
प्र. आपकी राय में केंद्रीय बजट 2024-25 में मुख्य जोर किन बातों पर है?
आशिमा गोयल: आर्थिक वृद्धि की खास रुकावटों की ठीक से पहचान की गई है और देश में ऊंची विकास दर को बनाए रखने के लिए उन्हें दूर करने की जरूरत पर ध्यान दिया गया है. उनमें कई चीजें शामिल हैं. मसलन कृषि पैदावार बढ़ाना और उस पर जलवायु परिवर्तन के असर को कम करना, इन्फ्रास्ट्रक्चर में बढ़ोतरी के साथ-साथ अच्छी नौकरियों का सृजन, रोजगार-संबंधित कौशल के स्तर और मात्रा को बढ़ाना और दक्षता में सुधार के लिए राज्यों के साथ मिलकर काम करना. इन्हीं वजहों से हमारी अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त है. असली बदलाव लाने के लिए निजी क्षेत्र और राज्यों को साथ लेकर चलना जरूरी है. बजट में इसके लिए कुछ अच्छे डिजाइन किए गए प्रोत्साहन दिए गए हैं.
अजित रानाडे: बजट का मुख्य जोर रोजगार सृजन, कौशल विकास, मानव श्रमबल को बढ़ाने और छोटे व्यवसायों की मदद करने के लिए प्रोत्साहन देने पर है. हुनर या कौशल निर्माण और प्रशिक्षण टिकाऊ ऊंची विकास दर की जरूरत है. छोटे कारोबारों की व्यावहारिकता और समृद्धि के लिए भी समावेशी विकास की रणनीति अपनाई गई है. असल में छोटे कारोबार और उद्योग ही औद्योगिक क्षेत्र में 40 फीसद से ज्यादा रोजगार, मूल्य-संवर्धन और निर्यात मुहैया कराते हैं.
इसके अलावा, ऊर्जा सुरक्षा से संबंधित बजट के हिस्से में कठिन क्षेत्रों को मान्यता देना और अक्षय ऊर्जा पर निरंतर जोर, और अब परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी जैसे उपाय स्वागतयोग्य होने चाहिए. बजट की दूसरी प्रमुख विशेषता राजकोषीय संतुलन पर सख्ती और सावधानीपूर्वक ध्यान देना है.
डी.के. जोशी: बजट 2025 में अंतरिम बजट में निर्धारित राजकोषीय घाटे के लक्ष्य में सुधार करके राजकोषीय संतुलन को बनाए रखा गया है. इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण पर केंद्रित पूंजीगत खर्च को जारी रखा गया है. कुछ समस्याओं को दूर करने के लिए राजस्व व्यय बढ़ाया गया है. इसमें खाद्य वस्तुओं की महंगाई पर नियंत्रण के लिए संरचनात्मक उपायों की भी घोषणा की गई है.
नीलकंठ मिश्र: सरकार व्यापक आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता दे रही है, जो अनिश्चितता और पूंजी की लागत को कम करने के लिए जरूरी है. ये दोनों ही उपाय मध्यम अवधि में निवेश में तेजी लाने के लिए महत्वपूर्ण हैं. जैसे-जैसे आर्थिक वृद्धि की रफ्तार बढ़ रही है, सरकार सतर्कता के साथ मदद की योजनाओं और कार्यक्रमों को वापस ले रही है.
चिंताजनक ऊंचे सरकारी कर्ज-जीडीपी अनुपात (जो महामारी का भी नतीजा है) के मद्देनजर कर्ज अनुपात को आसान स्तर पर लाने के लिए कई वर्षों तक कम और घटते घाटे और पूंजीगत खर्च (जो कई वर्षों तक विकास को बढ़ावा देता है, राजस्व व्यय के विपरीत जिसमें विकास की कम संभावना होती है) को बढ़ाने की आवश्यकता होगी. मूल्य स्थिरीकरण कोष का निर्माण खाद्य वस्तुओं की महंगाई को कम करने के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो मौद्रिक नीति समिति को ब्याज दरों में कटौती करने से रोक रहा है.
मदन सबनवीस: मुख्य जोर राजकोषीय घाटे को वित्त वर्ष 26 तक घटाकर 4.5 फीसद करने के एफआरबीएम (फिस्कल रेस्पॉसिंबिलिटी ऐंड बजट मैनेजमेंट) लक्ष्य को हासिल करने पर है. मोटे तौर पर कराधान और खर्च के सभी प्रस्ताव इसी उद्देश्य के इर्द-गिर्द केंद्रित हैं.
