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सीयूईटी-यूजी : नतीजों में देरी का कैसे सब भुगत रहे खामियाजा?

सीयूईटी—यूजी के नतीजे आने में हुई देरी की वजह से हर पक्ष प्रभावित. छात्रों, अध्यापकों और सरकारी संस्थानों इन सबकी बढ़ी परेशानी

दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज के बाहर जमा परीक्षार्थी और उनके परिजन
दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज के बाहर जमा परीक्षार्थी और उनके परिजन
अपडेटेड 15 अगस्त , 2024

अपना 18वां जन्मदिन इसी सितंबर में मनाने जा रहीं फरीदाबाद की देवशी शर्मा ने इस साल मार्च में बारहवीं की परीक्षा दी है. वह ग्रेजुएशन के बाद कोलंबिया यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करना चाहती हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले के लिए उन्होंने मई में कॉमन यूनिवर्सिटी ऐंट्रेंस टेस्ट—अंडर ग्रेजुएशन (सीयूईटी-यूजी) दिया. नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) के हिसाब से इस परीक्षा के नतीजे 13 जून को आ जाने थे, मगर एजेंसी का हिसाब इन दिनों सही बैठ नहीं पा रहा. नतीजे तय समय से डेढ़ महीने बाद 28 जुलाई को आए.

देरी से होने वाली दिक्कतों के बारे में देवशी कहती हैं, "मेरे पांच महीने खराब हो गए. मेरे साथ पढ़ाई करने वाले सभी बच्चों की यही परेशानी है. मार्च में हमारी 12वीं की परीक्षा हो गई थी. एनटीए ने जो कैलेंडर पहले जारी किया था, उसके हिसाब से अप्रैल में सीयूईटी-यूजी हो जानी थी. लेकिन हमारी 12वीं बोर्ड के तकरीबन डेढ़ महीने बाद यह परीक्षा हुई. पहले तो डेढ़ महीने की यह देरी समझ से परे है. फिर उसके बाद रिजल्ट में डेढ़ महीने की देरी की गई. 28 जुलाई को रिजल्ट आने का यह मतलब है कि पूरे अगस्त काउंसलिंग और एडमिशन की प्रक्रिया चलेगी. यानी मेरे जैसे लाखों स्टुडेंट्स का पांच महीने का समय बर्बाद हो गया."

इस बार सीयूईटी-यूजी में देशभर के तकरीबन 14 लाख बच्चे शामिल हुए थे. ग्रेजुएशन में अलग-अलग विषयों में दाखिले के लिए आयोजित होने वाली यह परीक्षा 15 मई से 29 मई के बीच आयोजित की गई. जिन पांच महीनों की बर्बादी के बारे में देवशी बता रही हैं, उसके और गहरे परिणामों को दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाने वाले एसोसिएट प्रोफेसर देबराज मुखर्जी रेखांकित करते हैं.

मुखर्जी कहते हैं, "सीयूईटी-यूजी में शामिल होने वाले अधिकांश बच्चे 17—18 साल की उम्र के हैं. लर्निंग कर्व के हिसाब से देखें तो यह उम्र सबसे प्रोडक्टिव होती है. इस उम्र में बच्चों में कुछ नया सीखने की ललक होती है और उनमें सीखने की क्षमता भी होती है. ऐसे में इस उम्र के बच्चों के लिए समय की यह बर्बादी और ज्यादा अखरने वाली बात है."

सीयूईटी-यूजी की व्यवस्था से पहले अलग-अलग विश्वविद्यालय विभिन्न कोर्स में दाखिले की अलग-अलग प्रक्रियाएं अपनाते थे. कहीं 12वीं में आए अंकों के कट-ऑफ के आधार पर दाखिला होता था, तो कुछ विश्वविद्यालय अपनी प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करते थे. इससे छात्रों को जो समस्याएं आ रही थीं, उनके समाधान के उद्देश्य से सीयूईटी-यूजी और सीयूईटी-पीजी परीक्षाएं शुरू की गईं. सीयूईटी-यूजी की शुरुआत साल 2022 में हुई. तब यह तय हुआ कि सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में इसके माध्यम से ही दाखिला मिलेगा.

