- अरुण पुरी
वह क्या चीज है जो पर्याप्त मात्रा में न मिले तो हमें सबसे तेजी से मार डालेगी? हवा, पानी और खाना स्वाभाविक ही हमारी अनिवार्य जरूरतों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर होते हैं. नींद बहुत बाद में आती है. इसी तरह हम सोचते और जिंदगी जीते हैं. चूंकि इसकी कमी तुरंत हमारी जान नहीं ले लेती, इसलिए भारतीयों ने नींद के मामले में कंजूसी करने की आदत ही डाल ली है.
20 भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 40 से ज्यादा उम्र के लोगों पर किए गए मई, 2023 के सर्वे में दिल्ली के सिविल सोसाइटी संगठन एजवेल फाउंडेशन ने पाया कि इसमें शामिल आधे लोग किसी नींद के विकार से ग्रस्त थे. उनमें से करीब 70 फीसद छह घंटे से भी कम सो रहे थे. शहरी इलाकों में तो 75 फीसद लोग 5-6 घंटे से भी कम सो रहे थे.
एक भारतीय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के इसी साल किए गए एक और व्यापक अध्ययन से बुनियादी बात की तस्दीक हुई—सभी आयु समूहों के 61 फीसद से ज्यादा लोगों ने बताया कि वे छह घंटे से कम सो रहे थे. नींद पर किए गए 100 अध्ययनों की समीक्षा करने वाले 2023 के एक शोधपत्र से पता चला कि चार में से एक भारतीय सीधे इनसोम्निया या अनिद्रा के रोग से पीड़ित है. स्वस्थ जिंदगी जीने के लिए विशेषज्ञ कम से कम सात घंटे की नींद बेहद जरूरी और आठ से नौ घंटे आदर्श मानते हैं.
वैश्विक अध्ययन नियमित रूप से भारत को नींद की गंभीर कमी वाले देशों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर रखते हैं. इसका मतलब है हम दुनिया की सबसे बड़ी नींद से वंचित सेना हैं, जो उनींदी आंखों से एक गंभीर स्वास्थ्य संकट की तरफ बढ़ रही है. हाल के बहुत-से वैज्ञानिक अनुसंधान बताते हैं कि नींद कोई निष्क्रियता की स्थिति नहीं बल्कि मानव शरीर के लिए सबसे रचनात्मक और जीवनदाई घंटों में से एक है.
दरअसल रात की सामान्य नींद के दौरान शरीर सूक्ष्मतम और तंत्रिका स्तरों पर हलचल भरे कामों की कार्यशाला में बदल जाता है. टिश्यूज की मरम्मत होती है, याददाश्त मजबूत की जाती है, हॉर्मोन हर मेटाबोलिक काम को दुरुस्त रखते हैं, मस्तिष्क की 'घरेलू देखभाल करने वाली प्रणाली' उन टॉक्सिक पदार्थों को समेटकर बाहर निकाल देती है जो जमा होने पर अलजाइमर्स की तरफ ले जा सकते हैं, गहरी और धीमी-लहर वाली नींद का दौर नई ऊर्जा से भर देता है. हम खुद को आठ या नौ घंटे की अच्छी नींद से वंचित कर हर रात होने वाली रीबूट की इस व्यवस्था से हाथ धो बैठते हैं.
भारत तेजी से सुस्त और निढाल देश बन रहा है. दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में पहली राष्ट्रीय निद्रा क्लिनिक के संस्थापक डॉ. जे.सी. सूरी इंडिया टुडे को बताते हैं, "अच्छी नींद विलासिता की चीज बन गई है." बेंगलुरु के मनोचिकित्सक सतीश रामैया का अनुमान है कि हमारी करीब 30-40 फीसद आबादी जिंदगी में किसी न किसी वक्त इनसोम्निया से पीड़ित होती है.
भारतीय आखिर कम क्यों सो रहे हैं? वजहें कई हैं, आजीविका से जुड़े मसलों से लेकर 'हर वक्त चल रहे' डिजिटल संसार में फिट होने के लिए लौटने से जुड़े व्यवहार के पैटर्न तक. लगातार काम से गुलजार दुनिया में सोना दोनों लिहाज से तकरीबन अपराध की तरह लगता है. सबसे बढ़कर तो यह कि समाज बहुत ज्यादा उत्पादकता की मांग करता है. यह जद्दोजहद लोगों को दो जून की रोटी कमाने या कामयाबी के लिए रोजमर्रा की बेतहाशा भागदौड़ में धकेल देती है, और वे जिंदगी के आर्थिक हालात को लेकर भी नींद गंवा बैठते हैं.