अदिति नायर: बजट का मुख्य जोर देश में खपत और निवेश क्षमता को बढ़ाने के लिए खर्च और राजकोषीय घाटे के बीच व्यावहारिक संतुलन बनाने पर है. लोकसभा चुनाव से पहले पेश किए गए अंतरिम बजट की तुलना में पूर्ण बजट तैयार करते समय सरकार के पास राजस्व में बढ़ोतरी मौजूद थी. हमने अनुमान लगाया था कि इस राजस्व वृद्धि का लगभग आधा ही खर्च किया जाएगा, जबकि शेष आधे का उपयोग राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए किया जाएगा.
हमारी उम्मीदों के मुताबिक, जुलाई के बजट में कई क्षेत्रों की मदद के लिए राजस्व व्यय में 55,000 करोड़ रुपए की वृद्धि की गई है, साथ ही मामूली कर राहत भी दी गई है. इसके अलावा राजकोषीय घाटे को घटाकर जीडीपी के 4.9 फीसद तक लाने का प्रस्ताव है, जबकि अंतरिम बजट अनुमान (आइबीई) में यह जीडीपी के 5.1 फीसद पर था. पूंजीगत खर्च के लक्ष्य को पहले की तरह 11.1 लाख करोड़ रुपए पर ही रखा गया है.
प्र. क्या बजट रोजगार सृजन से जुड़ी चिंताओं को दूर कर पाएगा? भला कैसे?
गोयल: बजट में इसके लिए कदम उठाए गए हैं. कंपनियों को प्रोत्साहन और श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान दिया गया है. कौशल विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने और उसके लिए सीएसआर फंड के उपयोग की इजाजत से रोजगार क्षमता में सुधार होगा और यह तय होगा कि हुनर या कौशल काम का है.
दरअसल, कई फर्म कम प्रशिक्षण देती हैं क्योंकि दूसरी फर्म इन गतिविधियों के लाभ में हिस्सा बंटा लेती हैं. यह स्पिलओवर की क्लासिक मिसाल है. इसलिए सीएसआर के रूप में सार्वजनिक सब्सिडी से कंपनियों को प्रशिक्षण का दायरा बढ़ाने में मदद मिलेगी. सरकार को यह आश्वस्त करना चाहिए कि लाभ मौजूदा प्रशिक्षण कार्यक्रमों के विस्तार या नए मौकों को मिले.

रानाडे: अधिकांश नौकरियों और रोजगार का सृजन निजी क्षेत्र में और वह भी छोटे उद्यमों में होगा. आर्थिक सर्वेक्षण का अनुमान है कि देश में अगले कुछ दशकों तक हर साल लगभग 80 लाख नौकरियां तैयार करने की दरकार है. ये भविष्य की नौकरियां हैं, न कि अतीत या वर्तमान की. इसका मतलब है कि इन नौकरियों के लिए नए हुनर और प्रशिक्षण की आवश्यकता है.
देश में फिलहाल हुनर और नौकरियों दोनों की भारी कमी है. हुनर सिर्फ कॉलेज या अकादमियों में नहीं मिलता, बल्कि नौकरी करते हुए सीखना पड़ता है. इसके लिए प्रशिक्षण और इंटर्नशिप के लिए राष्ट्रीय रणनीति की आवश्यकता है. बजट में इंटर्नशिप के माध्यम से हुनर के साथ-साथ नौकरी सृजन के लिए सही प्रोत्साहन दिया गया है.
जोशी: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रोजगार सृजन पर खर्च की खातिर अधिक आवंटन के जरिए रोजगार सृजन को बढ़ावा दिया जा रहा है. ग्रामीण और शहरी आवास योजनाओं के लिए ज्यादा आवंटन से निर्माण को बढ़ावा मिलेगा, जो श्रम-प्रधान क्षेत्र है. इनके अलावा, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में बुनियादी ढांचे और सड़क संपर्क को बढ़ाने के लिए पूर्वोदय योजना की घोषणा से भी रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं.
अगले पांच वर्षों में निजी क्षेत्र के साथ मिलकर काम करने की पेशकश करके 4.1 करोड़ युवाओं के कौशल और रोजगार के लिए प्रोत्साहन से रोजगार सृजन को बल मिलेगा. बजट में पांच साल की अवधि में 'रोजगार से जुड़े प्रोत्साहन’ की इन नई योजनाओं पर 2 लाख करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है. आर्थिक सर्वेक्षण में रोजगार और आमदनी को बढ़ाने के मामले में निजी क्षेत्र की प्रमुख भूमिका बताई गई है. सरकार ने कर्मचारियों और नियोन्न्ताओं को वित्तीय सहायता प्रदान करके निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित किया है.
