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भारत को अगर सैन्य महाशक्ति बनना है तो खुद की टेक्नोलॉजी विकसित करना क्यों है जरूरी?

पूर्व सेना प्रमुख मनोज पांडे ने एक बार कहा था, "उधार की टेक्नोलॉजी के बूते हम भविष्य के युद्ध जीत नहीं सकते." सैन्य महाशक्ति बनने के लिए भारत को अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी विकसित करने में ज्यादा निवेश करना होगा, साथ ही हिंद महासागर में शक्ति प्रदर्शन करने और रणनीतिक गठबंधन बनाने की ताकत भी जुटानी होगी

लद्दाख के ऊपर ड्रोन की एक कलात्मक प्रस्तुति
लद्दाख के ऊपर ड्रोन की एक कलात्मक प्रस्तुति
अपडेटेड 6 सितंबर , 2024

जमीन, समुद्र और आसमान में फैली देश की रक्षा के साजो-सामान के व्यापक स्वरूप को देखते हुए भारत तेजी से बदलती दुनिया में सुरक्षा चुनौतियों पर खरा उतरने की अच्छी स्थिति में है. भरोसा दिलाने वाली बात यह है कि देश के पास न केवल परमाणु शस्त्रागार है बल्कि इसने जमीन, हवा और समुद्र से परमाणु हथियार दाग सकने में सक्षम विश्वसनीय परमाणु त्रयी भी विकसित की है.

यह मजबूत सैन्य मौजूदगी भू-राजनीति में भी इसका प्रभाव बढ़ाती है. 2024 के ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स के मुताबिक, भारत दुनिया की चौथी सबसे ताकतवर सेना है और इससे क्षेत्रीय सुरक्षा के मामले में भी देश की अहम भूमिका की झलक मिलती है. मगर प्रतिरक्षा में बड़ी वैश्विक शक्ति के रूप में उभरने के लिए अभी भी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है.

इसमें कोई शक नहीं कि अपने बढ़ते वैश्विक प्रभाव के साथ भारत एक क्षेत्रीय सैन्य शक्ति है, मगर उसे अमेरिका, रूस और चीन की तरह 'सैन्य महाशक्ति' की श्रेणी में नहीं रखा जाता. विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की सैन्य महाशक्ति बनने की आकांक्षा के लिए बहुआयामी नजरिया अपनाने की जरूरत है.

इसमें सशस्त्र बलों को आधुनिक बनाना, मजबूत अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाना, प्रशिक्षण बढ़ाना, अनुसंधान और विकास में निवेश करना, साइबर और अंतरिक्ष क्षमताओं में इजाफा करना, समुद्री ताकत को मजबूत करना, आर्थिक और औद्योगिक सहायता हासिल करना, खुफिया और निगरानी तंत्र को मजबूत करना, एटमी ताकत का डर बनाए रखना और सॉफ्ट पावर तथा कूटनीति का फायदा उठाना शामिल है.

खर्च में बढ़ोतरी

खासकर चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ते क्षेत्रीय तनाव और वैश्विक सुरक्षा की चुनौतियों की वजह से भारत के सैन्य खर्च में लगातार बढ़ोतरी हुई है. इस साल के बजट के मुताबिक, भारत का सैन्य खर्च देश की जीडीपी के 2 फीसद से कुछ कम है. यह अभी भी सैन्य खर्च के मामले में अमेरिका, चीन और रूस के बाद दुनिया का चौथा सबसे बड़ा देश है.

वित्त वर्ष 2025 के लिए देश का रक्षा बजट 6.21 लाख करोड़ रुपए है, जो पिछले साल के मुकाबले 4.72 फीसद ज्यादा है. रक्षा क्षमताओं को आधुनिक बनाने की खातिर इसमें पूंजीगत खर्च पर जोर दिया गया है. इस आधुनिकीकरण में बजट का करीब एक-तिहाई यानी 1.72 लाख करोड़ रुपए पूंजीगत व्यय किया जाना है. अनुमान बताते हैं कि भारतीय सशस्त्र बल अगले पांच से छह साल के दौरान पूंजीगत खरीद पर 130 अरब डॉलर (10.89 लाख करोड़ रुपए) खर्च करेंगे.

रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) सरीखी संस्थाओं के जरिए, और निजी क्षेत्र के साथ मिलकर, अनुसंधान और विकास (आरऐंडडी) में निवेश अत्याधुनिक समाधानों का तेजी से विकास करने के लिए बेहद जरूरी है. डीआरडीओ को खर्च के लिए 23,855 करोड़ रुपए मिले हैं, वहीं और 13,208 करोड़ रुपए उसे नई टेक्नोलॉजी विकसित करने तथा फंडामेंटल रिसर्च पर जोर देने के लिए मिले हैं.

असरदार साजो-सामान

जाहिर तौर पर भारतीय सेना के साजो-सामान असरदार दिखाई देते हैं. 14 लाख जवानों वाली भारतीय सेना के पास 4,750 टैंक, 10,000 से ज्यादा बख्तरबंद गाड़ियां, और 4,000 से ज्यादा आधुनिक तोपें हैं. इसके अलावा रॉकेट लॉन्चर, परमाणु मिसाइलें, अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें (आईसीबीएम), टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइलें और दूसरी शाखाओं में अतिरिक्त प्लेटफॉर्म भी हैं.