एजवेल फाउंडेशन के सर्वे से पता चला कि बुजुर्गों की अशांत नींद के मुख्य कारणों में से एक वित्तीय या आपसी मतभेदों की वजह से पैदा पीढ़ियों के बीच टकराव है. स्लीप सॉल्यूशन कंपनी वेकफिट के ग्रेट इंडियन स्लीप स्कोरकार्ड से पता चला कि 2023 में 87 फीसद जितने ज्यादा उत्तरादाता सोने से पहले मोबाइल फोन की स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रहते थे. इसके 2024 के संस्करण में 54 फीसद ने कहा कि वे सोशल मीडिया और ओटीटी देखने के लिए सोने के समय के बाद भी जागते रहते थे.
हमारे ऊपर इसका बड़ी बेरहमी से असर होता है. किसी भी रूप में अनियमित और असामान्य नींद कार्डियोवैस्क्युलर से लेकर कॉग्निटिव स्वास्थ्य तक, हर चीज पर असर डालती है. एक नया अध्ययन, जो अमेरिका में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ ने फिटनेस ऐप फिटबिट और गूगल के साथ मिलकर किया, नींद की कमी और सेहत के लिए उसके व्यापक नतीजों पर नई रोशनी डालता है.
मुख्य निष्कर्षों में से एक यह है कि अनियमित और कम नींद का गहरा संबंध उच्च रक्तचाप, मानसिक विकारों और माइग्रेन से है. इससे यह भी पता चला कि संतुलित नींद व्यक्ति की मानसिक सेहत और भावनात्मक खुशहाली में अहम भूमिका अदा करती है. इसलिए देश में नींद का ऑडिट करवाना जनस्वास्थ्य की प्राथमिकता बननी चाहिए.
इस हफ्ते की आवरण कथा में सीनियर एडिटर सोनाली आचार्जी हमें अज्ञानता की इस नींद से जगा रही हैं. पहला सबक यह है कि हम अनदेखी कतई नहीं कर सकते—हमें खुद को शिक्षित करना ही होगा कि यह क्या है, इसके अलग-अलग चरण कैसे जीवनदाई कामों को अंजाम देते हैं, और इसका अभाव हमारे साथ क्या-क्या कर सकता है. हममें से कई बुनियादी बातें जानते हैं, पर फिर भी उन पर अमल नहीं कर पाते. मगर अनिद्रा अब विकल्प नहीं रह गई है, यह गंभीर विकार बन गई है.
रोग की पहचान हो गई तो हम इलाज के चरण में पहुंच जाते हैं. इन पन्नों में नींद और उसके विभिन्न विकारों को समझाने वाले विवरण और ग्राफ ही नहीं बल्कि इलाज की नई आशाजनक पद्धतियां भी मिलेंगी. गैजेट्स की एक पूरी शृंखला है जिसका आप इस्तेमाल कर सकते हैं—शोर-शराबे से बचाने वाले स्लीप बड सरीखे आसान उपकरणों से लेकर तापमान को मेंटेन रखने वाली डिवाइसें, हल्के संगीत बजाने वाले स्पीकर और खर्राटों में मदद करने वाली डिवाइसों तक.
मोटे कंबल, हवादार पायजामे, आरामदायक गद्दे और स्मार्ट तकियों सरीखी भौतिक मदद भी मौजूद हैं. व्यायाम हैं जो सांस लेने की गति को धीमा करके अच्छी नींद लाने में मदद करते हैं. कैमोमाइल चाय सरीखे घरेलू उपचारों को अभी वैज्ञानिक समर्थन नहीं मिला है, पर आपके लिए कारगर हों तो क्या बुराई है. कुछ काम न आए तो लोकप्रिय हो चुकीं मेलाटोनिन गमीज सरीखी कई दवाइयां हैं.
सबसे अच्छा तरीका है अनुशासन और खुद अपनी देखभाल के साथ अपने आप पर नियंत्रण पाना. जब रात होती है, तो यह बिस्तर में घुसकर किसी सूझ या विचार को गले लगाने का समय होता है. इसे स्लीप हाइजीन कहते हैं. तकरीबन सभी ने यह तो सुना ही है कि किन चीजों से बचें—अल्कोहल, कैफीन और नीली रोशनी उत्सर्जित करने वाली इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस.
अगर आप आंखें खुली रखकर जानते-बूझते जीववैज्ञानिक नाकामी का मुंह नहीं देखना चाहते, तो स्वीकार कीजिए कि रोजमर्रा की जिंदगी में तकरीबन ऐसी कोई चीज नहीं है जो कल की सुबह का इंतजार न कर सके. अगर आप यह संपादकीय रात में पढ़ रहे हैं, तो इन शब्दों के बाद अब और कुछ न पढ़िएगा. शुभ रात्रि!
- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

