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सामाजिक समस्याओं को सुलझाने में तकनीक का इस्तेमाल से कैसे बन सकता है भारत विश्वगुरु?

विकसित देशों की तरह बड़ी पूंजी के बजाए तकनीक से समस्याएं सुलझाना भारत के लिए फायदेमंद

कृषि में तकनीक की मदद से नतीजे हासिल करने की अपार संभावनाएं मौजूद
कृषि में तकनीक की मदद से नतीजे हासिल करने की अपार संभावनाएं मौजूद
अपडेटेड 6 सितंबर , 2024

‘मेक इन इंडिया’ ने स्थानीय स्तर की मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दिया है लेकिन यह सिर्फ बाहर से लाई गई टेक्नोलॉजी और कलपुर्जों को असेंबल करने का ही काम है. नतीजा, इससे बहुत कुछ हासिल होने वाला नहीं है. अगर हम विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखते हैं तो हमें भारत में डिजाइन और विकास करने, और जहां तक संभव हो, स्थानीय घटकों का इस्तेमाल करने, उत्पादन के लिए मशीनरी बनाने और उत्पादों के लिए आईपीआर में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखने की जरूरत है. हमें कम से कम कुछ क्षेत्रों में खुद को टेक्नोलॉजी लीडर्स में शुमार कराना होगा. हम यह कैसे कर सकते हैं? यह जानने के लिए हमें सबसे पहले भारत की ताकत को समझना होगा:

हमारे पास उच्च गुणवत्ता की विशेषज्ञता वाले युवा वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की संख्या बढ़ रही है. उन्होंने बेहतरीन प्रशिक्षण हासिल किया है. अगर इन्हें सही मायने में सहयोग और बढ़ावा मिले तो वे आगे बढ़ने और नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.

हमारे पास नए इंजीनियरिंग स्नातकों का एक बड़ा समूह है जो साधारण कॉलेजों से पढ़े होने के बावजूद अच्छे हो सकते हैं. उन्हें लंबे समय तक कड़ी मेहनत करने, एक-दूसरे से सीखने और असंभव चुनौतियों को लेने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए. अच्छी बात यह है कि भारत में ऐसी प्रतिभा की लागत दूसरी जगहों की तुलना में बहुत कम है.

हमारे पास बहुत बड़ा बाजार है, लेकिन सिर्फ किफायती उत्पादों के लिए. इस तरह के उत्पादों को विकसित करने का काम चुनौतीपूर्ण है, अगर हम उनसे निबट पाएं तो टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अग्रणी स्थान हासिल करने की ओर बढ़ सकते हैं.

इन खूबियों को देखते हुए हम क्या करें? हमें निश्चित तौर पर अनुसंधान, विकास और उत्पाद डिजाइन में निवेश की जरूरत है. लेकिन जब हम एआई क्षेत्र में 10 करोड़ डॉलर का निवेश करते हैं तो अमेरिका जैसे देश कई सौ करोड़ डॉलर का निवेश करेंगे. बहुत ज्यादा पूंजी निवेश वाले क्षेत्रों में पश्चिम के साथ सीधे प्रतिस्पर्धा की कोशिश करने पर भी हम बहुत आगे नहीं बढ़ पाएंगे.

इसके बजाए, हमें उन बड़ी समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है, जिनका हमारे समाज को सामना करना पड़ रहा है. हमारे पास अभी इनका कोई समाधान नहीं. अगर हम अलग तरीके से सोचते हैं और विभिन्न क्षेत्रों से टेक्नोलॉजी एक्सपर्टीज को साथ लाते हैं तो हम सही दिशा में आगे बढ़ पाएंगे. हमें बहुत मेहनत करनी होगी. हमें आगे बढ़ना है तो नाकाम होने, गिरने और फिर से उठकर खड़े रहने के लिए तैयार रहना होगा. हम ऐसी विकट समस्याओं का जैसे-जैसे समाधान निकालते जाएंगे, हम कई हल्कों में प्रौद्योगिकी के मायने में अग्रणी बनकर उभरने लगेंगे.

क्रांतिकारी व्यवस्था: इसे समझाने को मैं दो मिसालें देता हूं. आज, चेन्नै जैसे शहर में घर और दफ्तर के बीच करीब 15 किलोमीटर के सफर में एक घंटे से ज्यादा समय लगता है. रोज आने-जाने में दो घंटे से ज्यादा समय बर्बाद करना हमारा भविष्य नहीं हो सकता. बढ़ते शहरी प्रवास और अपनी गाड़ियां होने के साथ इसके और भी खराब होने की आशंका है. मान लीजिए कि हम ऐसी परिवहन प्रणाली डिजाइन करते हैं जो इस सफर को 20 मिनट में संभव बना सके, यहां तक पीक टाइम में भी.

