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ब्लड प्रेशर और कैंसर जैसी बीमारियों के बीच बूढ़ी होती आबादी थामेगी भारत की बढ़त! तो क्या है उपाय?

डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में भारत में हुई मौतों में से 66 फीसद उच्च रक्तचाप, कैंसर, हृदय रोग, डायबिटीज, सरीखे गैरसंचारी रोगों के कारण हुई थीं. टिकाऊ आर्थिक विकास और खुशहाली के लिए बढ़ती गैरसंचारी बीमारियों और बुढ़ाती आबादी की दोहरी चुनौती से निबटना बहुत जरूरी

दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में पोर्टेबल एक्स-रे मशीन से एक मरीज की जांच
दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में पोर्टेबल एक्स-रे मशीन से एक मरीज की जांच
अपडेटेड 5 सितंबर , 2024

भारत को वैश्विक दिग्गज देश बनना है, तो उसकी तेज आर्थिक वृद्धि व समृद्धि के लिए विशालकाय आबादी का सेहतमंद होना बेहद अहम और जरूरी है. आम जनता के लिए स्वास्थ्य को सुलभ और सस्ता तो बनाना ही होगा, साथ ही जीवनशैली से जुड़ी उन बीमारियों की नई महामारी से निबटने के तौर-तरीकों पर भी बहुत ध्यान देना होगा, जिन्हें गैरसंचारी रोगों (एनसीडी) की श्रेणी में रखा गया है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की 'इनविजिबल नंबर्स' (अदृश्य आंकड़े) शीर्षक रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में भारत में हुई मौतों में से 66 फीसद उच्च रक्तचाप, कैंसर, हृदय रोग, डायबिटीज, फेफड़ों की बीमारी, लकवे, गुर्दे की बीमारी और मानसिक विकारों सरीखे गैरसंचारी रोगों के कारण हुई थीं. रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत में 30 या उससे ऊपर की उम्र के 22 फीसद लोग अपनी 70वीं सालगिरह से पहले इन बीमारियों की चपेट में आ जाएंगे.

जाने-माने कार्डियोलॉजिस्ट और सेंटर फॉर क्रॉनिक डिजीज कंट्रोल में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. दोराईराज प्रभाकरण कहते हैं, "एनसीडी के इलाज का न केवल वित्तीय बोझ ज्यादा है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता में कमी और मृत्यु दर में बढ़ोतरी भी ज्यादा है." भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के 2017 के एक अनुमान के मुताबिक, भारत में एनसीडी से होने वाली मौतों का हिस्सा 1990 में 37.9 फीसद से बढ़कर 2016 में 61.8 फीसद हो गया. डॉ. प्रभाकरण कहते हैं, "संक्रामक रोगों के विपरीत, गैरसंचारी बीमारियां जिंदगी भर आपके साथ रहती हैं और सतर्क निगरानी तथा दवा की मांग करती हैं."

एनसीडी के बढ़ते बोझ के अलावा विशाल बुजुर्ग आबादी का पूर्वानुमान भी है जिसकी स्वास्थ्य की जरूरतें खास और ज्यादा लंबे वक्त की होंगी. संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अनुसार, मौजूदा 15.3 करोड़ बुजुर्ग आबादी के 2050 तक दोगुने से ज्यादा बढ़कर 34.7 करोड़ हो जाने की उम्मीद है.

होम मेडिकल केयर फर्म पोर्टिया मेडिकल की 60 फीसद से ज्यादा सेवाओं का लाभ 60 की उम्र से ऊपर के लोग उठाते हैं; इसके प्रेसीडेंट डॉ. विशाल सहगल कहते हैं, ''उनकी स्वास्थ्य की जरूरतें अलग हैं. उन्हें मानसिक और भावनात्मक देखभाल की भी उतनी ही जरूरत है, जितनी शारीरिक रोगों के इलाज की है. हमें ज्यादा मजबूत आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली की भी जरूरत है."

