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वर्चस्व की जंग के बीच भारत कैसे बन सकता है हिंद महासागर की प्रमुख शक्ति?

भारतीय नौसेना बेहतर समुद्री क्षमता और हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के साथ नेटवर्क बनाकर समुद्री सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत कर रही है. लेकिन अगर भारत को हिंद महासागर क्षेत्र की प्रमुख शक्ति बनना है तो उसे अपनी समुद्री क्षमता में और अधिक निवेश करना होगा

इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास
इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास
अपडेटेड 6 सितंबर , 2024

हिंद महासागर दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है. इसकी परिधि में आने वाले देश इस दुनिया की कुछ सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं हैं और दुनिया की कुल आबादी का 35 फीसद से अधिक इन्हीं देशों में निवास करता है. इंडियन ओशन रीजन (आईओआर) वैश्विक आर्थिक विकास के एक महत्वपूर्ण वाहक के रूप में उभरा है.

वैश्विक व्यापार में इसकी अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विश्व में तेल के कुल आवागमन का दो-तिहाई, कंटेनर आवागमन का आधा और थोक कार्गो शिपमेंट का एक-तिहाई, आईओआर के अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों से होकर गुजरता है. दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के बीच में स्थित होना हमारे लिए एक बहुत बड़ा रणनीतिक लाभ है.

इससे समुद्र में तैनात हमारे सैन्य बलों की पहुंच, उनके लिए आवश्यक रसद आपूर्ति और गतिशीलता बहुत सुविधाजनक हो जाती है, जिससे हमें इस समुद्री क्षेत्र को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने की क्षमता मिलती है. हम इस क्षेत्र में चल रहे 'रणनीतिक मंथन' के केंद्र में भी रहे हैं. 

एडमिरल सुनील लांबा

नाविकों के बीच एक कहावत बड़ी प्रचलित है कि, 'सीमाएं बांटती हैं और समुद्र जोड़ते हैं.' उसी का अनुसरण करते हुए हमारी नौसेना ने मित्र देशों के साथ साझेदारी, आपसी विश्वास और भरोसा बनाने का प्रयास किया है. समकालीन भू-रणनीतिक परिदृश्य में, आपसी सहयोग पर आधारित नौसेना की पहलकदमियों ने ऐसे महत्वपूर्ण साधन प्रदान किए हैं जो हमारी विदेश नीति को हिंद महासागर को भारत का महासागर बनाने की दिशा में आगे बढ़ने में बहुत काम आएंगे.

हम अपने क्षेत्र में वर्चस्व के लिए चल रही प्रतिस्पर्धा से अवगत हैं, जहां विस्तारवादी देशों, विशेष रूप से चीन ने बढ़त हासिल करने के लिए आर्थिक, राजनयिक, सांस्कृतिक और सैन्य उपकरणों का भरपूर उपयोग किया है. चीन जिस प्रकार से अन्य देशों में सैन्य ठिकाने बना रहा है और दोहरे उपयोग वाले समुद्री बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के साथ-साथ इस क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा रहा है, उनसे आईओआर के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को प्रभावित करने और भारतीय हितों में हस्तक्षेप करने की उसकी क्षमता बढ़ेगी.

इन बदलती परिस्थितियों को समझते हुए, सरकार और भारतीय नौसेना ने सभी द्विपक्षीय संबंधों में समुद्री सुरक्षा को उच्च प्राथमिकता दी है और आइओआर के सभी तटीय देशों के बीच मजबूत नेटवर्क बनाने के प्रयासों को तेज कर दिया है.

भारतीय नौसेना के प्रयासों को मोटे तौर पर चार श्रेणियों में रखा जा सकता है—क्षमता-निर्माण, क्षमता-वृद्धि, मिलकर काम करने की वचनबद्धता और सहयोगात्मक प्रयास. नौसेना तटवर्ती देशों को अपनी क्षमताओं को बनाने और उसे विकसित करने के लिए रचनात्मक रूप से सहयोग दे रही है, ताकि समुद्री सुरक्षा से जुड़ी विभिन्न चुनौतियों से निबटने की सामूहिक क्षमता और मजबूत हो. 

समुद्र में कोई भी ऑपरेशन समुद्री क्षेत्र में सजगता (मेरीटाइम डोमेन अवेयरनेस-एमडीए) पर निर्भर है. एक व्यापक एमडीए विकसित करने के लिए नौसेना, मिशन के तहत तैनात जहाजों, बोइंग पी8एल समुद्री गश्ती विमान/सी गार्जियन यूएवी के माध्यम से आइओआर के सुदूर इलाकों में नियमित रूप से गश्त करती है और सैटेलाइट के जरिए उकी निगरानी करती है.