मिश्र: अगर महामारी न आई होती, उस हाल में देश की जीडीपी जहां होती, आज उससे करीब साल भर से भी ज्यादा पीछे चल रही है. इसलिए श्रम बाजार में काफी सुस्ती है. इसका मतलब है कि कार्यबल में शामिल होने वाले मजदूरों की जमात लगभग दोगुनी है यानी पिछले एक साल से ज्यादा समय की संख्या जुड़ी हुई है. लिहाजा, बदले में मजदूरों की पारिश्रमिक के लिए मोलतोल की ताकत घट गई है, जिससे वास्तविक मजदूरी वृद्धि बहुत कम बनी हुई है. रोजगार से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं की घोषणा इस चुनौती को स्वीकार करने जैसी है.
हालांकि, सरकार ने समझदारी से अपने दायरे का विस्तार करके खुद ही रोजगार पैदा करने जैसे शॉर्टकट से परहेज किया. इन योजनाओं के लिए आवंटित अतिरिक्त दस हजार करोड़ रुपए से कुछ लाख रोजगारों को औपचारिक बनाने में मदद मिलेगी. लेकिन मध्यम अवधि में पर्याप्त बदलाव लाने के लिए सरकार को निजी क्षेत्र के निवेश की खातिर सही माहौल बनाने और उद्यमियों के फलने-फूलने के लिए कानून-कायदों का बोझ कम करने की जरूरत है. रियल एस्टेट बाजार के पुनरुद्धार के साथ निर्माण में तेजी से बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने में भी मदद मिल सकती है.
सबनवीस: निजी क्षेत्र में रोजगार सृजन को सीधे बढ़ावा दिया जा रहा है. इसकी एक मिसाल तो यह है कि पहली बार नौकरी में लगे कर्मचारियों को दिया जा रहा प्रोत्साहन, कर्मचारी और नियोक्ता दोनों के लिए लाभकारी है. एमएसएमई को ज्यादा निवेश करने के लिए दी जा रही मदद समय के साथ ज्यादा रोजगार पैदा करेगी. ऊर्जा क्षेत्र, आवास, चार राज्यों को शामिल करते हुए समावेशी विकास में कुछ उद्योगों को दिए गए विशेष प्रोत्साहन से भी रोजगार पैदा होंगे. इसलिए प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरह से प्रोत्साहन दिया जा रहा है.
नायर: बजट की खास बात रोजगार और कौशल पर ध्यान देना है. वित्त मंत्री ने रोजगार से जुड़े प्रोत्साहनों के लिए 2 लाख करोड़ रुपए के बहु-वर्षीय पैकेज की घोषणा की है. इसमें कई योजनाएं शामिल हैं. इनमें औपचारिक क्षेत्र में पहली बार काम पर लगे कर्मचारियों को वेतन सब्सिडी, उत्पादन क्षेत्र में नियोक्ताओं और कर्मचारियों के ईपीएफओ भुगतान को कवर करने वाले प्रोत्साहन, नियोक्ताओं के ईपीएफओ अंशदान की प्रतिपूर्ति, जो उनके कर्मचारियों की संख्या बढ़ाती है, और कॉर्पोरेट में इंटर्नशिप की सुविधा के लिए भत्ते शामिल हैं. इन पर अमल से मध्यम अवधि में रोजगार के अवसर खुल सकते हैं.
इसके अलावा, बड़े पैमाने पर पूंजीगत खर्च के आवंटन के बीच इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण पर निरंतर जोर भी रोजगार सृजन के लिए अच्छा है क्योंकि निर्माण क्षेत्र देश में दूसरा सबसे बड़ा रोजगार (कृषि के बाद) देने वाला है. इसके अलावा, वित्त वर्ष 2025 के बजट में पीएम आवास योजना के लिए आवंटन में तेज बढ़ोतरी वित्त वर्ष 2024 के संशोधित बजट में 54,000 करोड़ रुपए से बढ़कर 85,000 करोड़ रुपए हो गई है. इससे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलेगा.
प्र. बजट में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा जैसे सामाजिक क्षेत्र के पहलुओं पर जोर दिए जाने का आकलन आप किस तरह से करते हैं?
गोयल: इन क्षेत्रों में कमजोर प्रदर्शन का एक बड़ा कारण राज्यों और केंद्र की जिम्मेदारियों को लेकर एक-दूसरे पर ठेलाठाली है. बजट के उपायों से अगर केंद्र/राज्यों के बीच इन क्षेत्रों में बेहतर तालमेल होता है तो इनमें भी वास्तविक सुधार संभव है. इनमें सुधार के लिए वित्त से कहीं ज्यादा रुकावट प्रशासन के मसले हैं. तेजी से होते शहरीकरण के कारण कई ग्रामीण क्षेत्र वास्तव में शहरी बन गए हैं और उनमें पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त धन और अमले के साथ ठीक से काम करने वाले शहरी निकायों की जरूरत है.
