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जंग के बदलते हालातों में क्या होगी जीत की कुंजी, बता रहे थल सेना के पूर्व अध्यक्ष

थल सेना के पूर्व अध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे बताते हैं कि अंतरिक्ष, साइबरस्पेस, एआई—सक्षम सिस्टम—भविष्य के युद्ध क्षेत्रों में लगातार बदलाव हो रहा है. अपनी चुनौतियों से निबटने के लिए, भारतीय सेना को तकनीकी रूप से आगे रहना होगा और 'बूट्स ऑन ग्राउंड' या धरती पर मजबूती से पांव जमाए रखना होगा

इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास
इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास
अपडेटेड 6 सितंबर , 2024

दुनिया भर की सेनाओं पर हमेशा यह आरोप लगाया जाता रहा है कि वे युद्ध की जो रणनीतियां बनाती हैं वे गुजरे जमाने की हैं. जब वे भविष्योन्मुखी होना चाहते हैं, तो उन पर बहुत अधिक साइंस फिक्शन देखने के आरोप लगाए जाते हैं. सच्चाई, हमेशा की तरह इन दोनों के बीच में कहीं है.

अतीत की विज्ञान कथा आज की वास्तविकता है, ठीक वैसे ही जैसे आज की विज्ञान कथा भविष्य की सच्चाई हो सकती है. युद्धकौशल समय और जरूरत के अनुसार विकसित हुआ है. इसके चरित्र में इतना बदलाव आया है कि एक पीढ़ी पहले का सैनिक भी खुद को वर्तमान युद्धक्षेत्र की वास्तविकताओं के साथ तालमेल बिठाने में असमर्थ पाएगा.

इसी तरह, आज की पीढ़ी 20 साल बाद युद्ध के माहौल से समान रूप से भ्रमित होगी, क्योंकि तकनीक में जिस गति से परिवर्तन आज देखा जा रहा है वह अतीत की तुलना में कहीं अधिक है. देश की सशस्त्र सेनाओं को भविष्य के लिए तैयार करना है तो अतीत की अंतर्दृष्टि का उपयोग, वर्तमान के अनुभवों से सबक और भविष्य में इनका दोहन आवश्यक होगा. 

सबसे महत्वपूर्ण पहलू है कि हम उस 'श्रेष्ठता या बढ़त' को पहचानें और उसे अपने नियंत्रण में लेने में सक्षम हो जाएं, जो जीत के लिए बहुत जरूरी है. अतीत में जो पक्ष पहाड़ की चोटियों पर दबदबा बनाए रखता था वह निश्चित रूप से लाभ में होता था, क्योंकि इससे न केवल उनकी स्थिति अधिक सुरक्षित हो जाती थी, बल्कि वह यह भी देख सकता था कि 'पहाड़ी के दूसरी तरफ' क्या है.

आगे चलकर इस 'उच्च स्थान या हाई ग्राउंड' का स्वरूप बदला और वर्चस्व ऊंचे स्थान पर कब्जा जमाए पक्ष का न रहकर उसका हो गया जिसका वायु क्षेत्र पर अधिक दबदबा हो. अब सफल जमीनी अभियानों के संचालन के लिए वायु क्षेत्र पर प्रभुत्व एक पूर्व-आवश्यकता बन गई है. हम इसके आगे कहां जाएंगे? 

जनरल (डॉ.) मनोज मुकुंद नरवणे (सेवानिवृत्त)

अंतरिक्ष भविष्य का क्षेत्र हो सकता है, जिसमें साइबर-स्पेस भी शामिल है. अंतरिक्ष-आधारित हथियार प्रणाली और ऐंटी-सैटेलाइट सिस्टम (एएसएटी) विकसित करने के प्रयास जोर-शोर से जारी हैं. इसी तरह नियर अर्थ ऑर्बिट यानी पृथ्वी की कक्षा के निकट और हाई एल्टीट्यूड सूडो सैटेलाइट या ज्यादा ऊंचाई वाले छद्म उपग्रह (एचएपीएस) विकसित करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं.

ये सब इस बात का संकेत देते हैं कि भविष्य के युद्ध कहां लड़े जा सकते हैं. इस युद्ध में साइबर युद्ध की प्रमुख भूमिका होगी. मूल रणनीति नहीं बदली है, केवल उसे लागू करने का स्थान और तरीका बदला है. भारत ने तीनों रक्षा सेवाओं के लिए एक संयुक्त साइबर एजेंसी बनाई है जिसका नेतृत्व टू-स्टार जनरल या उसके समकक्ष करेंगे. हम युद्ध के थिएटर कमान बनाने की जिस प्रक्रिया में हैं, उसमें इसे भी कमान का स्वरूप देने का यह सही समय है. 

एआई समर्थित मानवरहित प्रणाली

अभी आवश्यकता है कि हम इस बात की गहन समीक्षा करें कि युद्ध लड़ने की हमारी अपनी पद्धति और हमारे हथियारों पर, क्वांटम तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) सहित तकनीकी विकास के हर अहम पहलू का कितना प्रभाव है. युद्धक्षेत्र में बदलाव की प्रक्रिया अब थमने वाली नहीं. नई हथियार प्रणालियों को लगातार विकसित करना होगा और मौजूदा हथियारों को बदलती परिस्थितियों के अनुकूल बनाना होगा.

हालांकि रणनीति, तकनीक और प्रक्रियाओं में बदलाव से मौजूदा हथियारों की कमियों को घटाया जा सकता है, लेकिन वर्तमान संघर्षों से सबक लेते हुए मुख्य युद्धक टैंक, विमान वाहक और वाले अन्य बड़े लड़ाकू विमानों और मानवयुक्त विमानों के भविष्य पर गहराई से नजर रखने की आवश्यकता है. भविष्य में बड़ी संख्या में कम लागत वाली एआई सक्षम मानवरहित प्रणालियां इनकी जगह ले सकती हैं.

