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क्या है पोस्ट-फार्मगेट इकोसिस्टम जिसे मोदी सरकार कृषि में एमएसपी से ज्यादा तवज्जो दे रही है?

बजट पेश होने के अगले ही दिन यानी 24 जुलाई को पंजाब और अन्य राज्यों के किसान यूनियन नेताओं ने नेता विपक्ष राहुल गांधी से संसद में उनके दफ्तर में मुलाकात की

 डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर
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अपडेटेड 7 अगस्त , 2024

उपज के अच्छे दाम मिलने की बात पक्की करने के लिए एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर कानूनी ढांचे की मांग कर रहे उत्तर भारत के किसान संगठन भले ही अगले चरण के विरोध प्रदर्शन के लिए कमर कस रहे हो लेकिन केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इससे पूरी तरह बेफिक्र नजर आईं. वित्त वर्ष 2024-25 के लिए कृषि बजट आवंटन से साफ है कि भाजपा-नीत सरकार 2021-22 में अपनाए रास्ते को बदलने के मूड में नहीं है, जिसमें पोस्ट-फार्मगेट इकोसिस्टम (फसल बाजार में आने के बाद के परिदृश्य) मजबूत करना और बाजार की कीमतों के साथ ज्यादा छेड़छाड़ न करना शामिल है.

पिछले पांच वर्षों में कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में करीब 4.2 फीसद की वार्षिक औसत वृद्धि दर्ज की गई. यह पिछले चार दशकों में किसी भी अवधि के दौरान सबसे कम है. देश के किसान जीडीपी में 18.2 फीसद योगदान देते हैं और करीब 42 फीसद आबादी कृषि पर निर्भर है. इसके बावजूद कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के प्रति केंद्र की तरफ से सौतेला व्यवहार किए जाने की शिकायत हमेशा रही है (अब यह शिकायत और बढ़ जाएगी क्योंकि 2023-24 के अंतरिम अनुमान दर्शाते हैं कि कृषि क्षेत्र ने 1.4 फीसद की मामूली दर से वृद्धि की, जो 2022-23 के 4.7 फीसद की तुलना में बेहद कम है). यही किसान यूनियनों के असंतोष का सबसे बड़ा कारण है और सरकारी खर्च के माध्यम से इसका कोई हल निकालना बजट निर्माताओं के लिए किसी जटिल पहेली से कम नहीं.

बजट पेश होने के अगले ही दिन यानी 24 जुलाई को पंजाब और अन्य राज्यों के किसान यूनियन नेताओं ने नेता विपक्ष राहुल गांधी से संसद में उनके दफ्तर में मुलाकात की. उद्देश्य यही था कि सत्ता पक्ष पर दबाव बनाया जा सके. हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर भारत के कई राज्यों के अलावा महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र में भी किसानों की नाराजगी का खामियाजा भुगतना पड़ा है.

पिछले एक दशक के दौरान भाजपा ने अपने शहरी वर्चस्व को कायम रखने के साथ खुद को मुख्यत: उत्तर भारत के गांवों की नई पार्टी में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. ग्रामीण भारत में नजर आई एक अलग ही तस्वीर ने उसे पुनर्विचार को प्रेरित किया है. इस वर्ष के अंत में झारखंड, महाराष्ट्र, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव होने हैं और पार्टी रणनीतिकारों को उम्मीद थी कि सीतारमण उनका बोझ थोड़ा कम करेंगी.

सूत्रों के मुताबिक, उनका मानना है कि गरीब किसानों के लिए आय समर्थन योजना (पीएम-किसान सम्मान निधि योजना) की राशि न बढ़ाकर उन्होंने यह मौका गंवा दिया. यह अभी भी 6,000 रुपए सालाना है, जिसे 2018 में निर्धारित किया गया था. उर्वरक सब्सिडी में कटौती भी किसानों के लिए एक बड़ा मुद्दा हो सकता है, जिसे घटाकर 1.64 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया है; 2022-23 में वास्तविक व्यय 2.5 लाख करोड़ रुपए था. (केंद्र का दावा है कि कच्चे तेल की कीमतों में नरमी के मद्देनजर इसे तर्कसंगत बनाया गया है.)