रानाडे: देश को शिक्षा और कौशल पर जीडीपी का 6 फीसद खर्च करने की जरूरत है. हम अभी तक इसके आधे पर भी नहीं हैं. बेशक, इसमें से ज्यादातर खर्च निजी क्षेत्र के संसाधनों से आएगा, सिर्फ सरकार से नहीं. पिछले कुछ साल की तरह जैसे सरकार इन्फ्रास्ट्रक्चर की मद में पूंजीगत खर्च को बढ़ावा दे रही है, अब समय आ गया है कि मानव संसाधन पर पूंजीगत खर्च बढ़ाया जाए.
इसमें शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों शामिल हैं. देश में औसत आयु करीब 28 वर्ष है. इसका मतलब है कि शिक्षा स्वास्थ्य से ज्यादा महत्वपूर्ण है (हालांकि दोनों के लिए ऊंचे खर्च की जरूरत है). हमें इस तथ्य को भी देखना होगा कि बच्चों के बीच कुपोषण (भले ही भूख नहीं) अभी बहुत ज्यादा है. इसके लिए स्कूलों के दोपहर भोजन में बायो-फोर्टिफिकेशन पर जोर देने और सिर्फ कैलोरी नहीं, बल्कि पोषण जरूरतों पर ध्यान देने की आवश्यकता है. बजट में सिर्फ इन्फ्रास्ट्रक्चर खर्च ही नहीं, बल्कि मानव पूंजी पर खर्च के लिए संकेत देकर अच्छा किया गया है.

जोशी: बजट के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की सूची में इन क्षेत्रों को महत्व दिया गया है. वित्त वर्ष 2025 के लिए शिक्षा, कौशल और रोजगार के लिए 1.48 लाख करोड़ रुपए रखे गए हैं. स्वास्थ्य और शिक्षा काफी हद तक राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं.
मिश्र: शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा प्राथमिक रूप से राज्यों के विषय हैं. हालांकि इन क्षेत्रों में केंद्र भी ठीक-ठाक राशि खर्च करता है. बजट भाषण में अगले 5 वर्षों के लिए सरकार की प्राथमिकताओं के रूप में कौशल और समावेशी वृद्धि को महत्व दिया गया है.
सबनवीस: ये समवर्ती सूची के विषय हैं और इनको लेकर राज्यों को भी अपने प्रयास करने की जरूरत है. केंद्र के स्तर पर राजकोषीय संतुलन के बजटीय लक्ष्यों के भीतर पर्याप्त प्रयास किए गए हैं. एजुकेशन लोन पर ब्याज राहत प्रत्यक्ष उपाय है. कुछ दवाओं और उपकरणों पर सीमा शुल्क में रियायत स्वास्थ्य सेवा के लिए सकारात्मक है. यह दोनों क्षेत्रों/ मंत्रालयों की विभिन्न योजनाओं के लिए कुल करीब 2.11 लाख करोड़ रुपए के आवंटन के अलावा है.
नायर: देश में कमजोर स्वास्थ्य सेवा सुविधाओं को देखते हुए इस क्षेत्र के लिए बढ़ा हुआ बजट आवंटन स्वागतयोग्य कदम है. तीन और कैंसर दवाओं के लिए सीमा शुल्क में छूट से इससे जुड़ा इलाज ज्यादा किफायती होगा जिससे मरीजों और स्वास्थ्य सेवा ढांचे को फायदा मिलेगा. इसके अलावा, चिकित्सा उपकरणों और इंप्लांट में इस्तेमाल कच्चे माल पर सीमा शुल्क/कटौती छूट से निर्माताओं की लागत घटेगी.
फार्मास्युटिकल क्षेत्र के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना के मद में अधिक आवंटन से संकेत मिलता है कि इस योजना के तहत दवा उत्पादन में उम्मीद के मुताबिक बढ़ोतरी होगी. इससे इनके आयात पर कुछ हद तक निर्भरता घटाने में मदद मिलेगी. हालांकि इन उपायों के अलावा भी बहुत कुछ करने की जरूरत बनी हुई है.
