- अरुण पुरी
कोई भी देश अपना दोस्त तो चुन सकता है लेकिन पड़ोसी नहीं. और यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के हर तरफ ऐसे पड़ोसी हैं जो खुद संकट में हैं और संकट बढ़ाने वाले हैं. इसकी ताजा ज्वलंत मिसाल बांग्लादेश का छात्र विद्रोह है, जिसकी वजह से 15 साल से सत्तासीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी.
श्रीलंका में भी 2022 में एकदम इसी तरह का जनाक्रोश सत्ता परिवर्तन की वजह बना था. पाकिस्तान में उस समय आम लोगों ने सड़कों पर उतरकर अभूतपूर्व विरोध-प्रदर्शन किया जब फौज प्रधानमंत्री पद से इमरान खान की बेदखली के प्रयासों में साथ खड़ी नजर आई और उसने जबर्दस्त धांधली वाले चुनावों का समर्थन किया.
इससे फौज का दशकों से कायम प्रभुत्व ही खतरे में पड़ता नजर आया. इस सबके बीच नियंत्रण रेखा पर सीमा पार से आतंकी गतिविधियों को समर्थन बदस्तूर जारी रहा. नेपाल में 14 जुलाई को चीन समर्थक कम्युनिस्ट नेता के.पी. शर्मा ओली ने फिर प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण की. हालांकि, वे भारत समर्थक नेपाली कांग्रेस के साथ गठबंधन की बदौलत सत्ता में आए हैं.
उधर, रणनीतिक लिहाज से नई दिल्ली के लिए काफी मायने रखने वाले एक छोटे-से देश मालदीव में अब मोहम्मद मुइज्जू के रूप में स्पष्ट तौर पर एक चीन समर्थक राष्ट्रपति है. म्यांमार में सत्तारूढ़ जुंटा एक खूनी गृहयुद्ध में उलझा है, और अपने शासन वाले करीब आधे क्षेत्र पर नियंत्रण गंवा चुका है. फिर बारी आती है चीन की, जिसकी भारत के साथ लगती 4,056 किलोमीटर की सीमा तो अशांत है ही, पूरे दक्षिण एशिया में वह शिकारी की तरह घात लगाए रहता है.
नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनने के बाद अब बांग्लादेश की सड़कों पर जल्द ही शांति लौटती नजर आने की उम्मीद है. बहरहाल, ताजा घटनाक्रम नई दिल्ली के लिए एक कूटनीतिक सबक है. हसीना के निरंकुश शासन के खिलाफ भड़के गुस्से ने उनसे जुड़ी हर चीज को अपना कोपभाजन बनाया है—फिर चाहे वह शेख मुजीबुर रहमान की प्रतिमाओं को तोड़ा जाना ही क्यों न हो, जो शेख हसीना के पिता होने के साथ-साथ बांग्लादेश के संस्थापक भी थे.
यही वजह है कि जनाक्रोश की यह आग सारी सीमाएं तोड़ती हुई भारत तक भी पहुंची. हसीना नई दिल्ली के साथ ऐतिहासिक रिश्ते की डोर में बंधी हैं. वे एक धर्मनिरपेक्ष शासक और एक तरह से हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की गारंटी रही हैं. पूर्वोत्तर के उग्रवादियों पर लगाम कसने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई. भारत ने हसीना के साथ मित्रता का इस्तेमाल सीमा विवाद सुलझाने और विशाल बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के निर्माण में किया, जिससे दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्ते भी प्रगाढ़ हुए.
लेकिन इस सबके बदले में भारत ने उनके बढ़ते निरंकुश शासन की ओर से अपनी आंखें मूंद लीं, जिसमें उनके विरोधी या तो जेल पहुंच गए या फिर खत्म कर दिए गए. हसीना की कट्टर प्रतिद्वंद्वी खालिदा जिया भी अब जेल से बाहर आ चुकी हैं, जिन्हें अपने शासनकाल के दौरान हमेशा भारत विरोधी माना जाता रहा है.
भारत ऐसे देशों से घिरा है, जहां चीन के पास अपने हित साधने की काफी क्षमता है. मालदीव में बीजिंग समर्थक राष्ट्रपति मुइज्जू द्वीपसमूह में चीन को नौसैनिक अड्डा विकसित करने की अनुमति देने को आतुर नजर आते हैं. श्रीलंका में सत्ता से अपदस्थ हो चुका राजपक्षे परिवार आगामी राष्ट्रपति चुनाव में पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के 38 वर्षीय बेटे नमल की जीत के साथ फिर सत्ता पर काबिज होना चाहता है. राजपक्षे परिवार को भारत के खिलाफ चीन कार्ड खेलने के लिए जाना जाता है.