बढ़ते गैरसंचारी रोगों और बुढ़ापे की स्वास्थ्य समस्याओं की इस दोहरी मुश्किल ने विशेषज्ञों को यकीन दिला दिया है कि देश को अपने बुनियादी ढांचे का निर्माण करना और स्वास्थ्य सेवाओं की लागत में सुधार लाना ही होगा. सिक बिजनेस: द ट्रुथ बिहाइंड हेल्थकेयर इन इंडिया के लेखक डॉ. सुमंत सी. रमन कहते हैं, "मौजूदा व्यवस्था बढ़ते मामलों का बोझ नहीं उठा पाएगी. हमें या तो नए अस्पतालों की जरूरत है या मौजूदा अस्पतालों का विस्तार करना होगा."

नई दिल्ली के अपोलो अस्पताल में रोबोटिक सर्जरी का एक दृश्य

रोग की पहचान को प्राथमिकता

विशेषज्ञों का कहना है कि डायग्नोस्टिक्स या रोग की पहचान को उन्नत बनाना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि इससे सबसे पहले संक्रामक रोगों सहित बीमारियों को रोकने में मदद मिलेगी. एम्स नई दिल्ली के पूर्व डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया कहते हैं, ''आज डायग्नोस्टिक्स इलाज के नतीजों की कुंजी है. अगर बीमारियों का समय पर पता चल जाए तो रिकवरी बेहतर होती है, यहां तक कि गैरसंचारी रोग भी ठीक हो सकते हैं जिससे स्वास्थ्य और धन बचता है."

टीबी या तपेदिक के मामले में यह हो भी रहा है, जिसके उन्मूलन में देश जी-जान से जुटा है. डायग्नोस्टिक्स की क्षमता के निर्माण के लिए विभिन्न राज्यों के साथ साझेदारी में काम कर रहे फाइंड इंडिया के कंट्री डायरेक्टर संजय सरीन कहते हैं, "अब जोर डायग्नोस्टिक्स को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के स्तर पर लाने पर है. भारत में ट्रूनेट मशीनें और जेनएक्सपर्ट टेस्ट आ गए हैं, पर उन्हें चलाने के लिए अच्छे-खासे बुनियादी ढांचे और मैनपावर की जरूरत है, जिसका निचले स्तरों पर इस्तेमाल आसान नहीं है. जहां फिलहाल डायग्नोस्टिक्स नहीं हो रहा है, वहां डायग्नोस्टिक्स हो पाए, इसके लिए हम पॉइंट ऑफ केयर मशीनों पर विचार कर रहे हैं."

वे आगे कहते हैं, "मरीज निचले स्तर के सुविधा केंद्रों में आते हैं और सैंपल ऊपर के स्तरों पर भेजने में बहुत ही ज्यादा वक्त लगता है. कोई चाहेगा कि उस किस्म का एक मल्टीप्लेक्स हो जहां केवल टीबी का डायग्नोसिस ही नहीं बल्कि उसी प्लेटफॉर्म पर बहुत-से टेस्ट किए जा सकें. सरकार हाथ से उठाकर ले जाई जाने वाली एक्सरे मशीनें लाने पर विचार कर रही है, जिन्हें डायग्नोसिस के लिए लोगों के बीच ले जाया जा सके."

अलबत्ता, डायग्नोस्टिक्स को तभी बढ़ाया जा सकता है जब उसे समुदाय में ले जाने वाले फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं की संख्या भी बढ़ाई जाए. डब्ल्यूएचओ की 2020 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत को 2030 में प्रति 10,000 आबादी पर 44.5 स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की न्यूनतम सीमा हासिल करने के लिए कम से कम 18 लाख डॉक्टरों, नर्सों और दाइयों की जरूरत है. इसी साल डब्ल्यूएचओ यूरोप और पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया की तरफ से किए गए एक आरंभिक अध्ययन से पता चला कि देश 'प्रति 10,000 आबादी पर 44.5 डॉक्टरों, नर्सों और दाइयों की डब्ल्यूएचओ की सीमा से काफी नीचे है.'

