scorecardresearch

सरकारी मदद की 'तगड़ी खुराक' से कैसे बन सकता है देश का हेल्थ सिस्टम सेहतमंद?

सरकारी मदद और केंद्र-राज्य के समन्वित प्रयास के जरिए देश की स्वास्थ्य प्रणाली मजबूत हो सकती है. देश में स्वास्थ्य के लिए अक्सर जीडीपी का कम से कम 2.5 फीसद के नीतिगत प्रतिबद्धता का वादा तो किया जाता है, मगर इसे अभी तक पूरा नहीं किया गया है

इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास
इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास
अपडेटेड 5 सितंबर , 2024

भारत आजादी के 75वें वर्ष में दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन चुका था. 2047 में यह आजादी की सौवीं वर्षगांठ मनाएगा और उसका इरादा तब तक दुनिया में खुद को नेतृत्वकर्ता के तौर पर स्थापित करना है. सबसे अहम बात यह कि त्वरित, न्यायसंगत और पर्यावरण के अनुकूल टिकाऊ वैश्विक विकास को बढ़ावा देने में खासकर उसकी विशाल और जनसांख्यिकीय लिहाज से उत्पादक युवा आबादी की एक अहम भूमिका होगी. इसे देखते हुए देश की स्वास्थ्य प्रणाली पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि बढ़ती उम्र के साथ वह भारत की आबादी को स्वस्थ और उत्पादक बनाए रखे.

बढ़ानी होगी पब्लिक फाइनेंसिंग

संघीय शासन व्यवस्था में स्थानीय नीति निर्धारित करने के लिए केंद्र सरकार और स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए राज्यों की पूरक संवैधानिक भूमिकाएं स्पष्ट तौर पर परिभाषित हैं. इसके तहत बेहद जरूरी है कि देशभर में स्वास्थ्य प्रणालियों का उद्देश्य एक ही हो और इन पर अमल के दौरान एक तारतम्यता बनी रहे. यह लक्ष्य हासिल करने के लिए भारत की समग्र स्वास्थ्य प्रणाली में बड़े पैमाने पर पब्लिक फाइनेंसिंग की जरूरत पड़ेगी.

के. श्रीनाथ रेड्डी

हमें देश के बढ़ते सकल घरेलू उत्पाद का कम से कम 2.5 फीसद स्वास्थ्य के लिए रखना होगा. इस नीतिगत प्रतिबद्धता का अक्सर वादा तो किया जाता है, मगर इसे अभी तक पूरा नहीं किया गया है. यह प्रतिबद्धता प्राथमिक से तृतीयक देखभाल तक बुनियादी ढांचा दुरुस्त करने, देशभर में बड़े पैमाने पर अधिक कुशल स्वास्थ्य कार्यबल को प्रशिक्षित और तैनात करने, जब भी और जहां भी आवश्यक हो, इलाज और दवा आपूर्ति सुनिश्चित करने के साथ ही भारत की अनसुलझी और उभरती स्वास्थ्य चुनौतियों के लिए नए समाधान खोजने के वास्ते शोध और विकास को बढ़ावा देने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है. स्वास्थ्य वित्तपोषण में वृद्धि केंद्र और राज्य दोनों के बजट में नजर आनी चाहिए.

हमारी स्वास्थ्य प्रणाली आने वाले वक्त के लिहाज के एकदम मुस्तैद होनी चाहिए, जिसमें आबादी के स्वास्थ्य के बदलते निर्धारकों को पहचानकर भविष्य में बीमारी संबंधी रुझानों का अनुमान लगाने की क्षमता हो. साथ ही जो अप्रत्याशित चुनौतियों का तत्परता के साथ मुकाबला करने में भी सक्षम हो. हालिया कोविड-19 महामारी और भविष्य में जलवायु परिवर्तन के जोखिमों को लेकर उपजी दुविधा ने इसी संदेश को प्रमुखता से रेखांकित किया है. भले ही हम ऐसी स्वास्थ्य प्रणाली तैयार कर रहे हों, मगर हमारे लिए इस मोर्चे पर बहुत कुछ करना बाकी है. क्षय रोग (टीबी) जैसी संक्रामक बीमारियां, बच्चों और युवतियों में कुपोषण की समस्या चिंताजनक है. वहीं, गैर-संचारी रोग, मानसिक स्वास्थ्य विकार और अधिक वजन-मोटापे आदि ने भी चुनौतियां बढ़ा रखी हैं.

प्राइमरी केयर को मजबूत बनाना होगा

भारत ने 2030 तक प्राथमिक देखभाल आधारित सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) हासिल करने की प्रतिबद्धता जताई है. इसे पूरा करने के लिए ग्रामीण और शहरी दोनों प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं सशक्त बनाने की जरूरत है. लोगों को उनके घर के नजदीक व्यापक और स्वास्थ्य सेवा की सुविधा मुहैया करनी होगी. स्वास्थ्य सेवा केंद्र के पास विभिन्न जांच की भी सुविधा हो. वहीं टेलीहेल्थ और आपातकालीन परिवहन सेवाओं के जरिए माध्यमिक और तृतीयक स्तर पर अधिक उन्नत स्वास्थ्य सेवा सुविधाओं को उनसे जोड़ना होगा. जिला और मेडिकल कॉलेज अस्पतालों को अपग्रेड करना होगा, ताकि उनमें उन्नत स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध हो. साथ ही ये विभिन्न श्रेणियों के सहयोगी स्वास्थ्य पेशेवरों के साथ-साथ मेडिकल और नर्सिंग छात्रों के लिए शिक्षा एवं प्रशिक्षण केंद्र के तौर पर भी काम कर सकें.

