scorecardresearch

कामकाजी, लेकिन गरीब! भारत में बड़ी आबादी इस हालत में लगातार क्यों बनी हुई है?

आर्थिक स्वतंत्रता भारत की महान लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और राजनैतिक स्वतंत्रता की पूरक होनी चाहिए

मांगों को लेकर प्रदर्शन करते हेल्थ वर्कर
मांगों को लेकर प्रदर्शन करते हेल्थ वर्कर
अपडेटेड 6 सितंबर , 2024

राजनीति और अर्थशास्त्र, 1947 से भारत की दोहरी चुनौतियां रही हैं और इनमें दो जोखिम भरे प्रयोग हुए. सभी को मत देने का अधिकार राजनीति का एक प्रयोग था जिसने बहुत प्रभावी ढंग से काम किया है. इसने बहुत से खांचों में बंटे भारतीय समाज को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनाया है. लेकिन आर्थिक मोर्चे पर हमारा प्रयोग—समाजवादी आर्थिक नीति पर चलने का फैसला जो कांग्रेस के 1955 के अवाडी प्रस्ताव पर आधारित था—उतना ही विफल रहा क्योंकि इसने उद्यमशीलता की स्वतंत्रता को रोका, जिससे नौकरियां पैदा होतीं. इसका एक नतीजा यह भी रहा कि पूंजी के अभाव में हमारा श्रम पंगु हो गया और श्रम के बिना हमारी पूंजी अपंग है.

हितोपदेश कहता है, 'विद्या ददाति विनयम्' यानी विद्या से विनम्रता आती है. लेकिन इतनी सुंदर बात कपोल कल्पनाओं में लीन विद्वानों, संभ्रातवादियों, लोकहितवादियों, नौकरशाहों, शिक्षाविदों और कामगारों की हकपरस्ती का दंभ भरने वाले ट्रेड यूनियनवादियों के गले नहीं उतर पाई. कल्पनाशील लोग निजी नियोक्ताओं को भी एक सरकार की तरह स्थाई संस्थाओं के रूप में देखते हैं जो सरासर गलत है. संभ्रांतवादियों का मानना है कि निजी क्षेत्र का वेतन ग्राहकों के बजाए शेयरधारक देते हैं. लोकहितवादियों का मानना है कि निजी रोजगार को ऋण से वित्त पोषित सरकारी खर्चों से प्रतिस्थापित किया जा सकता है. नौकरशाहों का मानना है कि वैधानिक नियोक्ता लाभों को वेतन से वित्तपोषित किया जाता है. शिक्षाशास्त्री कौशल को हेय दृष्टि से देखते थे. और ट्रेड यूनियनवादियों का मानना है कि नौकरी को खत्म होने से रोकना भी एक तरह से नौकरी का सृजन करना है. ये सारे छह दृष्टिकोण इसकी गहराई में न झांकने के विचार से ग्रस्त हैं. इस स्थिति को बदलने के लिए निम्नलिखित सुधारों की जरूरत है. 

मनीष सभरवाल

जन विश्वास 2.0: नागरिक अपराधों (सिविल ऑफेंस) को अपराध या क्रिमिनल ऑफेंस की तरह लेने से छोटे कारोबारियों को नुक्सान पहुंचाता है, भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है और अनौपचारिक रवैया पुरस्कृत होता है. जन विश्वास विधेयक ने पिछले साल प्रावधानों में कुछ बदलाव किए. इसने अनुपालन में चूक के मामलों में जेल के बहुत से प्रावधानों को जुर्माने में बदल दिया. 25,000 से अधिक प्रावधानों में से 113 में एम्प्लॉयर को जेल भेजने से राहत दी गई. अब हमें सैकड़ों अनावश्यक जेल प्रावधानों को खत्म करने के लिए जन विश्वास 2.0 शुरू करना होगा.

सरकारी स्कूलों को दुरुस्त करना: कक्षा का आकार कम करने, शिक्षक को नियमित वेतन और बेहतर योग्यताओं वाले शिक्षकों के बावजूद से हमें अपेक्षित परिणाम नहीं मिले हैं क्योंकि ये उपाय आवश्यक तो थे लेकिन पर्याप्त नहीं थे. हमें प्रशासन (निर्णय लेने के अधिकारों का बंटवारा) और प्रदर्शन के प्रबंधन (जिसमें गिरने का डर और बढ़ने की उम्मीद है) को तत्काल ठीक करना चाहिए क्योंकि सरकारी स्कूल अवसरों के सोपान के पहले पायदान हैं.

