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ये तीन चीजें सुधर जाएं तो भारत बन सकता है दुनिया का अध्ययन केंद्र

हजारों संस्थाओं और करोड़ों छात्रों के साथ भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली दुनिया की सबसे बड़ी शिक्षा प्रणालियों में से एक है, मगर हमारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के बारे में धारणा कुल मिलाकर खराब है

भारत में प्राथमिक शिक्षा का स्तर सुधारना है सबसे महत्वपूर्ण
भारत में प्राथमिक शिक्षा का स्तर सुधारना है सबसे महत्वपूर्ण
अपडेटेड 6 सितंबर , 2024

आकार में बड़ी दिखने वाली चीज हमेशा खूबसूरत हो, जरूरी नहीं. 58,000 से ज्यादा संस्थाओं और 4.30 करोड़ छात्रों के साथ भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली दुनिया की सबसे बड़ी शिक्षा प्रणालियों में से एक है. मगर हमारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के बारे में धारणा कुल मिलाकर खराब है और हमारी संस्थाएं निम्न गुणवत्ता वाले रोगों से ग्रस्त हैं. इन कमियों को दूर करने के लिए व्यवस्थागत बदलाव पर जोर देने वाले त्रिआयामी नजरिए की जरूरत है. इसके बिना भारत वैश्विक शिक्षा का केंद्र नहीं बन सकता; इस क्षेत्र में दुनिया हमारे प्रति आकर्षित हो, इसके लिए जरूरी है कि हम स्थानीय स्तर पर उच्च गुणवत्ता वाला केंद्र बने.

फिलहाल, शिक्षा की गुणवत्ता में भारी झोलझाल है. आईआईटी और आईआईएम सरीखे प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान और अशोका यूनिवर्सिटी और आईएसबी सरीखे निजी संस्थान ऊंचे मानकों को बनाए रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते हैं, तो वहीं ज्यादातर कॉलेज और विश्वविद्यालय पुराने ढर्रे के पाठ्यक्रम, नाकाफी बुनियादी ढांचे और आधे-अधूरे ज्ञान वाले शिक्षकों से जूझते रहते हैं. गैरबराबरी के इस मैदान की वजह से हजारों छात्र खराब ढंग से शिक्षित और असल दुनिया के लिए बुरे तरीके से तैयार हो जाते हैं. ऐसे में जिंदगी में गैरबराबरी भी बनी रहती है.

शिक्षा

इसे ठीक करने के लिए भारत को एक्रेडिटेशन वाली विश्वसनीय और भरोसेमंद प्रणाली लानी चाहिए जो उच्च शिक्षा संस्थाओं का प्रामाणिक मूल्यांकन करे. हमें अपनी संस्थाओं की गुणवत्ता का सख्ती से आकलन करने और मानदंड तय करने के लिए बहुत-से स्वतंत्र संगठनों की जरूरत है. वे ऐसी हर संस्था में दी जा रही शिक्षा के सभी पहुलओं की सटीक नापजोख करें और निष्पक्ष जानकारी दें. एक, वे संकाय की गुणवत्ता, बुनियादी ढांचे और सुविधाओं, छात्रों के नतीजों और साथ ही कैंपस के कुल अनुभव पर प्रकाश डालें. दो, वे यह भी प्रमुखता से सामने रखें कि दो संस्थाओं में क्या-क्या फर्क हैं. सबसे अहम, वे यह जानकारी पारदर्शी तरीके से छात्रों, माता-पिता और संस्थाओं को दें. एक्रेडिटेशन अंतरराष्ट्रीय स्तर का नियम है. इसकी वजह से यूरोप, अमेरिका और दक्षिणपूर्व एशिया में अव्वल दर्जे की उच्च शिक्षा संस्थाएं सामने आईं.

मजबूत और भरोसेमंद एक्रेडिटेशन प्रणाली छात्रों और माता-पिता की यह जानने में मदद करती है कि किस विश्वविद्यालय से क्या उम्मीद करें. दो, एक्रेडिटेशन का दर्जा हासिल करने और बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे संस्थान छात्रों को सर्वश्रेष्ठ प्रथाएं अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं, संकाय में निवेश करते हैं और छात्रों की सहायक सेवाओं को बेहतर बनाते हैं. वे प्रतिस्पर्धी जज्बे का विकास करते हैं, जिससे पूरे भारत में उच्च शिक्षा के माहौल में सुधार आ सकता है. तीन, हमारे विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता सुधरने से उनकी वैश्विक हैसियत बढ़ती है और वे अंतरराष्ट्रीय छात्रों और शिक्षकों के लिए आकर्षक बनते हैं.