अन्य विश्वविद्यालयों के लिए इस परीक्षा में शामिल होना ऐच्छिक रखा गया. लेकिन हर साल के साथ इस परीक्षा में शामिल होने वाले विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ती गई. इस साल सीयूईटी-यूजी के माध्यम से कुल 283 विश्वविद्यालयों के ग्रेजुएशन कोर्सेज में दाखिला प्रस्तावित था. इनमें केंद्रीय विश्वविद्यालयों के अलावा राज्य विश्वविद्यालय, डीम्ड विश्वविद्यालय और निजी क्षेत्र के विश्वविद्यालय भी शामिल हैं.

सीयूईटी-यूजी परीक्षा कराने की पूरी जिम्मेदारी एनटीए की है. जब सीयूईटी-यूजी शुरू भी नहीं हुई थी, तब ही मई, 2024 के पहले हफ्ते में मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए एनटीए ने नीट-यूजी आयोजित किया. उस परीक्षा के अगले ही दिन बिहार की राजधानी पटना में कथित पेपर लीक का एक मामला सामने आया. बिहार पुलिस ने इस बारे में एनटीए से जानकारी मांगी. इसी बीच सीयूईटी-यूजी शुरू हो गई.

यह परीक्षा 29 मई को खत्म हुई है और इसके हफ्ते भर के अंदर नीट-यूजी में पेपर लीक के मामले ने तूल पकड़ लिया. पटना के अलावा दूसरे जगहों से भी कथित पेपर लीक की शिकायतें आने लगीं. मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा. देश के अलग-अलग हिस्से में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन होने लगे. बिहार पुलिस ने संदिग्धों की गिरफ्तारी शुरू कर दी. इस बीच एनटीए की ओर से आयोजित दूसरी परीक्षा नेशनल एलिजिबलिटी टेस्ट (नेट) में भी पेपर लीक का मामला सामने आया और उस परीक्षा को रद्द करना पड़ा.

इन सबसे केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ा और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने एनटीए के महानिदेशक सुबोध कुमार सिंह को उनके पद से हटा दिया. साथ ही मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी. साथ ही, उसने एनटीए की कार्यप्रणाली की समीक्षा करके अपनी सिफारिशें देने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन कर दिया.

सीयूईटी-यूजी के परिणाम जारी करने में हुई देरी की मुख्य वजह नीट-यूजी में कथित पेपर लीक के बाद हुए घटनाक्रम को बताया जा रहा है. नीट-पीजी 23 जून को होनी थी. लेकिन नीट-यूजी के बवाल की वजह से इसे अगस्त तक के लिए टाल दिया गया. 31 जुलाई को आवेदकों को उनके परीक्षा केंद्र का शहर बताया गया. 8 अगस्त को एडमिट कार्ड जारी किया जाना है, और अब 11 अगस्त को यह परीक्षा प्रस्तावित है.

नतीजों में देरी की वजह से न सिर्फ छात्रों का अहम वक्त बर्बाद हुआ, बल्कि विश्वविद्यालयों का अकादमिक कैलेंडर भी प्रभावित हुआ

एनटीए की तरफ से सीयूईटी-यूजी के परिणाम जारी करने में हुई देरी की औपचारिक वजह तकरीबन 1,000 छात्रों के लिए इस परीक्षा को फिर से 19 जुलाई को कराए जाने को बताया जा रहा है. कुछ छात्रों ने परीक्षा के लिए जिस भाषा माध्यम का चयन किया था, उन्हें दूसरे भाषा माध्यम का पेपर मिल गया था. वहीं नीट-यूजी पेपर लीक के बाद विवादों के घेरे में आए हजारीबाग, झारखंड के ओएसिस पब्लिक स्कूल के सेंटर के 250 छात्र भी दोबारा आयोजित सीयूईटी-यूजी में शामिल हुए.

आखिरकार, रविवार 28 जुलाई को सीयूईटी—यूजी का परिणाम जारी किया गया. दिल्ली विश्वविद्यालय और दिल्ली के ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने इसके तीन दिनों के बाद काउंसलिंग शुरू की. दिल्ली विश्वविद्यालय में आम तौर पर छठी—सातवीं लिस्ट तक दाखिले की प्रक्रिया चलती रहती है. इसका मतलब यह हुआ कि देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में पूरे अगस्त काउंसलिंग और दाखिले की प्रक्रिया चलेगी तथा सितंबर से ही पढ़ाई शुरू हो पाएगी.