कौशल विकास की पुनर्कल्पना: अच्छा पाठ्यक्रम तैयार करना और उसे छात्रों तक पहुंचाना कौशल विकास कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने के रास्ते की बड़ी चुनौती हुआ करती थी. लेकिन अब उसे फाइनेंस करना बड़ी चुनौती है. पिछले दशक में, हमने पांच डिजाइन सिद्धांत सीखे हैं जो नए फाइनेंस को आकर्षित करते हैं—काम करते हुए सीखना, कमाई करने के दौरान सीखना, योग्यता मॉड्यूलरिटी के साथ सीखना, फ्लेक्सिबल डिलिवरी के साथ सीखना और सिग्नलिंग वैल्यू के साथ सीखना. केंद्र सरकार की भूमिका बेशक महत्वपूर्ण है, लेकिन राज्य सरकारों को नवाचार के लिए कदम बढ़ाना होगा.

एक ओपन कंप्लायंस ग्रिड: डीपीआई (डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर) की मदद से भुगतान, पहचान और टीकाकरण के प्रमाणपत्र जारी करने की जैसी क्रांति भारत में हुई है, उसे अन्य सरकारी कामों में दोहराया नहीं गया. हमें एक गैर-लाभकारी राष्ट्रीय अनुपालन निगम बनाकर इस खुली और सुव्यवस्थित कार्यप्रणाली को दोहराना चाहिए. सभी नियोक्ता फाइलिंग, अनुपालन और वर्कफ्लो के लिए एपीआइ/इंटरफेस लेयर को संभालकर रखें. एक यूनिक एंटरप्राइज नंबर का उपयोग करते हुए नियोक्ता को डेटा के सीधे प्रसंस्करण की सुविधा देना निजी क्षेत्र को नवाचार में सक्षम बनाएगा. 

एक श्रम संहिता: एम्प्लॉयर्स के लिए यह संभव ही नहीं है कि वे बिना कुछ प्रावधानों का उल्लंघन किए भारत के सभी श्रम कानूनों का पालन कर सकें. मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में नौकरियों को बढ़ाने की हमारी जरूरत को देखते हुए हमें सिंगल लेबर कोड की आवश्यकता है. इससे एम्प्लॉयर और कर्मचारियों की सुरक्षा के हमारे नीतिगत इरादे का मजबूत संकेत जाएगा.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) को द्रुत गति: भारत के कई शिक्षा नीति दस्तावेज—1948 की राधाकृष्णन रिपोर्ट, 1968 की कोठारी समिति रिपोर्ट और 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति—उपयोगी तो थे लेकिन अधूरे थे. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने अंतत: हमें एक रोडमैप दिया है जो शिक्षा और रोजगार के बीच की बाधाओं को तोड़ता है, समग्र शिक्षा को बढ़ावा देता है और विश्वविद्यालयों को आजादी देता है. दुर्भाग्य से, एनईपी के क्रियान्वयन पर आम सहमति बनाने के लिए 15 साल की अवधि तय कर दी गई. हमें यह अवधि घटाकर पांच साल कर देनी चाहिए.

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की तीसरी बैठक में हाल ही में यह निर्णय लिया गया कि वे 'उच्च गति' के बजाए 'उच्च गुणवत्ता' के दृष्टिकोण के साथ काम करेंगे. उच्च ऋण, उच्च लाभ बिंदु और बुनियादी ढांचे में चीन का स्थाई निवेश जिस विशाल स्तर पर पहुंच गया है वह भारत जैसे लोकतंत्रों के लिए एक ऐसी सीमा है जिसे लांघना मुश्किल है. भारत बड़े पैमाने पर समृद्ध भले न हो, लेकिन हमारे पास उत्कृष्टता के प्रभावशाली द्वीप हैं—हमने सऊदी अरब के 2021 में किए गए तेल निर्यात की तुलना में अधिक सॉफ्टवेयर निर्यात किया, हम विदेशों में कार्यरत 1.7 करोड़ भारतीयों की ओर से भेजे गए 120 अरब डॉलर हासिल करते हैं और हम दुनिया की दवा फैक्ट्री हैं. 1955 की भूल को सुधारकर हम आर्थिक स्वतंत्रता को राजनैतिक स्वतंत्रता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने में सक्षम बना सकते हैं. यही नियति के साथ हमारी नई भेंट होगी. 

मनीष सभरवाल

लेखक टीमलीज सर्विसेज के सह-संस्थापक हैं

Advertisement
Advertisement