भारतीय वायु सेना (आईएएफ) के पास 1,70,576 से ज्यादा सैन्यकर्मी और 1,926 से ज्यादा विमान हैं, जो इसे दुनिया की चौथी सबसे बड़ी वायु सेना बनाते हैं.

भारतीय नौसेना दो विमान वाहकों, 12 विध्वसंकों, 12 फ्रिगेट, 18 कॉरवेट, 16 पनडुब्बियों और 140 गश्ती जहाजों समेत विभिन्न युद्धपोतों का संचालन करती है. यह अगले 10 साल में जहाजों के 175 बेड़ों का लक्ष्य लेकर चल रही है. मगर इतने भर से संतोष कर लेने की गुंजाइश नहीं है.

पूर्व सेना प्रमुख मनोज पांडे ने एक बार कहा था, "उधार की टेक्नोलॉजी के बूते हम भविष्य के युद्ध जीत नहीं सकते." उन्होंने विदेशी युद्ध सामग्री पर भारत की चिंताजनक निर्भरता की ओर इशारा किया था. ऐसे में 'मेक ऑफ इंडिया' सरीखी पहलों के तहत स्वदेशी उत्पादन बेहद अहम है.

घरेलू उत्पादन

बीते दशक में भारत के घरेलू रक्षा उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार हुआ है. वित्त वर्ष 2024 में इसका मूल्य 1.27 लाख करोड़ रुपए आंका गया, जो पिछले साल के मुकाबले 16.7 फीसद की वृद्धि थी. यह लगातार दूसरा साल था जब भारत का रक्षा उत्पादन 1,00,000 करोड़ रुपए को पार कर गया.

निजी क्षेत्र की कंपनियों ने कुल उत्पादन के 21 फीसद या 26,506 करोड़ रुपए का योगदान दिया. रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 14,000 से ज्यादा एमएसएमई और करीब 350 स्टार्ट-अप रक्षा उत्पादन में लगे हैं.

सरकार ने वित्त वर्ष 2029 तक सालाना 3,00,000 करोड़ रुपए के रक्षा उत्पादन का लक्ष्य तय किया है. रक्षा उत्पादन में मदद के लिए सरकार ने रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की व्यवस्था को ज्यादा उदार बनाते हुए स्वचालित मार्ग के तहत विदेशी इक्विटी की ऊपरी सीमा को अधिकतम 26 फीसद से बढ़ाकर पहले 49 फीसद और फिर 74 फीसद कर दिया. एफडीआई के उदारीकरण की बदौलत 2024 तक 5,700 करोड़ रुपए भारत आए.

घरेलू उद्योग की बढ़ती क्षमताओं से उत्साहित होकर रक्षा मंत्रालय ज्यादा से ज्यादा जटिल परियोजनाएं निजी और सरकारी उद्योग को सौंप रहा है.

2023 में रक्षा मंत्रालय ने मध्यम शक्ति की रडार और एकीकृत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली (भारत इलेक्ट्रॉनिक्स), एचटीटी-40 बुनियादी प्रशिक्षक विमान और डोर्नियर-228 विमान (हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड), काडर ट्रेनिंग जहाज (एलऐंडटी), उन्नत आकाश हथियार प्रणाली (भारत डायनेमिक्स लिमिटेड), ऑफ शोर पैट्रोल वेसल और मिसाइल वेसल (गोवा शिपयार्ड लिमिटेड और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स ऐंड इंजीनियर्स), फ्लीट सपोर्ट वेसल (हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड) और अपग्रेडेड सुपर रैपिड गन माउंट (भारत हेवी इलेक्ट्रिक लिमिटेड) के लिए घरेलू उद्योग के साथ करारों पर दस्तखत किए हैं.

भारत ने अपनी सैन्य क्षमताओं को लगातार आधुनिक और स्वदेशी बनाया है—फ्रिगेट आईएनएस सहयाद्रि और विमानवाहक आईएनए विक्रांत सरीखे युद्धपोत और एलसीए तेजस लड़ाकू विमान इसके प्रमाण हैं. भारत सैन्य उपकरणों का निर्यात भी करने लगा है, फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइलों की बिक्री इसका उदाहरण है.

साझेदार, ढांचागत बदलाव

दुनिया के भू-राजनैतिक परिदृश्य पर इस वक्त कई अहम बवाल मचे हैं. इनमें यूक्रेन-रूस युद्ध, चीन-ताइवान के बीच बढ़ता तनाव और पश्चिम एशिया में लगातार कायम अस्थिरता शामिल है. इसके अलावा अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता से वैश्विक तनाव और तीखे हो रहे हैं.