वित्त वर्ष 25 के बजट अनुमान में आयुष्मान भारत योजना के लिए 7.4 फीसद की बढ़ोतरी से राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण के प्रति सरकार के जोर देने की पुष्टि होती है. इससे स्वास्थ्य देखभाल से जुड़ी कंपनियों के लिए मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हो सकती है. ये सांकेतिक कदम दरअसल उचित अमल के साथ ही कारगर हो सकते हैं. बजट में प्राथमिकता से बेशक लगता है कि इन उपयों के अमल पर जोर रहेगा.
ब्याज राहत के जरिए घरेलू उच्च शिक्षा को प्रोत्साहित करने के प्रस्ताव और औपचारिक क्षेत्र में नौकरियों के लिए प्रोत्साहन से अर्थव्यवस्था के औपचारिक क्षेत्रों में वृद्धि को बढ़ावा मिल सकता है.
प्र. उत्पादन और एमएसएमई क्षेत्रों को बढ़ावा देने में क्या यह बजट मददगार होगा?
गोयल: महामारी के दौरान केंद्रीय ऋण वारंटी ने अच्छा काम किया. चूंकि कई एमएसएमई की हालत दुरुस्त हो गई है, इसलिए असल में फंड की जरूरत कम थी. इससे यह कारगर योजना बन गई. यह अच्छा है कि उसे दोबारा लाया जा रहा है. बजट की दूसरी विशेषता एक किस्म की निरंतरता है. कारोबारी सहूलत, कर और नियम-कायदों की जटिलता को कम करने, लॉजिस्टिक्स में सुधार पर ध्यान देने से उत्पादन को बढ़ावा मिला है और यह जारी रहेगा. निजी क्षेत्र के लिए नीतियों में स्थिरता महत्वपूर्ण है.
रानाडे: देश की जीडीपी में उत्पादन क्षेत्र की हिस्सेदारी मौजूदा 17 फीसद से बढ़ाकर कम से कम 22 या 23 फीसद करने की जरूरत है. इसमें मुख्य रूप से छोटे व्यवसायों और उद्योगों का योगदान होगा. बजट में एमएसएमई के कामकाज को बढ़ाने के लिए कई उपाय किए गए हैं—जमानत-मुक्त कर्ज, क्रेडिट गारंटी और ई-कॉमर्स के जरिए निर्यात बाजारों तक पहुंच वगैरह. भारत वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में सक्रिय रूप से भाग लेने की दिशा में सतर्कता के साथ आगे बढ़ रहा है, यहां तक कि चाहे वह रास्ता चीन से ही होकर क्यों न जाता हो. यह नीति अतीत की तरह केवल 'मुनाफा बढ़ाने’ पर आधारित नहीं है, बल्कि 'नौकरी सृजन’ और वैश्विक बाजारों तक पहुंच पर भी आधारित है.
जोशी: घोषित किए गए प्रमुख उपायों में विदेशी कंपनियों पर कॉर्पोरेट कर की दर को 40 फीसद से घटाकर 35 फीसद करना, एंजल टैक्स को समाप्त करना और घरेलू उत्पादन में लाभ को बढ़ावा देने के लिए कुछ बुनियादी सीमा शुल्कों में वृद्धि करना शामिल है. शुल्क फेरबदल के जरिए महत्वपूर्ण खनिजों और कच्चे माल के लिए आयात लागत को युक्तिसंगत बनाने से लागत कम होगी और उभरते क्षेत्रों में घरेलू मूल्य संवर्धन को बढ़ावा मिलेगा.
इनमें इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी, भंडारण प्रणाली, फोटोवोल्टिक मॉड्यूल उत्पादन और इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल हैं, जहां महत्वपूर्ण खनिज मूल्य शृंखला का अहम हिस्सा हैं. वित्त वर्ष 2025 के बजट अनुमान में पीएलआइ योजनाओं में आवंटन 74 फीसद बढ़ा है, जो क्रमिक सफलता को दर्शाता है.
बजट में एमएसएमई के लिए कर्ज को जमानत मुक्त करने से उनकी समस्याएं घटेंगी और बढ़ावा मिलेगा. एमएसएमई के लिए सरकारी ऋण गारंटी कोष भी है.

मिश्र: मध्यम अवधि में पूंजी की लागत घटाने का लक्ष्य रखकर और कराधान को व्यवस्थित तथा सरल बनाने का वादा करके सरकार उत्पादन क्षेत्र के लिए माहौल सुविधाजनक बना रही है. रोजगार के लिए प्रोत्साहन और ढुलाई खर्च कम करने में मददगार इन्फ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देने से भी उत्पादन क्षेत्र को मदद मिलनी चाहिए. मुद्रा ऋण की सीमा बढ़ाकर और एक नया क्रेडिट मूल्यांकन मॉडल विकसित करने से एमएसएमई के लिए ऋण तक पहुंच में मदद मिल सकती है. अन्य प्रत्यक्ष उपायों की घोषणा भी की गई है जैसे, खाद्य प्रसंस्करण में एमएसएमई के लिए इरेडिएशन सेंटर.