देर से रिजल्ट आने के बाद लंबी चलने वाली काउंसलिंग प्रक्रिया की वजह से सीटों का भरना भी मुश्किल हो जाता है. अगर दिल्ली विश्वविद्यालय का ही उदाहरण लें तो पिछले साल चार राउंड की काउंसलिंग के बाद सितंबर, 2023 के अंत तक कुल 5,753 सीटें वहां खाली थीं. अक्तूबर मध्य तक इन खाली सीटों की संख्या घटकर तकरीबन 1,000 रह गई. उसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय ने दाखिले का मॉप अप राउंड चलाया और तब जाकर इनमें से अधिकांश खाली सीटें भर पाईं. इस बार तो मॉप अप राउंड आते-आते ही नवंबर आ सकता है.

इस देरी की वजह से तकरीबन 14 लाख बच्चे और उनके अभिभावक लगातार इसको लेकर चिंता में रहे कि वे जिन संस्थानों में दाखिला लेना चाह रहे हैं, वहां दाखिला मिल पाएगा या नहीं. इस वजह से कई छात्रों ने निजी क्षेत्र के संस्थानों में दाखिला ले लिया. अगर उन्हें मनपसंद कॉलेज नहीं मिलता है तो कम से कम प्राइवेट संस्थान में उनकी एक सीट तो रहेगी.

बिहार के गया से 12वीं तक की पढ़ाई करने वाले प्रेम आशीष बताते हैं, "मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों की सूची बना रखी है क्योंकि यहां एडमिशन काफी मुश्किल होता है. लेकिन जब सीयूईटी-यूजी के रिजल्ट में देरी होने लगी तो मैं भी परेशान होने लगा और मेरे परिवार के लोग भी चिंतित होने लगे. खास तौर पर यह चिंता तब और बढ़ गई जब कुछ प्राइवेट संस्थानों ने दाखिला शुरू कर दिया."

वे आगे बताते हैं, "परेशान होकर मैंने अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में एडमिशन करा लिया. जहां दिल्ली विश्वविद्यालय में पूरा कोर्स कुछ हजार रुपए में हो जाता, वहीं इस विश्वविद्यालय की फीस तकरीबन 14 लाख रुपए है. एडमिशन के समय ही तीन लाख रुपए से अधिक खर्च करना पड़ा. अब अगर मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला मिल भी जाता है तो मेरे सारे पैसे वापस नहीं मिलेंगे."

ऐसी उलझन कई और छात्रों की भी है. एक समस्या यह भी है कि प्राइवेट संस्थानों में दाखिला वापस लेने की एक समय सीमा होती है और सीयूईटी-यूजी के नतीजे देर से आने के कारण काउंसलिंग पूरे अगस्त चलने की उम्मीद है. ऐसे में कई छात्रों के लिए एडमिशन वापस लेने की समय सीमा पार हो जाएगी.

दिल्ली विश्वविद्यालय के अकादमिक परिषद के निर्वाचित सदस्य और हंसराज कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर मिठूराज धूसिया कहते हैं, "सीयूईटी-यूजी के रिजल्ट में देरी ने एक तरह से शिक्षा को प्राइवेट संस्थानों की तरफ धकेल दिया है. इस परीक्षा में शामिल होने वाले कई निजी विश्वविद्यालयों ने देरी का हवाला देकर एडमिशन शुरू कर दिया. 12 जुलाई, 2024 को अकादमिक परिषद की जो बैठक हुई, उसमें हमने यह मांग उठाई कि दिल्ली विश्वविद्यालय को सीयूईटी-यूजी से बाहर निकलकर दाखिले की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए, लेकिन यह बात नहीं मानी गई. इससे नुक्सान आम छात्रों का हो रहा है. वे अधिक पैसे देकर निजी विश्वविद्यालय में दाखिला लेने को मजबूर हैं."

