भारत ज्यों-ज्यों वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में बढ़ रहा है, लॉजिस्टिक सेक्टर इस महत्वाकांक्षा के बेहद अहम संचालक के रूप में उभर रहा है. देश भर में और सरहदों के पार वस्तुओं और सेवाओं की दक्ष आवाजाही आर्थिक वृद्धि की सूत्रधार ही नहीं बल्कि बुनियादी उत्प्रेरक भी है. इसकी क्षमता और संभावनाओं को सचमुच साकार करने और 2047 तक 'विकसित भारत' का दर्जा हासिल करने के लिए भारत को अपनी लॉजिस्टिक क्रांति को जारी रखना होगा और उसके लिए चार क्षेत्रों पर ध्यान देना होगा—बुनियादी ढांचे का विकास, 3पीएल (थर्ड-पार्टी लॉजिस्टिक) और 4पीएल (फोर्थ-पार्टी लॉजिस्टिक) सेवा प्रदाताओं का विकास और इन्हें आउटसोर्स करना, परिसंपत्तियों का कुशलतम उपयोग और डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (डीपीआइ) का लगातार इस्तेमाल.
बुनियादी ढांचा—अर्थव्यवस्था की रीढ़: बुनियादी ढांचे पर ध्यान देने से लॉजिस्टिक क्रांति का सूत्रपात होने लगा है. सरकार ने भारतमाला परियोजना, समर्पित माल गलियारा (फ्रेट कॉरिडोर) परियोजना और सागरमाला परियोजना सरीखी विभिन्न पहलों पर अमल के जरिए मजबूत प्रतिबद्धता दिखाई है. हाल के बजटों में बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर देने के साथ पूंजीगत खर्च के लिए अच्छी-खासी धनराशि आवंटित की गई है. 2024 के बजट में ही 11.11 लाख करोड़ रुपए रखे गए हैं. इस निवेश का अर्थव्यवस्था पर बहुगणक असर होता है, जिसका फायदा लॉजिस्टिक और आपूर्ति शृंखला के संचालन सहित विभिन्न क्षेत्रों को मिलता है. लॉजिस्टिक में इससे सड़क और दूसरे क्षेत्रों में टर्नअराउंड टाइम यानी उत्पादन की पूरी प्रक्रिया में लगने वाले समय को कम करने में मदद मिलेगी, जिससे खासकर खराब होने वाली वस्तुओं के लीड टाइम यानी उन्हें ग्राहक तक पहुंचाने में लगने वाला समय कम करने में मदद मिलेगी. मसलन, जहाजरानी क्षेत्र में टर्नअराउंड समय में 2 से 3 दिन की अच्छी-खासी कमी आई है, लेकिन विश्वस्तरीय होने के लिए हमें अमेरिका से एक दिन और जापान से 0.32 दिन बेहतर होने की जरूरत है.
आउटसोर्स करना और परिसंपत्तियों का इस्तेमाल: भारत वैश्विक शक्ति के रूप में उभरे और सर्वश्रेष्ठ आपूर्ति शृंखला बना पाए, इसके लिए आउटसोर्सिंग यानी बाहरी स्रोतों को काम सौंपने को यथासंभव प्रभावी और लागत-दक्ष तरीके से करना होगा. 3पीएल/4पीएल सेवा प्रदाता मांग को जोड़ते हैं, बड़े पैमाने की यानी अधिक उत्पादन के बूते कम लागत वाली अर्थव्यवस्था से लाभ उठाते हैं, और टेक्नोलॉजी-आधारित डिजिटल समाधान प्रदान करते हैं जो लचीले होते हैं और जिन्हें मापा भी जा सकता है. भारत में प्रतिशत के लिहाज से ट्रक की क्षमता का उपयोग उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले अब भी काफी कम है और ट्रांसपोर्टेशन ही आउटसोर्सिंग का आरंभ बिंदु है!
आउटसोर्सिंग परिसंपत्तियों के ज्यादा इस्तेमाल की कुंजी भी है. लॉजिस्टिक जरूरतों के लिए विकसित बुनियादी ढांचे का पूरी क्षमता से इस्तेमाल करने की जरूरत है, जो 3पीएल/4पीएल सेवा प्रदाताओं के जरिए गतिविधियों को जोड़कर असरदार ढंग से किया जा सकता है. इस तरह तय समय में अधिक नतीजे हासिल करने से कारोबार की लागत में कमी आती है और साथ ही कार्बन फुटप्रिंट भी कम होता है.
डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्टक्चर—दक्षता और नवाचार को बढ़ावा: भारत की लॉजिस्टिक क्रांति का एक बेहद अहम स्तंभ उन्नत टेक्नोलॉजी को अपनाना और डीपीआइ का असरदार इस्तेमाल करना है. लॉजिस्टिक संचालन को कुशलतम बनाने और प्रतिस्पर्धात्मकता को बनाए रखने के लिए अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी को गले लगाना बेहद जरूरी है. डिजिटल जानकारियों और अनुभव का लाभ उठाकर लॉजिस्टिक क्षेत्र को अलग और बेहतर फर्क डालने वाले क्षेत्र में बदला जा सकता है, जिससे वैश्विक शक्ति के रूप में भारत की स्थिति मजबूत होगी.
यूएलआइपी पोर्टल, ई-वे बिल और जीएसटी डेटा पॉइंट के जरिए मौजूद समृद्ध डेटा और नए जमाने की टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से रूट ऑप्टिमाइजेशन, नेटवर्क प्लानिंग और इनवेंट्री मैनेजमेंट के जरिए काफी बेहतर नतीजे हासिल होंगे, जिससे समूची आपूर्ति शृंखला में दक्षता बढ़ाना और आसान होगा.
छोटे पैमाने के संचालकों को सहारा: भारत के लॉजिस्टिक क्षेत्र का छोटे-छोटे हिस्सों में बंटा होना, जिनका संचालन मुख्यत: छोटे पैमाने के संचालक करते हैं, फायदेमंद हो सकता है. ये संचालक अपनी आजीविका और वृद्धि की खातिर और साथ ही डिलिवरी की लागत कम करने के लिए नकदी के सृजन पर जोर देते हैं. बड़ी कंपनियों को इन छोटे पैमाने के खिलाड़ियों को टेक्नोलॉजी और डेटा से जोड़ते हुए उन्हें वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में समाहित करके उनकी ऊर्जा का व्यवस्थित प्रयोग करना चाहिए. इससे छोटे संचालकों को कस्बों और ग्रामीण इलाकों में सेवाएं प्रदान करने के लिए लॉजिस्टिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और डीपीआइ तक की सुविधा हासिल करने में मदद मिलेगी.
कायापलट का सामर्थ्य: 1947 में 30 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था से मौजूदा 39 खरब डॉलर तक का भारत का सफर, जहां वह दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, उसकी क्षमताओं का प्रमाण है. वैश्विक शक्ति और आपूर्ति शृंखला का केंद्र बनने के लिए देश को अपनी डिजिटल रीढ़ यानी रोज-रोज इकट्ठा और लगातार संवर्धित किए जा रहे समृद्ध डेटा की अनूठी ताकत का लाभ उठाना होगा, ताकि वह छलांग लगाकर विकसित देशों से भी आगे निकल सके. इस मौके का पूरा फायदा उठाने के लिए बुनियादी ढांचे में लगातार निवेश करते रहना, डेटा विजिबिलिटी यानी सारा डेटा हासिल करने और देखने की क्षमता बढ़ाना, और डीपीआइ व परिसंपत्तियों का कुशलतम इस्तेमाल करना बेहद जरूरी है. आज जब हम 2047 में विकसित भारत की तरफ बढ़ रहे हैं, मजबूत और दक्ष लॉजिस्टिक क्षेत्र निस्संदेह हमें वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ाने वाले मुख्य संचालकों में से एक होगा.
भारत में वैश्विक शक्ति बनने के लिए सभी जरूरी चीजें तैयार हैं और यह अगले कुछ साल में आगे बढ़ने की अनुकूल परिस्थितियां प्रदान करने के लिए साथ आ रहे अवसरों का दुर्लभ संगम है. लॉजिस्टिक क्षेत्र और कंपनियों को अपने और देश के फायदे के लिए इसका भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए.
आर. दिनेश
लेखक टीवीएस सप्लाइ चेन सॉल्यूशंस के चेयरमैन हैं