सबनवीस: एमएसएमई को प्रत्यक्ष प्रोत्साहन दिए गए हैं जो इस क्षेत्र की मदद करेंगे. मैन्युफैक्चरिंग को ही लें. पूंजीगत खर्च और आवास को दिए गए प्रोत्साहन से स्टील, सीमेंट, रसायन, मशीनरी वगैरह को लाभ होगा.
नायर: बजट में एमएसएमई क्षेत्र में क्रेडिट फ्लो को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव शामिल हैं. इसमें मशीनरी और उपकरणों की खरीद के लिए ऋण की सुविधा के लिए एक नई ऋण गारंटी योजना, एसएमए (विशेष उल्लेख खाता) चरण में एमएसएमई को ऋण की सुविधा के लिए गारंटी का प्रावधान शामिल है, ताकि उन्हें एनपीए (गैर-निष्पादित परिसंपत्ति चरण में जाने से रोका जा सके, उधारकर्ताओं की एक श्रेणी के लिए मुद्रा ऋण की सीमा को दोगुना करना और सभी प्रमुख एमएसएमई समूहों में सिडबी शाखाओं का विस्तार करना शामिल है.
एमएसएमई क्षेत्र के विकास के लिए ऋण की उपलब्धता की कमी प्रमुख बाधाओं में से एक रही है. इसे देखते हुए ये उपाय क्रेडिट फ्लो तय करने और एमएसएमई के लिए धन की लागत को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. यह विशेष रूप से उत्पादन और निर्यात के साथ-साथ रोजगार सृजन में मदद करेगा. सरकार ने वित्त मंत्रालय के तहत 'नई योजनाओं’ के लिए 62,600 करोड़ रुपए का बजट रखा है. हमारा मानना है कि इस राशि का एक हिस्सा एमएसएमई क्षेत्र में क्रेडिट फ्लो को बढ़ावा देने के उपायों के कारण होने की संभावना है.
प्र. क्या आपको लगता है कि बजट से खपत और निवेश को बढ़ावा मिलेगा?
गोयल: बजट से पहले हमने डिमांड बढ़ाने वाले स्टिम्युलस की मांगों का तेज शोर सुना, जिसे यह कहकर सही ठहराया गया कि इससे खपत और निवेश में बढ़ोतरी के जरिए अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा. ऐसी मांगें महामारी के दौरान भी की गईं. मगर यह रास्ता अपनाने वाले देशों ने आपूर्ति शृंखला की अड़चनों आदि के कारण महंगाई को आसमान छूते देखा. भारत के आपूर्ति पक्ष के उपायों में संतुलन के साथ सार्वजनिक खर्च के स्तर के मुकाबले चीजों के बेहतर मेल से बने स्टिम्युलस ने आर्थिक वृद्धि की मजबूत बहाली बनाए रखी. अच्छा है कि बजट में इन मांगों से परहेज किया गया और लंबे वक्त की रणनीति बनाए रखी गई, जिसके नतीजे भी दिख रहे हैं.
रानाडे: यह सच है कि ऊंची वृद्धि, मध्यम खुदरा महंगाई, पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार और उछाल भरते शेयर बाजार जैसी सुंदर तस्वीर के बावजूद अर्थव्यवस्था के भीतर की सूक्ष्म बारीकियां चिंताजनक हैं. ग्रामीण मजदूरी काफी समय से बढ़ी नहीं है. उपभोग खर्च जीडीपी के मुकाबले धीमी रफ्तार से बढ़ रहा है. निजी निवेश खर्च में ठहराव है, वह भी उस वक्त जब सार्वजनिक और खासकर बुनियादी ढांचे पर खर्च काफी मजबूत था.
इसलिए निजी खपत और निवेश बढ़ाने के उपाय करना जरूरी था. ग्रामीण बाजारों में खपत पर ध्यान देने की जरूरत है. छोटे वक्त के उपायों (जैसे उपभोग वाउचर या निवेश रियायतें) में कुछ नहीं रखा है. वैसे भी छोटे वक्त के उपाय कारगर नहीं होंगे. लोगों को अधिक हुनरमंद बनाने और एमएसएमई की वृद्धि सुनिश्चित करने के साथ जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था ज्यादा ऊंचे स्थिर दायरे में जाती है, अंतत: हमें खपत और निजी निवेश बढ़ता दिखाई देना चाहिए.
