- अरुण पुरी
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने 2003 में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में कहा था, ''मुझे कोई संदेह नहीं है कि भारत महाशक्ति बनेगा. लेकिन कैसी महाशक्ति? आप जरूर वैश्विक महाशक्ति और उचित तरह की महाशक्ति बनें.'' वैश्विक महाशक्ति होने का क्या मतलब है और उचित तरह का क्या होता है भला? भारत पहले ही कई मायनों में दिग्गज देश है: सबसे बड़ी आबादी, पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, सातवां बड़ा भौगोलिक आकार, और सबसे बढ़कर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र.
राष्ट्रपति क्लिंटन का मतलब शायद यह होगा कि 'चीन जैसी महाशक्ति न बने,' जो घर में निरंकुश और विदेश में 'वुल्फ वॉरियर' (चीन की झगड़ालू भेड़िया रणनीति को पश्चिमी विश्लेषक यही कहते हैं) कूटनीति अपनाता है. तो उचित तरीके की वैश्विक महाशक्ति कैसे बना जा सकता है? जवाब इस पर निर्भर है कि हम सवाल से क्या अर्थ निकालते हैं. ऐसी वैश्विक आवाज जिस पर दूसरे देश गौर करें? महाशक्ति वाला रुतबा हो? आर्थिक महाशक्ति हो?
मौजूदा सरकार की महत्वाकांक्षा 2047 तक विकसित भारत बनाने की है. हम इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सही राह पर लगते हैं. वैश्विक मंदी के बावजूद हमने 1990 के दशक के मध्य से 6.5 फीसद की स्वस्थ विकास दर बनाए रखी है. महज निरंतरता हमें ऊपर ले जाएगी: तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना निकट है. लेकिन हम सिर्फ रफ्तार की धुन नहीं चाहते. हमें करोड़ों लोगों को अभाव, अपमान और निम्न स्तर के जीवन से छुटकारा दिलाना है. इससे हमारी क्षमताओं का विस्तार शुरू होगा और हम उचित तरीके के वैश्विक दिग्गज बन सकेंगे.
स्वतंत्रता दिवस के इस विशेषांक में देश के सामने विकट चुनौतियों को 10 मुख्य क्षेत्रों में बांटा गया है. यह हमारी संपादकीय टीम के व्यवस्थित लेखों, खास सेक्टर्स के चोटी के विशेषज्ञों के अतिथि निबंधों का संकलन है. कुल 29 विशेषज्ञ चुनौती के विभिन्न पहलुओं को खंगालते हैं. इसे भारत के लिए सामूहिक रूप से लिखी गई पटकथा की तरह सोचें, यानी भविष्य के लिए एक विशेषज्ञ रोडमैप.
ऐसा खाका तैयार करना जरूरी है. हम शायद इकलौते देश हैं जो कई सदियों से गुजर-बसर करने लायक खेती से लेकर दुनिया की सबसे उन्नत रॉकेटरी तक को साथ लिए चल रहे हैं. ज्यादातर मामलों में इनकी परतें एक साथ नहीं जुड़ पातीं; वे तेल और पानी के मेल जैसी रहती हैं. देश के विकास का कोई वाजिब मॉडल इन घटकों को जोड़ने और उन्हें एक दिशा में काम करने को प्रेरित करेगा.
हमारे शुरुआती दशकों की आलोचना की जाती है कि उद्यमशीलता की भावनाओं पर नियंत्रण जड़ दिए गए और अक्षम सरकारी संस्थाओं पर अधिक निर्भर रहा गया. हमारा मुल्क उद्यमियों का है, जिनकी ताकत को खुलकर सामने आने देना जरूरी है. अब हम जब 2047 के लिए अपनी प्राथमिकताएं नए सिरे से तय करने बैठे हैं तब यह उचित न होगा कि एक दस्ता जब तक अपने को चाक-चौबंद न कर ले तब तक दूसरे को भी रोककर ही रखा जाए.
पहली अनिवार्यता तो यह है कि हम एक कार्ययोजना बनाएं, ताकि हम जीडीपी वृद्धि को अगले दो दशकों तक सालाना 8 फीसद दर पर बनाए रखें. यह न्यूनतम सीमा है, अधिकतम नहीं. दूसरे, कि हम माल ढुलाई की क्षमता को जिन ऊंचाइयों तक ले जाना चाहते हैं उसके लिए हाई-स्पीड रेल और एक्सप्रेसवे, बंदरगाह और हवाई अड्डों के जाल की दरकार है, जो हमें एक-दूसरे से और विश्व बाजारों से जोड़ें.
