
> मान लें कि एन्यूटी 30 साल के लिए 6 % ब्याज पर है, तो मासिक पेंशन 85,281 रु. होगी
ओपीएस
> 2024 में कर्मचारी का अंतिम वेतन 16.1 लाख रु. होगा: 10.73 लाख रु. मूल वेतन और इसका 50% (5.37 लाख रु.) महंगाई भत्ता (डीए)
> पेंशन मूल वेतन और डीए का 50% होगी, जो 89,472 रु. महीना बैठेगी
यूपीएस
> निश्चित पेंशन पिछले 12 महीनों के औसत मूल वेतन की 50% होगी: 67,104 रु. प्रति माह. इसके अलावा, एनपीएस के जरिए एक वैरिएबल घटक जोड़ा जाएगा
बदलते हालात के मद्देनजर एनपीएस मॉडल को बार-बार अपडेट किया गया, लेकिन उससे कोई बात नहीं बनी, बल्कि भ्रम और बढ़ता चला गया
- नारायण कृष्णमूर्ति
लेखक पीएफआरडीए में पंजीकृत रिटायरमेंट सलाहकार हैं