जोशी: सतत विकास इस बजट के मूल में है. लंबे वक्त की आर्थिक वृद्धि के लक्ष्य के साथ सरकार ने कैपेक्स (पूंजीगत खर्च) पर जोर बनाए रखा है. यह खपत को भी हल्का-सा सहारा देता है. खपत में वृद्धि जहां वित्त वर्ष 2024 में पिछड़ रही थी, इस साल उसमें बेहतर कृषि आमदनियों, रोजगार पैदा करने वाली योजनाओं के लिए सरकारी धन में बढ़ोतरी (खासकर निर्माण क्षेत्र में) और वेतनभोगी वर्ग का करों का बोझ हल्का होने से उनकी खर्च योग्य आमदनी में थोड़ी बढ़ोतरी के बल पर तेजी आने की उम्मीद है.
निजी निवेश का आधार अब भी बड़ा नहीं है और मोटे तौर पर सरकार और घर-परिवारों से संचालित है. बावजूद इसके कि सरकार की राजकोषीय स्थिति और ज्यादा मजबूत हुई है (राजकोषीय घाटे और जीडीपी का अनुपात इस वित्त वर्ष में 4.9 फीसद के बजट अनुमान से घटकर वित्त वर्ष 2026 में 4.5 फीसद से कम), बुनियादी ढांचे में धन लगाने के जरिए निवेश चक्र को सहारा देने की उसकी क्षमता में कमी आएगी. निजी क्षेत्र धीरे-धीरे सरकार से कमान संभाल रहा है.
मिश्र: राजकोषीय घाटा कम रहने से निजी क्षेत्र के आगे आने की वित्तीय गुंजाइश पैदा होती है. अगले साल तक जब सरकार का इरादा राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.5 फीसद से नीचे लाने का है, बॉन्ड की मांग उनकी आपूर्ति से ज्यादा होने लगेगी. इससे सरकारी बॉन्ड पर प्राप्ति या मुनाफा और कम हो जाएगा और इस तरह निजी फर्मों के लिए कर्ज की उपलब्धता को सहारा मिलेगा, जो निवेश में बढ़ोतरी की जरूरी शर्त है. स्टैंडर्ड डिडक्शन में बढ़ोतरी और आयकर स्लैब बढ़ने के कारण निहित करों में कटौती का सीधा प्रभाव मददगार भले हो, लेकिन शायद पर्याप्त बड़ा भी न हो. अगर रोजगार से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं से लक्ष्य के अनुरूप संख्या में नौकरियां पैदा होती हैं, तो खपत को कुछ बढ़ावा मिल सकता है.

सबनवीस: हां. रोजगार सृजन की जो बात कही गई है और साथ ही ज्यादातर करदाताओं की तरफ से कम करों के भुगतान की बदौलत आमदनी और इसलिए खर्च करने की शक्ति बढ़ेगी. चूंकि जीएसटी इसके दायरे से बाहर है, इसलिए कीमतों को कम करने के लिए कुछ नहीं किया जा सका. धनराशि बहुत ज्यादा भले न हो, पर बजट ज्यादा से ज्यादा इतना ही कर सकता था, यानी खर्च योग्य आमदनी बढ़ाने के मामले में. जहां तक निवेश की बात है, हम इसमें बुनियादी ढांचे से जुड़े क्षेत्रों में तेजी आते देख सकते हैं.
नायर: बजट में व्यक्तिगत आयकर में मामूली हेरफेर से मिलने वाली कर राहत के खपत के रास्ते जाने की संभावना है. इसी तरह ग्रामीण-केंद्रित योजनाओं में मामूली बढ़ोतरी से ग्रामीण सेंटीमेंट मजबूत होगा, हालांकि मांग में टिकाऊ बढ़ोतरी की संभावना तभी है जब खरीफ फसल की नकदी कृषि क्षेत्र में आएगी.
चांदी और सोने पर सीमा शुल्क घटने से मांग में बढ़ोतरी तथा तस्करी और अवैध आयात पर लगाम लगने से श्रम सघन उद्योगों को सहारा मिलेगा. निवेश में एमएसएमई की तरफ कर्ज का प्रवाह बढ़ाने के उपाय मशीनरी खरीद को प्रोत्साहित करेंगे. इसके अलावा वित्त वर्ष 2024 के मुकाबले सरकार के पूंजीगत खर्च के लक्ष्य में 17.1 फीसद की बढ़ोतरी हालांकि बीते तीन सालों में देखी गई 20 फीसद से ज्यादा की बढ़ोतरी से कम है, लेकिन यह निवेश की मांग बढ़ाने में मददगार रहेगी.