हमें अच्छी शिक्षा तक छात्रों की पहुंच बढ़ाने और पहुंच की प्रक्रिया सुधारने की भी जरूरत है. हमारे देश के युवाओं की विशाल संख्या को शिक्षित होने की जरूरत है. पर ज्यादा क्लासरूम बनाने और ज्यादा छात्रों को पढ़ाने के लिए ज्यादा शिक्षक जुटाने का पुराना मॉडल कारगर नहीं. शुरू किए गए जीईआर (सकल नामांकन अनुपात) के लक्ष्य के लिए भारत को अगले दस साल में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की संख्या दोगुनी करने की जरूरत होगी. इतने सारे कैंपस बनाना और इतने प्रतिभाशाली शिक्षक खोजना भौतिक रूप से असंभव है.

दुनिया की अव्वल डिजिटल यूनिवर्सिटी: लिहाजा पहुंच बढ़ाने के लिए हमें टेक्नोलॉजी पर भरोसा करना होगा. डिजिटल डिलीवरी का हश्र अभी तक ऑफलाइन मॉडल को निम्न गुणवत्ता की ऑनलाइन नकल में बदलने में हुआ है. सरकारी पोर्टल स्वयं मुफ्त शैक्षणिक कोर्स की पेशकश करता है, पर बताते हैं कि इसमें नाम लिखवाने वाले छात्रों में से महज चार फीसद ने कोर्स पूरे किए. भारत को आला दर्जे के ऑनलाइन शिक्षा मॉडल की जरूरत है जो भारत के लिए बनाया गया हो और काम करता हो. हमारे पास दुनिया की बेहतर डिजिटल यूनिवर्सिटी बनाने का न केवल मौका बल्कि प्रतिभा भी है. 2022 का केंद्रीय बजट पेश करते हुए सरकार ने ऐसे विश्वविद्यालय की चर्चा की थी. उसका वक्त अब आ गया है.

मेरी आखिरी बात हमारे छात्रों की दशा-दिशा और जिंदगी सुधारने से जुड़ी है. मेरे पास इस मुश्किल समस्या का कोई तुरत-फुरत समाधान नहीं है. लेकिन हमें निश्चित रूप से इंजीनियरिंग से लेकर मेडिसिन तक और कानून से लेकर मानविकी तक हर चीज के लिए प्रवेश परीक्षाओं पर अपनी निर्भरता कम करने की जरूरत है. ये परीक्षाएं नेक इरादों से भले शुरू की गई हों, ऊंचे दांव लगे होने का हश्र तनाव और दुश्चिंता में हुआ है और छात्र तोतारटंत बनने के लिए मजबूर हुए हैं.

हम अनिवार्यत: प्रवेश परीक्षाओं को शिक्षा के बराबर मान रहे हैं और ऐसा करते हुए युवाओं की कई पीढ़ियों को नुक्सान पहुंचा रहे हैं. क्योंकि वे कुल इतना कर रहे हैं कि उन परीक्षाओं के लिए कोचिंग कक्षाओं में पसीना बहा रहे हैं जिन्हें वे उच्च गुणवत्ता वाले संस्थानों में पहुंचने और अंतत: अपने सपनों के करियर के रास्ते के रूप में देखते हैं.

यह दबाव कॉलेज में पहुंच जाने के बाद भी कम नहीं होता क्योंकि फिर वे सीएटी (कैट) या दूसरी पोस्ट-ग्रेजुएट प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर देते हैं. प्रवेश परीक्षाएं जबरदस्त विकृतियां पैदा कर रही हैं क्योंकि छात्र स्कूल और कॉलेज का पूरा अनुभव तक नहीं ले पा रहे, आनंद लेने की तो बात ही छोड़ दें. उनके पास सर्जनात्मक या आलोचनात्मक ढंग से सोचने का हुनर विकसित करने का वक्त ही नहीं है; रट्टा लगाने में वे इतने व्यस्त जो हैं. इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, हमें इस प्रणाली को नए सिरे से गढ़ने की जरूरत है.

हमारी शिक्षा प्रणाली में सुधार लाने के लिए और भी बहुत कुछ किया जा सकता है. लेकिन यहां बताए गए बदलावों को जमीन पर उतारकर ही भारत अपनी उच्च शिक्षा प्रणाली को ऊंचा उठाने की शुरुआत कर सकता है और यह सुनिश्चित करने की भी कि उसके संस्थानों से ऐसे ग्रेजुएट निकलें जो आधुनिक दुनिया के तकाजों पर खरा उतरने के लिए अच्छी तरह तैयार हों. केवल तभी हम उच्च शिक्षा का वैश्विक केंद्र बन सकते हैं.

— प्रमथ राज सिन्हा
लेखक हड़प्पा एजुकेशन और अशोका यूनिवर्सिटी के संस्थापक और चेयरमैन हैं

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