मोदी 3.0 में कृषि क्षेत्र तीन बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है—ज्यादा उपज और जलवायु अनुकूल फसलों के लिए कृषि विविधीकरण के प्रयासों में नाकामी; किसानों की आय जस की तस बनी रहना; और पर्याप्त आपूर्ति शृंखला का अभाव. यही नहीं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गैर-कृषि रोजगारों की भी खासी कमी है. इन समस्याओं को सुलझाने के लिए जादू की कोई छड़ी नहीं है. इस सबके बीच, इस साल के आर्थिक सर्वेक्षण में यह बात उभरकर आई है कि जनसांख्यिकीय बदलाव को देखते हुए भारत को अगले सात वर्षों में गैर-कृषि क्षेत्र में कम से कम 78 लाख रोजगार की जरूरत होगी.

इसके साथ ही केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के पास एक और जिम्मेदारी भी है. अपने बजट प्रावधानों में सीतारमण ने कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के लिए 1.52 लाख करोड़ रुपए अलग रखे हैं, जो पिछले वर्ष की तुलना में 11,318 करोड़ रुपए ज्यादा है. यह ग्रामीण क्षेत्र के खर्च में वृद्धि के लिए अलग रखा गया है, जो 10 फीसद बढ़कर 2.66 लाख करोड़ रुपए हो गया है. इसमें से ग्रामीण विकास मंत्रालय (जिसका नेतृत्व भी चौहान ही करते हैं) को 1.77 लाख करोड़ रुपए मिलेंगे, जबकि पिछले साल मंत्रालय ने 1.71 लाख करोड़ रुपए खर्च किए थे.

इस वर्ष मंत्रालय को दलहन, तिलहन, प्याज और आलू का बफर स्टॉक बनाए रखने के लिए 10,000 करोड़ रुपए का मूल्य स्थिरीकरण कोष मिला है. यह योजना मंत्रालय और नैफेड (भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ लिमिटेड) जैसी केंद्रीय एजेंसियों को राज्यों के साथ मिलकर ब्याज मुक्त ऋण देने और इन कमोडिटी की खरीद और वितरण में किसानों की कार्यशील पूंजी में फंडिंग करने की अनुमति देती है.

इसके अलावा, सीतारमण ने किसानों को एमएसपी लाभकारी मूल्य दिलाने को प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-आशा) के लिए आवंटन तीन गुना बढ़ाकर इस साल 6,437 करोड़ रुपए कर दिया है. इस धनराशि से केंद्रीय एजेंसियों को पात्र फसलों में किसानों के विपणन योग्य अतिरिक्त फसल का 25 फीसद तक खरीदने की स्वतंत्रता है. यह देश के बफर स्टॉक के लिए होने वाली अनाज की खरीद से इतर है.

चौहान को राज्यों के साथ मिलकर बड़े शहरों के पास बड़े पैमाने पर सब्जियों के उत्पादन केंद्र स्थापित करने के लिए पैसा मिला है. लेकिन इसके लिए उन्हें किसान-उत्पादक संगठनों (एफपीओ), सहकारी समितियों और स्टार्ट-अप्स के बेहतर नेटवर्क का उपयोग करना होगा ताकि सब्जियों के संग्रह, भंडारण और उन्हें बेचने की प्रक्रिया को मजबूत किया जा सके.

अतीत में अक्षम आपूर्ति शृंखला के कारण सब्जी किसानों को फसल कटाई के बाद काफी नुक्सान झेलना पड़ता था और उपभोक्ताओं को महंगी सब्जियां खरीदनी पड़ती थीं. सीमित बाजार पहुंच और बिचौलियों की अच्छी-खासी संख्या के चलते किसानों को आम तौर पर अपनी उपज के अंतिम बाजार मूल्य का एक छोटा हिस्सा ही मिल पाता है.