ग्रामीण इलाकों में स्थिति और भी बदतर है, जहां तकरीबन दो-तिहाई आबादी रहती है. केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की तरफ से जारी ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी (आरएचएस) 2021 ने ग्रामीण और शहरी इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) पर डॉक्टरों की 7 फीसद और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) पर 57 फीसद कमी का खुलासा किया. रिपोर्ट ने देश भर में सीएचसी पर जरूरी सर्जन और बच्चों के डॉक्टरों की 80 फीसद से ज्यादा कमी की तरफ भी इशारा किया. शहरी इलाकों के पीएचसी में डॉक्टरों की कमी 9.8 फीसद है, जबकि सीएचसी में यह 34 फीसद है.

स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च बढ़े

देश स्वास्थ्य सेवाओं के खर्च की चुनौती से भी घिरा है. डब्ल्यूएचओ की मार्च 2022 की एक रिपोर्ट का अनुमान है कि हर साल स्वास्थ्य पर आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडिचर (ओओपीई) यानी हैसियत से बाहर वाला खर्च हर साल करीब 5.5 करोड़ लोगों को गरीबी में धकेल देता है, जबकि 17 फीसद से भी ज्यादा परिवार भयावह स्तर तक इस पर खर्च करते हैं. नेशनल हेल्त अकाउंट (एनएचए) के मुताबिक, ओओपीई की कुल हिस्सेदारी बीते सालों में सुधरकर 2004-05 में 69.4 फीसद से 2018-19 में 48.21 फीसद पर आ गई.

मगर विश्व बैंक के अनुसार, यह अब भी 2019 के वैश्विक औसत 18.1 फीसद से काफी ज्यादा है. जहां तक निजी स्वास्थ्य सेवाओं की बात है, एनएसएस के घरेलू सामाजिक उपभोग के 2017-18 के आंकड़ों से पता चला कि निजी अस्पतालों में भर्ती होकर इलाज कराने का खर्च सरकारी अस्पतालों के मुकाबले सात गुना ज्यादा है. 1950 के दशक के शुरुआती सालों में स्वास्थ्य सेवाओं के बाजार में निजी क्षेत्र का हिस्सा 8 फीसद था जो अब बढ़कर 70 फीसद हो गया है.

डॉ. रमन कहते हैं, "सरकार को या तो सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में सुधार लाना होगा या निजी क्षेत्र में खर्चे घटाना या बीमा कवर बढ़ाना होगा."

आर्थिक सर्वेक्षण 2023 के मुताबिक, सार्वजनिक खर्च को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2.5-3 फीसद तक बढ़ाने से ओओपीई को स्वास्थ्य देखभाल पर कुल खर्च के 48.21 फीसद से घटाकर 30 फीसद पर लाया जा सकता है. फिलहाल स्वास्थ्य पर खर्च जीडीपी का 2.1 फीसद है. आर्थिक सर्वेक्षण 2021 के मुताबिक राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर भारत सरकारी बजट में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के मामले में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले 10 देशों में था. स्वास्थ्य सेवा का खर्च उठाने की क्षमता को पूल्ड निगोशिएशन और बेहद जरूरी दवाइयों के मूल्य नियंत्रण के जरिए भी बढ़ाया जा सकता है.

कैंसर का उदाहरण लीजिए. पिछले साल फ्रंटियर्स इन पब्लिक हेल्थ पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चला कि कैंसर पर प्रति मरीज किया गया सालाना सीधा ओओपीई करीब 3.31 लाख रुपए होने का अनुमान था. कैंसर पर ओओपीई में बड़ा योगदान डायग्नोस्टिक्स (36.4 फीसद) और दवाइयों (45 फीसद) का था. कैंसर की दवाइयों की कीमत कम करने के लिए 250 से ज्यादा कैंसर केंद्रों के नेटवर्क और भारत के दो-तिहाई से ज्यादा कैंसर मरीजों का इलाज करने वाले नेशनल कैंसर ग्रिड के 23 अस्पताल पायलट-पूल्ड कार्यक्रम के जरिए खरीद करते हैं. इस पहल का लक्ष्य ऊंचे दाम वाली ओंकोलॉजी और सहायक देखभाल की 40 दवाइयों के मोलभाव की क्षमता में सुधार लाना था.