साथ ही, विचारों और सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए गहरा डिजिटल नेटवर्क भी जरूरी है. यह बुनियाद तीसरे चरण को ताकत देगी. देश उद्योग 4.0 की ओर छलांग लगाएगा. हमारा औद्योगिक वातावरण कैसा होना चाहिए? लेखक-उद्योगपति नौशाद फोर्ब्स कहते हैं कि हमें ''जर्मनी जैसा भविष्य तलाशना चाहिए, जिसमें हजारों विशेषज्ञ विश्व अगुआ हों, न कि चीन या दक्षिण कोरिया जैसा, जिसमें कुछेक दर्जन लोग विशाल राज्य-प्रायोजित चैंपियन होते हैं.''
इससे चौथी शर्त निकलती है: महत्वपूर्ण और उभरती हुई टेक्नोलॉजी हमारी अपनी प्रयोगशालाओं में विकसित हो, ताकि हम न केवल दुनिया के साथ कदम मिलाए रखें, बल्कि उसका नेतृत्व भी करें.
तकनीक सबको सक्षम बनाती है. और अंतरिक्ष टेक्नोलॉजी आम तौर पर दोहरे उपयोग वाली होती है. यह ऐसे क्षेत्र को चिन्हित करती है जहां भारत अगुआ बनने के लिए तैयार है. जमीनी क्षेत्र में सुरक्षित देश को एक अभेद्य किले की दरकार होती है, जिसके लिए सैटेलाइट इमेजरी को भू-स्थानिक निगरानी और रोकथाम दोनों के मकसद से अत्याधुनिक ड्रोन, पनडुब्बियां और मिसाइल प्रणालियां सब जुड़ती हैं.
लेकिन मौसम की भविष्यवाणी अंतरिक्ष को एक अन्य सांसारिक मसले से जोड़ती है और वह है कृषि. हमें किसानों को पारंपरिक अनाज की फसलें उगाने की आदत से दूर ले जाना चाहिए, और बागवानी, डेयरी और मत्स्य पालन की ओर निर्णायक बदलाव करके उनकी प्रति व्यक्ति उत्पादकता को बढ़ाना चाहिए. बाजार की ताकतों के साथ जोड़ने के लिए हमारी कृषि में सुधार भी जरूरी है, जिसके बिना हम विकसित राष्ट्र नहीं बन सकते.
अगर हम अपनी भीषण गैर-बराबरी से आंख फेर लेते हैं तो कोई भी विकास मॉडल काम में नहीं आएगा. इंस्टीट्यूट फॉर कॉम्पिटीटिवनेस के अध्यक्ष अमित कपूर लिखते हैं, ''किसी देश की समृद्धि का सच्चा पैमाना प्रति व्यक्ति जीडीपी होती है, जो भारत की 2,730 डॉलर (करीब 2.3 लाख रुपए) है. यह ब्राजील (11,350 डॉलर), चीन (13,150 डॉलर), वियतनाम (4,620 डॉलर) और दक्षिण अफ्रीका (5,970 डॉलर) सहित हमारे विकासशील साथियों की तुलना में कम है.''
तो क्या ये ही मसले हैं भारत के एजेंडे को गरीबी रेखा से हटाकर, गरिमा की रेखा पर ले जाने के लिए? नहीं, और भी हैं. मुख्य आधार दो हैं: शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा. हमारे लगभग 35 फीसद बच्चे अविकसित रह जा रहे हैं. साथ ही, हम कुपोषण पिरामिड के निचले हिस्से में हैं तो जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां—मधुमेह, कैंसर, हृदय संबंधी समस्याएं—महामारी सरीखी हैं. बीमार राष्ट्र विश्व अगुआ कैसे हो सकता है? नौवीं अनिवार्यता हमारे पर्यावरण को लेकर आती है: हमारी हवा, पानी और मिट्टी. हमारी अर्थव्यवस्था का हरित होना एक पूर्वशर्त है, जिसमें डीकार्बोनाइजेशन सीधे विकास से जुड़े.
अब तक के अपने सफर को पीछे मुड़कर देखना बुरी बात नहीं. लेकिन यह आगे की सोच के लिए सिर्फ एक खुराक भर है. अगले पन्नों में कई क्षेत्रों के विशेषज्ञों की गहरी, पैनी राय है कि हमें अपना रास्ता कैसे बनाना चाहिए. इनमें नासा के वैज्ञानिक से लेकर पूर्व रक्षा प्रमुख, उद्योग जगत के अगुआ और प्रौद्योगिकी के जानकार और परमाणु, विमानन, उच्च शिक्षा वगैरह के शीर्ष नाम हैं. अंत में, दसवां खंड वह है जो दुनिया को हमारे लिए अपना सिर झुकाने पर मजबूर कर देगा—भारत का सॉफ्ट पावर: योग, संस्कृति, ज्ञान परंपराएं. अतीत और समकाल का यह अनूठा मिश्रण हमें महत्वाकांक्षा की स्वतंत्रता अवश्य मुहैया करेगा.
आजादी मुबारक!
- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