हर स्तर पर कुशल स्वास्थ्यकर्मियों की कमी साफ नजर आती है. राज्यों और शहरी-ग्रामीण स्तर पर यह असमान वितरण असमानता को बढ़ा रहा है. प्रौद्योगिकी-सक्षम अग्रिम मोर्चे के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (आशा, एएनएम) को अधिक संख्या में प्रशिक्षित और तैनात करके प्राथमिक देखभाल की जरूरतों से निबटा जा सकता है. अगर इनके कौशल को बढ़ा दें तो वे मौजूदा समय में डॉक्टरों के लिए निर्धारित कई कार्य करने में सक्षम हो सकते हैं. अन्य स्तर के पेशेवरों को भी बड़ी संख्या में प्रशिक्षित करने की दरकार है, ताकि हम अपनी स्वास्थ्य प्रणाली की जरूरतों को पूरा कर सकें. हमें अपनी जनसांख्यिकीय क्षमता को भुनाते हुए दुनिया को भी स्वास्थ्यकर्मी मुहैया करने होंगे क्योंकि वह अपनी बूढ़ी होती जा रही आबादी को सेवाएं देने में असमर्थ है. हमें भारतीय और वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों में एकीकरण के लिए अपनी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को बढ़ावा देना होगा.

दरअसल, यूएचसी के दो मापदंड हैं: वित्तीय कवरेज और सेवा कवरेज. पर्याप्त वित्तीय सुरक्षा के जरिए हमारा लक्ष्य लोगों की जेब पर पड़ने वाले भार और अनावश्यक व्यय (अधिकतर क्रमश: बाह्य रोगी सेवा और अस्पताल में भर्ती होने से संबंधित) और स्वास्थ्य खर्चों के कारण होने वाली गरीबी को घटाना है. ये उपाय तभी सार्थक हैं जब जरूरी स्वास्थ्य सेवा किफायती हो. भारत को वित्तीय सुरक्षा और सेवा कवरेज दोनों के बीच के अंतर पाटने की जरूरत है. किफायती सेवा कवरेज के लिए हमें अधिक उत्तरदायी सार्वजनिक क्षेत्र, अधिक जिम्मेदार निजी क्षेत्र और अधिक संसाधनसंपन्न स्वैच्छिक क्षेत्र का सहारा लेना होगा. वित्तीय सुरक्षा मुख्यत: सार्वजनिक क्षेत्र के नियमों और कर-वित्तपोषित सरकारी स्वास्थ्य बीमा प्रणालियों से आनी चाहिए, जिसमें नियोक्ता से उपलब्ध कराया गया और निजी तौर पर खरीदा गया स्वास्थ्य बीमा पूरक भूमिका निभा सकता है.

मल्टी सेक्टर अप्रोच

स्वास्थ्य प्रणाली को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो शिक्षा, आय सुरक्षा, पोषण से भरपूर खाद्य और कृषि प्रणालियों, पर्यावरण, लैंगिक समानता, शहरी डिजाइन और परिवहन सरीखे विविध क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य लक्ष्यों से जुड़ी हों. आबादी में स्वास्थ्य और पोषण साक्षरता को बढ़ावा देते हुए इसे आक्रामकता के साथ विज्ञापित तंबाकू उत्पादों, अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों, चीनी वाले मीठे पेय पदार्थों और शराब पर अंकुश लगाने के लिए सार्वजनिक नीतियों को आकार देना होगा.

भारत की विशाल जनसंख्या भौगोलिक, जलवायु, जातीय और सांस्कृतिक स्तर पर बेहद विविध है. भारत में जीन-पर्यावरणीय अंतक्रियाओं, एपिजेनेटिक परिवर्तनों और माइक्रोबायोम पैटर्न की व्यापक रेंज का अध्ययन वैश्विक विज्ञान को समृद्ध करने और शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य की हमारी समझ को बढ़ाने के लिए किया जा सकता है. हमारी बहुलवादी स्वास्थ्य प्रणालियां पूरक दृष्टिकोणों के जरिए जटिल स्वास्थ्य समस्याओं के लिए अधिक मुकम्मल समाधान दे सकती हैं. किफायती नवाचारों और तकनीकी सरलता के साथ हम वैश्विक स्वास्थ्य के लिए नए दृष्टिकोण तैयार कर सकते हैं.

- के. श्रीनाथ रेड्डी

(लेखक जनस्वास्थ्य के जाने-माने प्रोफेसर और पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)

लंबी छलांग

> भारत के हेल्थ सिस्टम को अब पूर्वानुमान वाला बनना होगा और जनस्वास्थ्य की बदलती जरूरतों की पहले से पहचान करनी होगी.

> प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा-आधारित सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के लिए ग्रामीण एवं शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना होगा.

> किफायती सर्विस कवरेज के लिए हमें ज्यादा जवाबदेह पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर और ज्यादा संसाधनसंपन्न वॉलंटरी सेक्टर पर दांव लगाना होगा.

Advertisement
Advertisement