इस परियोजना के बारे में जनवरी 2023 में डब्ल्यूएचओ के बुलेटिन में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि परियोजना की बदौलत अधिकतम खुदरा मूल्यों के मुकाबले 1,320 करोड़ रुपए की बचत हुई. वह यह भी कहता है कि ये बचत 23 फीसद से 99 फीसद तक (औसतन 82 फीसद) थीं और ब्रांडेड तथा नई पेटेंट वाली दवाओं के मुकाबले जेनेरिक दवाइयों के मामले में ज्यादा थी. पूल्ड खरीद की कामयाबी के आधार पर अध्ययन के लेखकों ने इस तरीके को एनएचए के तहत महंगे इलाज वाले दूसरे कार्यक्रमों पर भी लागू करने की सिफारिश की. एनएचए सरकार की स्वास्थ्य बीमा पहल आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की देखरेख भी करता है.

बीमा कवरेज बढ़ाना

निजी कंपनियां भी खासकर बेहतर बीमा योजनाओं के जरिए खर्च उठाने की क्षमता में सुधार लाने में मदद कर सकती हैं. सरकार की आयुष्मान भारत योजना में कुछ गंभीर बीमारियां शामिल नहीं हैं, जैसे दंतचिकित्सा, ओपीडी खर्च और एचआईवी का इलाज, और इसके 5 लाख रुपए के कवर को कई डॉक्टर सर्जिकल या ऑपरेशन के अलावा एनसीडी के लंबे वक्त के इलाज के खर्चों को पूरा करने के लिए नाकाफी मानते हैं. डॉ. देवी शेट्टी कहते हैं, "मुफ्त स्वास्थ्य सेवा इतने सारे लोगों के देश में काम नहीं आएगी, इसके बजाय हमें सस्ती बीमा योजनाओं की जरूरत है."

डॉ. शेट्टी के अस्पताल नारायणा हेल्थ ने एक ऐसी नई स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू की है जिसे निजी क्षेत्र की तरफ से आयुष्मान भारत का जवाब माना जा रहा है. इस योजना में 10,000 रुपए के सालाना प्रीमियम पर सर्जरियों के लिए 1 करोड़ रुपए और चिकित्सा इंतजामात के लिए 5 लाख रुपए की बीमित धनराशि की पेशकश की जाती है. स्वास्थ्य के बेहतर बुनियादी ढांचे में निवेश करते हुए भारत सही रास्ते पर है, पर इन कोशिशों की रफ्तार तेज करने की जरूरत है.

अगर हमें 2050 तक सभी के लिए स्वास्थ्य कवरेज का लक्ष्य हासिल करना है तो प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा स्तर पर डायग्नोस्टिक की क्षमताएं बढ़ाने, मरीज और स्वास्थ्य कार्यकर्ता के बीच अनुपात सुधारने, सार्वजनिक खर्च और बीमा कवरेज में बढ़ोतरी के जरिए ओओपीई को कम करने और बेहतर मूल्य नियंत्रण तंत्र की जरूरत है.

खास पहलू

- देश में 66 प्रतिशत मौतों का कारण एनसीडी या गैरसंचारी रोग हैं जो कि स्वास्थ्य के मामले में सबसे बड़ी चुनौती है.

- देश की बुढ़ाती आबादी 2050 तक दोगुनी हो जाएगी और उसे खास देखरेख की जरूरत होगी.

- बीमारी की शुरुआत में ही उसका पता लगाने को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के स्तर पर डायग्नोस्टिक सेवाएं बेहतर करनी होंगी.

- स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने के मामले में आउट ऑफ पॉकेट एक्स पेंडिचर यानी हैसियत से बाहर जाकर होने वाले खर्च को घटाना और बीमा कवरेज को बढ़ाना बहुत महत्वपूर्ण होगा.

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