इसके अलावा कुछ अन्य मुद्दों पर ध्यान दिया जाए. मसलन, ऊर्जा बचाने वाली परिवहन परिवहन प्रणाली (उड़ने जैसे विचारों को छोड़कर) और केवल हरित बिजली का उपयोग करें. आने वाले समय के पीक ट्रैफिक का अंदाजा हो और बेहद आरामदायक परिवहन मुहैया कराया जाए (जैसे एयर कंडिशनर के साथ). मौजूदा शहरों को उनकी सभी बाधाओं के बारे में सोचकर तैयार किया जाए और कुल लागत (अवमूल्यन, ब्याज और संचालन खर्च सहित) दो-पहिया से सफर करने की तुलना में भी कम हो.

ऐसी प्रणालियों की कल्पना करना, बनाना और उन्हें चालू करना भारत के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य जगहों पर भी भीड़भाड़ वाले शहरों के लिए गेमचेंजर साबित होगा. इसके लिए कई तकनीकी जरूरतें होंगी और यही हमें विश्व में अग्रणी बनने की तरफ ले जाएंगी.

वर्चुअल एक्सपर्ट्स: एक और भारतीय समस्या को लेते हैं. करीब 70 फीसद भारतीय परिवारों की मासिक आय 15,000 रुपए से कम है. और जब ऐसे घर की कोई महिला कुटीर उद्योग शुरू करना चाहती है और मात्र एक लाख रुपए के कर्ज की जरूरत होती है तो पहला विकल्प हमेशा अनौपचारिक स्रोतों का होता है, जहां वार्षिक ब्याज दरें 36-60 फीसद जितनी ऊंची हो सकती हैं. पिछले 15 वर्ष में माइक्रोफाइनेंस और एनबीएफसी लगभग 25 फीसद ब्याज दरों पर ऐसे कर्ज मुहैया करने के लिए उभरे हैं.

उनके फंड की लागत, जोखिम की लागत और संचालन लागत ऐसी है कि दरों को और कम करना गंभीर चुनौती है. ऐसे विशेषज्ञ हैं जो महिला से उसके घर मिल सकते हैं, उसके साथ करीब 10 मिनट तक बात कर सकते हैं और हर सवाल को ध्यान से सुनते हुए अगले सवाल के लिए तैयार रह सकते हैं ताकि कर्ज से जुड़े जोखिम का सही आकलन किया जा सके. समस्या यह है कि ऐसे विशेषज्ञ बड़े पैमाने पर नहीं होते और किसी अनुभवहीन व्यक्ति को भेजने से जोखिम काफी बढ़ जाएगा.

मान लीजिए कि हम एआइ, वीडियो और स्पीच प्रोसेसिंग जैसी तकनीकों का लाभ उठाकर एक मीठी आवाज वाला वर्चुअल एक्सपर्ट भेजते हैं, जो महिला के साथ स्थानीय भाषा-बोली में बात करता है. यह हर जवाब के शब्दों, भावों और लहजे की जांच करेगा और महिला और उसके वित्तीय लेन-देन के बारे में कोई भी जानकारी खोजेगा ताकि अगला सवाल पूछा जा सके.

इससे हम न सिर्फ व्यवसाय और कर्ज से जुड़े जोखिमों का निर्धारण करने में सक्षम होंगे, बल्कि कलेक्शन के लिए भी ऐसी कॉल्स का उपयोग किया जा सकता है. इससे लागत काफी कम हो जाएगी और 15 फीसद ब्याज दर पर कर्ज मिलना आसान हो जाएगा. ऐसा कोई कारण नहीं कि भारत ऐसी तकनीक का निर्माण न कर सके, इसे बेहतर बनाने के लिए इसका व्यापक उपयोग न कर सके और इसे दुनिया तक न पहुंचा सके.

असल में, दुनिया में टेक्नोलॉजी में अगुआ बनने के लिए कई बड़े रास्ते हैं. वहां हम तभी पहुंच सकते हैं जब कुछ नया और अनूठा सोचें और दृढ़ इच्छाशक्ति पर आंच न आने दें.

— अशोक झुनझुनवाला

लेखक आईआईटी मद्रास के इंस्टीट्यूट प्रोफेसर हैं

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