दिल्ली विश्वविद्यालय की ही अकादमिक काउंसिल की दूसरी सदस्य माया जॉन जीसस ऐंड मेरी कॉलेज में पढ़ाती हैं. इस देरी की वजह से वह बच्चों पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभावों के बारे में बताती हैं, "कोविड के बाद से एडमिशन साइकल नॉर्मल नहीं हुआ है. इस साल हम सब उम्मीद कर रहे थे कि यह नॉर्मल हो जाएगा. जब एडमिशन देरी से होता है तो फिर जो बच्चे आते हैं, वे एक अजीब तरह का दबाव महसूस करते हैं. देरी से दाखिले के बाद वे क्लास में आते हैं तो उन पर अचानक एक सेमेस्टर यानी छह महीने के कोर्स को तीन—चार महीने में पूरा करने का दबाव आ जाता है. उनके पास कैंपस लाइफ या दूसरी गतिविधियों के लिए समय ही नहीं बचता. इस वजह से उनकी सीखने की प्रक्रिया प्रभावित होती है."

दरअसल, दाखिले में देरी की वजह से सिर्फ छात्र ही प्रभावित नहीं होते, बल्कि इससे किसी भी संस्थान का पूरा अकादमिक कैलेंडर प्रभावित हो जाता है. इसे दिल्ली विश्वविद्यालय के उदाहरण से समझा जा सकता है. कई वर्षों से दिल्ली विश्वविद्यालय का यह कैलेंडर फिक्स रहा है कि 16 जुलाई से क्लासेज शुरू होंगी. इसके साथ ही सेमेस्टर ब्रेक और परीक्षाओं की तारीखें भी तय रहती हैं. इससे अध्यापकों और छात्रों दोनों को सुविधा होती है. लेकिन पहले कोविड की वजह से, और अब सीयूईटी-यूजी के रिजल्ट में देरी की वजह से पूरा अकादमिक कैलेंडर प्रभावित हो गया है.

इससे अध्यापकों पर पड़ने वाले असर के बारे में देबराज मुखर्जी कहते हैं, "एडमिशन में देरी की वजह से पहला सेमेस्टर शुरू होने में देरी होती है. जबकि तीसरा और पांचवां सेमेस्टर शुरू हो जाता है. नवंबर में इन दोनों सेमेस्टर की परीक्षाएं होती हैं. जबकि देरी की वजह से तब तक पहले सेमेस्टर की क्लासेज ही चल रही होती हैं."

वे आगे बताते हैं, "फिर जब तक इसकी परीक्षाएं होंगी तब तक तीसरे और पांचवें सेमेस्टर की कॉपियों की जांच करनी होती है. फिर जब चौथा और छठा सेमेस्टर शुरू हो जाएगा तो उस समय हम पहले सेमेस्टर की कॉपियों की जांच कर रहे होते हैं. यानी अध्यापकों को पढ़ाने, परीक्षा कराने और कॉपियों की जांच करने का काम एक साथ करना पड़ता है."

कई अध्यापकों से बात करने पर यह भी पता चलता है कि अकादमिक जगत में सीयूईटी-यूजी के औचित्य को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. 12 जुलाई को दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद की बैठक में भी यह बात उठी. इस बैठक में शामिल प्राध्यापकों का कहना है कि मूल सवाल यह उठ रहा है कि दिल्ली विश्वविद्यालय या अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालय एनटीए पर क्यों आश्रित रहें और अपना अकादमिक कैलेंडर क्यों डिस्टर्ब करें.

यह भी सवाल उठ रहा है कि एनटीए कोई वैधानिक संस्था नहीं है, बल्कि एक रजिस्टर्ड सोसाइटी है और पेपर सेट करने से लेकर अन्य दूसरे कार्यों के लिए सरकारी संस्थानों से बुलाए जाने वाले विशेषज्ञों पर निर्भर है, इसलिए ऐसी किसी संस्था पर केंद्रीय विश्वविद्यालयों की निर्भरता उचित नहीं है. बाजार इस परीक्षा को अपने तरीके से भुना रहा है और सीयूईटी-यूजी के नाम पर विभिन्न कोचिंग संस्थान खुल चुके हैं. ऐसे में जरूरी विशेषज्ञता, समय की पाबंदी और संस्था में भरोसा ही इन लाखों छात्रों का भविष्य तय करेगा, जो फिलहाल तो धुंधला दिखाई दे रहा है.