इसने सेशेल्स, मॉरिशस, मालदीव और श्रीलंका में तटीय निगरानी शृंखलाएं स्थापित की हैं. गुरुग्राम स्थित 'इन्फॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर फॉर द इंडियन ओशन रीजन' ने 20 से अधिक देशों और बहुराष्ट्रीय निर्माणों के साथ रिश्ते स्थापित करके खुद को आइओआर में एमडीए के केंद्र में स्थापित किया है. 

संचालन और क्रियान्वयन (लॉजिस्टिक्स) से जुड़ी द्विपक्षीय संधियों, जहाजों पर माल के लदान और उतारने की सुविधाओं/ बंदरगाहों पर बुनियादी ढांचे के निर्माण आदि के माध्यम से नौसेना की पहुंच बढ़ाई गई है. भारतीय नौसेना हर साल 20 से अधिक द्विपक्षीय और बहुपक्षीय अभ्यासों में भाग लेती है. पिछले कुछ वर्षों में प्रमुख समुद्री शक्तियों के साथ हमारे अभ्यासों का विस्तार हुआ है और अब इसमें जटिल बहु-आयामी संचालन भी शामिल किए गए हैं.

क्वाड साझेदारों के साथ मालाबार का अभ्यास इसका बड़ा उदाहरण है. भारतीय नौसेना बंगाल की खाड़ी में बांग्लादेश, म्यांमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया के साथ समुद्री सीमाओं पर गश्त करती है. यह मालदीव, सेशेल्स और मॉरिशस के एक्सक्लूजिव इकोनॉमिक जोन (ईईजेड) की निगरानी भी करती है जिनके पास खुद इसकी क्षमता नहीं है.

हमारे प्रयासों का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष, प्रशिक्षण है. हर साल, नौसेना 900 से अधिक विदेशी प्रशिक्षुओं को विशेष प्रशिक्षण देती है. हाइड्रोग्राफिक या जलीय क्षेत्र में सहयोग एक अन्य क्षेत्र है जिस पर जोर दिया जाता है. हमारे जहाजों ने म्यांमार, मॉरिशस और श्रीलंका के लिए महत्वपूर्ण समुद्री सर्वेक्षण किए हैं. इसके साथ ही नौसेना क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा को बढ़ाने के लिए हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी (आईओएनएस) जैसी बहुपक्षीय पहल को भरपूर समर्थन और सहायता मुहैया कराती है.

लेकिन सभी राजनयिक पहलकदमियों को मजबूत सामरिक शक्ति की मदद की आवश्यकता होती है. अगर हम चाहते हैं कि हमें हिंद महासागर की प्रमुख ताकत के रूप में देखा जाए, तो देश को सैन्य क्षमता, विशेषकर समुद्री क्षमता में अधिक निवेश करने की जरूरत है. हिंद महासागर में सबसे पहले प्रतिक्रिया देने वाली सैन्य शक्ति बनने के लिए भारतीय नौसेना को एयर विंग से लैस तीसरे विमान वाहक पोत और अधिक संख्या में विध्वंसकों और फ्रिगेट, परमाणु-संचालित आक्रमणकारी पनडुब्बियों (एसएसएन) और बेड़े की मदद के लिए जहाजों (टैंकर) की जरूरत है.

भारत जैसे-जैसे वैश्विक मुद्दों में अपना रसूख बढ़ाता जाएगा, उसे आईओआर में बड़ी जिम्मेदारियां निभाने के लिए कहा जाएगा. देश सक्रिय और सकारात्मक कार्रवाई के माध्यम से विश्व व्यवस्था में अपना उचित स्थान प्राप्त कर सके, यह सुनिश्चित करने में भारतीय नौसेना की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होने वाली है. 

- एडमिरल सुनील लांबा

(लेखक पूर्व नौसेना प्रमुख हैं)

लंबी छलांग

आज जो दृष्टिकोण और तरीके अपनाएंगे वे ही यह निर्धारित करेंगे कि भारत हिंद महासागर में अपनी केंद्रीय स्थिति का कैसे और कितना फायदा उठा पाएगा. यह उसे रणनीतिक लाभ प्रदान करने के साथ ही रणनीतिक मंथन के केंद्र में रखती है.

चीन अपने आर्थिक, कूटनीतिक और सैन्य उपकरणों से हिंद महासागर में समुद्री मार्गों को प्रभावित कर सकता है. यह भारतीय हितों के लिए खतरा बन सकता है. हमें क्षमता-निर्माण, क्षमता-वृद्धि, एक दूसरे की सहायता के और सहयोग से समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने की जरूरत है.

नौसेना को एक तीसरे विमान वाहक पोत, अधिक संख्या में विध्वंसकों और फ्रिगेट, परमाणु-संचालित पनडुब्बियों और बेड़े के संचालन में मदद करने वाले जहाजों की आवश्यकता है.

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