समसामयिक ऐड-ऑन या दूसरे उपायों के साथ मौजूदा हथियार बहुत बोझिल हो गए हैं. इसके अलावा, मौजूदा हथियारों की ज्यादा लागत कमांडरों को युद्ध में उतरने में झिझक की वजह बन सकती है. भारतीय सेना के आधुनिकीकरण के प्रयासों को उन प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो इसे अधिक चुस्त, तकनीकी रूप से उन्नत और विविध सुरक्षा चुनौतियों से निबटने में सक्षम बनाएंगे. 

प्रौद्योगिकी/उपकरण को उन्नत बनाने के लिए, सेना को अपनी पुरानी राइफलों को बदलकर उनकी जगह आधुनिक असॉल्ट राइफल/कार्बाइन की जरूरत है. इसे उन्नत हॉवित्जर और रॉकेट सिस्टम भी हासिल करना है और विमान-रोधी और ड्रोन-रोधी क्षमताओं को बढ़ाना है. सुरक्षित, एकीकृत संचार नेटवर्क को उन्नत बनाना भी महत्वपूर्ण है. 

हाल के दशकों में साइबर सुरक्षा का महत्व बढ़ गया है. इस प्रकार, साइबर खतरों के खिलाफ सुरक्षा को मजबूत करना और आक्रामक साइबर क्षमताओं को विकसित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. तेजी से तैनाती और अपनी जगह पर मजबूती से डटे रहने की क्षमताओं में सुधार करना और सीमा क्षेत्रों पर बुनियादी ढांचे को बढ़ाना भी महत्वपूर्ण है.

सशस्त्र बल अत्यधिक कुशल पेशेवरों के साथ ही सफल होते हैं. सैनिकों, विशेष रूप से अग्निवीरों के लिए प्रशिक्षण और कौशल विकास, और अन्य के लिए नेतृत्व विकास और संयुक्त संचालन प्रशिक्षण, अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकियों में निवेश करने से विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम होती है.

अनुसंधान संस्थानों और निजी क्षेत्र के साथ सहयोग से इसे हासिल किया जा सकता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रौद्योगिकी ही युद्ध का चरित्र गढ़ेगी. हालांकि, मानव संसाधन और प्रौद्योगिकी के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है. सदियों से तकनीकी विकास के बावजूद, 'जमीन पर पांव जमाए रखना' अब भी उतना महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि जिसका धरती पर दबदबा ज्यादा होगा, अंतत: वही सिकंदर कहलाएगा. 

इतिहासकार टी.आर. फेहरनबैक के शब्दों में, ''आप किसी भूमि पर हमेशा उड़ते रह सकते हैं; आप उस पर बमबारी कर सकते हैं, परमाणु विस्फोट कर सकते हैं, और उस पर से जीवन का नामोनिशान मिटा सकते हैं, लेकिन अगर आप उसकी रक्षा करना चाहते हैं...तो आपको उसे जमीन पर ही करना होगा, जैसे रोमन सेनाओं ने किया था.''

अपने सैनिकों को धरती पर उतारकर. यह बुनियादी सच्चाई नहीं बदली है. यूक्रेन में चल रहा युद्ध इस बात का प्रमाण है. हमारे युद्ध हमारे सैनिक, नौसैनिक और वायुसैनिक रेत, कीचड़ और बर्फ में; रेगिस्तानों, मैदानों, पहाड़ों और जंगलों में लड़ेंगे; जीत को जमीन, समुद्र और हवा पर वर्ग किलोमीटर में मापा या जीता जाता है.  

ज्ञात चीजों पर ध्यान केंद्रित करना मानवीय स्वभाव है. सैन्य रणनीतिकारों और योजनाकारों के लिए समय की मांग है कि वे उन स्थानों में झांकें जहां हमने अब तक ध्यान नहीं दिया और उन्ही अज्ञात स्थानों में उत्तर तलाशें. यह पूर्व-स्थापित अवधारणाओं को त्यागने और पूर्वाग्रहों पर काबू पाने मात्र से ही संभव होगा.

किसी एक पक्ष पर अत्यधिक निर्भरता, विशेषकर यह सोच कि प्रौद्योगिकी स्वयं युद्ध जीत लेगी, गलत है. बेशक मनुष्य प्रौद्योगिकी की तरह पूर्णत: दोषरहित न हो लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि अपूर्णताओं के बावजूद, जिस दिन प्रौद्योगिकी मनुष्य का स्थान ले लेगी, उस दिन मानवता का अंत हो जाएगा.

- जनरल (डॉ.) मनोज मुकुंद नरवणे (सेवानिवृत्त)

(लेखक थल सेना के पूर्व अध्यक्ष हैं)

लंबी छलांग 

> बदलावों को ध्यान में रखते हुए संघर्षों के लिए नई हथियार प्रणालियों को लगातार विकसित करना होगा.

> उन्नत असॉल्ट राइफल, हॉवित्जर तोप, बेहतर साइबर सुरक्षा और रणनीतिक परिवर्तनों की सेना को जरूरत है.

> स्वदेशी प्रौद्योगिकी, समन्वय बनाकर काम करने का दृष्टिकोण और थिएटर व्यवस्था में निवेश की भी जरूरत है.

> टेक्नोलॉजी अपने आप युद्ध नहीं जीतेगी. युद्ध में इंसानी भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण होगी.

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