अमेरिका, रूस, इज्राएल और फ्रांस सरीखी वैश्विक ताकतों के साथ रणनीतिक गठजोड़ कायम करके टेक्नोलॉजी के ट्रांसफर, संयुक्त सैन्य अभ्यासों और सामरिक सहयोगों को सुगम बनाया जा सकता है. इसके अलावा क्वाड्रिलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग (क्वाड) सरीखे सुरक्षा ढांचे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहकारी रक्षा रणनीतियों को सुदृढ़ करते हैं और सामूहिक सुरक्षा दृष्टिकोण सुनिश्चित करते हैं. 

ढांचागत बदलावों को देखें तो 2020 में भारतीय सेना के भीतर साझापन बढ़ाने और थिएटर बनाने तथा संसाधनों का इस्तेमाल ज्यादा एकीकृत तरीके से करने में सक्षम बनाने के लिए बनाए गए सैन्य मामलों के विभाग (डीएमए) के प्रमुख के रूप में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की नियुक्ति की गई.

इस सुधार के साथ बनी नई 'एकीकृत व्यवस्था’ के संचालन और संयुक्त अंतर-सैन्य संगठनों में प्रतिनियुक्त कर्मियों को नियम-कायदों के दायरे में लाने के लिए 2023 में संसद ने अंतर-सेवा पुनर्गठन अधिनियम (आइएसओ कानून) पारित किया. माना जाता है कि सैन्य थिएटर कमान के निर्माण से सशस्त्र बलों की क्षमताओं में सुधार आएगा और हिंद महासागर क्षेत्र (आइओआर) के सुरक्षा हितों के लिए विभिन्न 'सामरिक स्थलों’ पर रक्षा दायरे का विस्तार होगा. इन थिएटर कमान को जल्द स्थापित करने की जरूरत है.

हर सैन्य महाशक्ति में अपने आसपास के सागरों और महासागरों में शक्ति प्रदर्शित करने की क्षमता होती है. महाशक्ति के रूप में गिने जाने की खातिर भारत को हिंद महासागर और उसके आगे अपने हितों की सुरक्षा तथा शक्ति-प्रदर्शन के लिए अपनी समुद्री क्षमताओं को मजबूत करना होगा. इसके लिए आधुनिक जहाजों, पनडुब्बियों और विमानवाहकों से बनी ऐसी ब्लू-वॉटर नौसेना की जरूरत है जो व्यापार मार्गों की हिफाजत कर सके.

वैश्विक व्यापार और भू-राजनैतिक प्रतिस्पर्धा में आईओआर की अहमियत बढ़ रही है. भारत इस क्षेत्र की स्थानीय शक्ति है. भारतीय और चीनी नौसेनाओं के बीच अंतर को कम करने की कोशिश की जा रही है, मगर भारत के समुद्री बेड़े में मात्र 132 युद्धपोत हैं, जबकि चीन के पास 370 हैं और उसके भी 2030 तक बढ़कर 435 हो जाने की उम्मीद है. दक्षिण एशिया में चीन के नौसैन्य विस्तार का मुकाबला करने के लिए भारत ने कुछ रणनीतिक कदम उठाए गए हैं. 

एरोस्पेस पावर

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अंतरिक्ष का अन्वेषण कर रहा है. इसके साथ ही अंतरिक्ष अब वायु सुरक्षा का भी काफी अहम विस्तार है. इसलिए आईएएफ का नया सिद्धांत 'हवाई और अंतरिक्ष के अखंड विस्तार’ की प्रभावी खोजबीन पर जोर देता है और 'स्पेस विजन 2047’ की बात करता है. 'ताकतवर वायु शक्ति’ होने से 'विश्वसनीय एरोस्पेस ताकत’ बनने की ओर बढ़ते हुए आइएएफ अंतरिक्ष टेक्नोलॉजी के जरिए अपनी खुफिया, निगरानी और संचार क्षमताओं को प्रगाढ़ बनाने की योजनाएं बना रही है.

डीआरडीओ, इसरो और अन्य संस्थाओं की मदद से उसकी योजना अब सैन्य उपग्रहों सरीखी विशिष्ट टेक्नोलॉजी विकसित करने की है. आधुनिक युद्ध में साइबर और अंतरिक्ष क्षमताओं की अहमियत भी लगातार बढ़ रही है. मजबूत साइबर रक्षा तंत्र और आक्रामक क्षमताओं का विकास साइबर खतरों से रक्षा करने के अलावा उबरने तथा पलटवार करने की क्षमता सुनिश्चित करेगा.

आर्थिक और औद्योगिक समर्थन के बूते ही सेना आधुनिक बन पाती है. पर्याप्त रक्षा बजट और उसके साथ मजबूत औद्योगिक आधार ही उन्नत सैन्य साजो-सामान के निरंतर इनोवेशन और उत्पादन को सहारा देगा. यह भारत के मुख्य प्रतिद्वंद्वी चीन का मुकाबला करने के लिए जरूरी है. जाहिर है, वैश्विक सुरक्षा के बड़े महारथियों में शरीक होने की कोशिश में आगे बढ़ रहे भारत के लिए चीन को काबू में रखना सबसे बड़ी चुनौती है.

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