रही बात पाकिस्तान की तो उससे किसी भी तरह के समर्थन की उम्मीद करना ही बेमानी है. पाकिस्तान और म्यांमार में अनिश्चितता भारत के लिए समान रूप से चिंता का सबब है. दोनों ही देश काफी सक्रिय ढंग से चीन के साथ जुड़े हैं, जो यहां किसी भी शासन में आसान दखल रखता है.
इस बार की हमारी कवर स्टोरी के लिए ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा ने कई विदेश नीति विशेषज्ञों से बात की और यह जानने की कोशिश की कि आखिर उनका भू-रणनीतिक ज्ञान क्या कहता है? भारत को संकट की ऐसी स्थिति में क्या कदम उठाने चाहिए? उन्होंने भी अपने अनुभवों के आधार पर कुछ सुझाव दिए, मसलन हालात पर सतर्कता के साथ पैनी नजर बनाए रखना जरूरी है. साथ ही कहा कि आर्थिक साझेदारी रिश्तों को मजबूती देने में अहम भूमिका निभा सकती है.
भारत की तरफ से श्रीलंका की मदद के लिए बढ़ाया गया हाथ इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है. राजपक्षे सरकार के पतन के बाद श्रीलंका को भीषण आर्थिक संकट से उबारने के लिए भारत ने करीब 4 अरब डॉलर की आर्थिक मदद दी जो आईएमएफ के 3 अरब डॉलर के अल्पकालिक बेलआउट पैकेज से कहीं ज्यादा था. श्रीलंका आड़े समय पर इतनी उदारता के साथ मदद के लिए भारत का आभारी है, जो संकटग्रस्त राष्ट्र के पुनर्निर्माण में काफी काम आई. इस तरह की सकारात्मक भावना शासन बदलने के बाद भी कायम रहती है.
इसे चीन के प्रति दक्षिण एशियाई देशों की प्रतिक्रियाएं देखकर आसानी से समझा जा सकता है. मालदीव में शत्रुवत भाव रखने वाली मुइज्जू सरकार भी अब भारत की अहमियत समझकर अपने रुख में बदलाव ला रही है. पिछले दशक में चीन ने नेपाल के शीर्ष विदेशी निवेशक के तौर पर भारत को पीछे छोड़ दिया. लेकिन इतना कुछ बखान किए जाने के बावजूद काठमांडो भी भारत के साथ अपनी साझेदारी को अधिक गंभीरता से ले रहा है.
हमारे पड़ोसियों को यह बात समझ आने लगी है कि चीन उनके इर्द-गिर्द कर्ज का जाल बुनकर उन्हें फंसाता है और उनकी संपत्ति कब्जाने की फिराक में रहता है. दूसरी तरफ, भारत सही मायने में एक बड़े भाई की तरह बड़ा दिल रखता है. चीन के साथ 24 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार की तुलना में भारत के साथ 14 अरब डॉलर के लेन-देन के बावजूद ढाका को देर-सबेर यह समझ आ जाएगा कि सरकारें अस्थायी हो सकती हैं लेकिन हित स्थायी होते हैं. नई दिल्ली के लिए बेहतर यही होगा कि वह गुजराल सिद्धांत से सीख ले—अपने छोटे पड़ोसी से जो भी लें, बदले में उससे ज्यादा दें.
यहां तक कि चीन के साथ टकरावपूर्ण रिश्तों के लिए कितनी भी छाती पीट ली जाए, लेकिन अंतत: साझे आर्थिक हित ही आगे का रास्ता निकालेंगे. आखिरकार, यही चीज तो सभी को शांति बनाए रखने के लिए प्रेरित करती है. महत्वपूर्ण है कि भारत की संवैधानिक लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली पर हमें गर्व होना चाहिए. आजादी के 77 वर्षों में यहां एक से दूसरे के हाथ में सत्ता का हस्तांतरण कितने शांतिपूर्ण ढंग से हुआ है. इसे पूरे एशिया में एक दुर्लभ उपलब्धि ही कहा जाएगा. और इसके लिए हम सभी बधाई के पात्र हैं.
- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