सबके हिस्से की अपनी कीमत

छात्र

● सीयूईटी—यूजी के रिजल्ट में देरी की वजह से तकरीबन 14 लाख छात्रों का पांच महीना हुआ बर्बाद
● बहुत सारे छात्रों ने प्राइवेट संस्थानों में मोटी फीस देकर लिया दाखिला. अब पसंद के सरकारी कॉलेज में दाखिला मिलने के बाद निजी संस्थानों से पैसा वापस पाने की चुनौती
● पढ़ाई शुरू होने में देरी की वजह से छह—छह महीने के पहले और दूसरे सेमेस्टर का काम कम समय में पूरा करने का दबाव
● कुछ संस्थानों में छुट्टी के दिन भी होंगी न्न्लासेज
● कैंपस लाइफ से संबंधित अन्य गतिविधियों के लिए छात्रों के पास समय नहीं
● सीयूईटी—यूजी आने की वजह से कोचिंग न्न्लासेज पर बढ़ रही है निर्भरता

अध्यापक

● कम समय में पहले और दूसरे सेमेस्टर का कोर्स पूरा करने की चुनौती
● पढ़ाने के साथ-साथ परीक्षा लेने और कॉपी जांचने का काम करना होगा
● सेमेस्टर ब्रेक का समय नहीं मिलने की वजह से अध्यापकों के रिसर्च का काम होगा प्रभावित

सरकारी शैक्षणिक संस्थान

● पूरा अकादमिक कैलेंडर अस्त—व्यस्त, समय पर अकादमिक कैलेंडर शुरू करने के लिए एनटीए पर अतिनिर्भरता
● बहुत सारे अच्छे छात्रों ने मजबूरी में लिया प्राइवेट संस्थानों में दाखिला, इससे सरकारी संस्थानों में आने वाले छात्रों की गुणवत्ता प्रभावित होने का अंदेशा
● अकादमिक कैलेंडर बिगड़ने से केंद्रीय विश्वविद्यालयों के रेपुटेशन पर पड़ेगा असर 
● कम समय में पढ़ाई पूरी कराने, परीक्षा कराने और परिणाम जारी करने की वजह से इन संस्थानों का रिसर्च का काम हो रहा है प्रभावित

अधर में 20,000 सुपर स्पेशियलिटी डॉक्टर

मेडिकल कॉलेजों में सुपर स्पेशियलिटी कोर्सेज में दाखिले के लिए एक अलग परीक्षा नीट-सुपर स्पेशियलिटी (नीट-एसएस) हर साल आयोजित की जाती है. राष्ट्रीय मेडिकल आयोग (एनएमसी) यह परीक्षा आयोजित कराती है. एमडी, एमसीएच और डीएनबी एसएस जैसे सुपर स्पेशियलिटी कोर्सेज की तकरीबन 6,000 सीटों पर दाखिले के लिए आयोजित होने वाली इस परीक्षा में तकरीबन 20,000 डॉक्टर बैठते हैं.

इस परीक्षा के अभ्यर्थी एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करके आते हैं. पिछले साल यह परीक्षा 29 और 30 सितंबर को आयोजित की गई थी. लेकिन 2024 में यह परीक्षा नहीं होगी! एनएमसी ने यह फैसला लिया है कि साल 2024 की नीट—एसएस परीक्षा जनवरी, 2025 में आयोजित कराई जाएगी. इस बारे में एनएमसी के अधिकारियों से बात करने पर पता चलता है कि जिस बैठक में इस परीक्षा को टालने का फैसला लिया गया, उस बैठक में यह बात उठी कि नीट—एसएस के 2023 बैच की पढ़ाई मार्च, 2024 में शुरू हो पाई. एनएमसी की बैठक में इस देरी की वजह कोविड के कारण अकादमिक साइकिल बिगड़ने को बताया गया.

इसके आधार पर यह तर्क दिया गया कि अगर नीट-एसएस, 2024 का आयोजन अभी किया गया तो एक साथ दो बैच चल रहे होंगे. इस आधार पर एनएमसी बोर्ड ने यह फैसला लिया कि इस परीक्षा को साल 2025 के जनवरी तक टाल दिया जाए. यह पूछे जाने पर कि जनवरी, 2025 में नीट एसएस, 2024 आयोजित कराने का क्या यह मतलब निकाला जाए कि नीट—एसएस, 2025 की परीक्षा नहीं होगी, इस अधिकारी ने कहा कि अभी इस बारे में कोई फैसला नहीं लिया गया.

हालांकि, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने एनएमसी को पत्र लिखकर इस परीक्षा को टाले जाने पर आपत्ति जताई और कहा है कि इससे बहुत सारे डॉक्टरों का एक साल का वक्त बर्बाद हो जाएगा.

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