प्र. कोई ऐसा प्रमुख क्षेत्र है जिस पर आप अब भी चाहते हों कि बजट में ध्यान दिया गया होता?
गोयल: महामारी के बाद के बजटों में हमेशा किए गए वादों से ज्यादा खर्च किया गया. मगर पिछले साल खर्च उससे थोड़ा कम था जितने की योजना बनाई गई. हालांकि पूंजीगत खर्च का हिस्सा 20 फीसद से 30 फीसद तक लगातार बढ़ता गया है, पर इसका हिस्सा भी अपेक्षित योजना से कम था. साथ ही सरकार के नकद शेषों का भी काफी कम इस्तेमाल हुआ. खर्च में यह कमी कुछ तो लगातार चुनावों की वजह से हुई हो सकती है. मुझे अच्छा लगता है बजट में परियोजनाओं की तैयारी और खर्च के समय और गुणवता पर कुछ ध्यान दिया जाता, ताकि अगले साल फिर उम्मीद से ज्यादा परियोजनाएं पूरी होते देखते. फिलहाल ढेरों परियोजनाएं लंबित चल रही हैं. इसलिए इस पर विशेष ध्यान देने की दरकार है.
रानाडे: बेशक किसी भी बजट भाषण में 'गंवाए गए मौके’ बताना हमेशा आसान होता है. लेकिन मुझे नहीं लगता है कि विश्लेषण का यह रवैया सही है, क्योंकि कोई भी बजट शायद सभी संभव मुद्दों को संबोधित नहीं कर सकता या सभी मामलों पर विचार नहीं कर सकता. वित्त मंत्री ने आर्थिक रणनीति या एक किस्म से अगली पीढ़ी के सुधारों के नए व्यापक ढांचे की तरफ इशारा करके अच्छा किया है. उन्होंने यह भी कहा कि प्रत्यक्ष कर व्यवस्था में सम्यक और युक्तिपूर्ण बदलाव किया जाएगा.
मैं कुल राजस्व में प्रत्यक्ष करों का हिस्सा बढ़ते देखना चाहूंगा. टैक्स स्लैब की सीमा बढ़ाई जानी चाहिए, क्योंकि हम कुछेक लाख रुपए की छोटी-सी सीमा के भीतर शून्य कर से पूरे 30 फीसद के ब्रैकेट तक चले जाते हैं. यही नहीं, इसके बजाय टैक्स स्लैब निचले छोर पर कम होना चाहिए और ऊंची दरें, फर्ज कीजिए, 1 करोड़ रुपए या उससे ज्यादा की ऊंची आमदनी पर ही शुरू होनी चाहिए. कर जाल का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए, तभी कुछ आगे किया जा सकता है. यह तो माना ही जाता है कि भारत दूसरे देशों के मुकाबले अलग है, जहां हर 100 मतदाताओं पर महज 7 करदाता हैं. इसे बदलने की जरूरत है.

जोशी: बजट से भूमि, श्रम और कृषि के सुधारों का संकेत मिलना चाहिए था. सुधारों की कोशिशों को प्रमुखता देना जरूरी है क्योंकि इनके नतीजे देरी से मिलते हैं. इस मामले में कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिखते.
मिश्र: बजट में संकेत दिया गया है कि व्यक्तिगत आयकर और सीमा शुल्क की सरल व्यवस्था के ब्योरे छह महीने में उपलब्ध कराए जाएंगे. इसका मतलब है फरवरी 2025 में अगले बजट तक यह हो पाएगा. इसी तरह शहरी विकास को तेज करने की सरकार की योजनाएं शायद तब ज्यादा स्पष्ट हों जब 16वां वित्त आयोग शहरों के राजस्व के प्रत्यक्ष हिस्से को अंतिम रूप दे दे.
सबनवीस: बचत की बात की जा सकती थी. लेकिन सरकार ने यह जतलाया है कि वह लोगों के कटौतियों से रहित नई कर व्यवस्था अपनाने से खुश है. 80सी के मद में बढ़ोतरी से बचत बढ़ाने में मदद मिलती.
नायर: पारंपरिक तौर पर बजट का आशय मूलत: वह लेखा विवरण है जो उस वित्त वर्ष में सरकार की तरफ से अनुमानित राजस्व और खर्च का ब्योरा पेश करता है. मगर भारत में बजट को सरकार के प्रमुख नीतिगत बयान के तौर पर देखा जाता है. इस बजट ने कई क्षेत्रों की नीतिगत दिशा स्पष्ट की है. अब उन्हें लागू करना अहम होगा.