उद्देश्य यह है कि इस व्यवस्था को बदला जा सके ताकि किसानों को ज्यादा मुनाफा मिले और उन्हें अपनी उपज बेचने के लिए अच्छा बाजार मिल सके. मोदी 2.0 ने 2020 में तीन नए कृषि कानून बनाकर इसी लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश की थी लेकिन किसान यूनियनों की नाराजगी के कारण कानून वापस लेने पड़े. तब कॉर्पोरेट/निजी क्षेत्र का पैसा कृषि क्षेत्र की तरफ लाने की कोशिश थी. लेकिन अब ध्यान सहकारी मॉडल को मजबूत करने पर है जिससे अपेक्षित परिणाम हासिल हो सकें और किसानों को भी फायदा मिल सके.

बजट में कुछ महत्वाकांक्षी योजनाओं के लिए भी धन आवंटित किया गया है, जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पसंदीदा योजना 'ड्रोन दीदी’ के लिए 500 करोड़ रुपए रखे गए हैं. इससे अगले तीन वर्षों में एक करोड़ 'ड्रोन दीदी’ तैयार की जाएंगी. इन ग्रामीण महिलाओं को यूएवी उपलब्ध होंगे और साथ ही वे कृषि उद्देश्यों के लिए ड्रोन के इस्तेमाल में पारंगत होंगी.

इसके अलावा, अगले दो वर्षों में एक करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए तैयार किया जाएगा. इस पर अमित शाह के नेतृत्व वाला सहकारिता मंत्रालय दो बड़ी घोषणाएं कर चुका है—सहकारी क्षेत्र का विकास करने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय सहकारिता नीति बनाई जाएगी. मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि इस नीति से ग्रामीण अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ेगी और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे. इसके अलावा, सहकारी चीनी मिलों (सीएसएम) की मजबूती के लिए राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) को 500 करोड़ रुपए की सहायता दी जाएगी.

दूसरी योजना के पीछे एक राजनैतिक पहलू भी है क्योंकि चीनी मिलें आगामी चुनाव वाले राज्यों महाराष्ट्र और हरियाणा (मुख्यत: पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लगे इलाकों) में किसान आंदोलन का एक बड़ा कारण हैं. सहकारिता और कृषि मंत्रालयों ने राज्यों के साथ मिलकर पिछले पांच वर्षों के दौरान कृषि सहकारी समितियों और एफपीओ को मजबूत करने के लिए कड़ी मेहनत की है, जिसमें डिजिटलीकरण भी शामिल है.

सभी पीएसीएस (प्राथमिक कृषि ऋण समिति) के साथ-साथ कृषि और ग्रामीण विकास बैंक डिजिटल किए जा रहे हैं और उन्हें नाबार्ड (राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक) से जोड़ा जा रहा है ताकि रियल टाइम आंकड़े उपलब्ध हों. यह किसानों की मदद करने के लिए औपचारिक ऋण संस्थानों को आगे बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है. वित्त मंत्री ने पैदावार बढ़ाने के लिए कृषि अनुसंधान ढांचे की व्यापक समीक्षा का वादा भी किया है. योजना के तहत 32 तरह की कृषि और बागवानी फसलों की 109 ऐसी किस्में जारी की गई हैं जो अधिक उपज देती हैं और जलवायु अनुरूप हैं. बजट में किसान समुदाय के लिए कई नए वादे हैं लेकिन ये क्या सच में पूरे होंगे और क्या किसान इन योजनाओं को अपनाएंगे, यह एक बड़ा सवाल है. 

खास बातें

●बफर स्टॉक बनाए रखने और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण के लिए 10,000 करोड़ रुपए का मूल्य स्थिरीकरण कोष
●देश की सारी कृषि भूमि को कवर करने वाले डिजिटल सार्वजनिक ढांचे (डीपीआइ). 2024 में 400 जिलों में खरीफ फसल सर्वेक्षण
●उर्वरक (1.64 लाख करोड़ रुपए) और खाद्य (अब 2.13 लाख करोड़ रुपए) सब्सिडी में बड़ी कटौती
●एमएसपी मुआवजे के लिए 2023-24 में पीएम-आशा के तहत 6,437 करोड़ रुपए आवंटित
●कृषि शोध और विकास के लिए 9,941 करोड़ रुपए निर्धारित. भारत अभी अनुसंधान पर कृषि जीडीपी का 0.4 फीसद से भी कम खर्च करता है. यह चीन, ब्राजील या इज्राइल की तुलना में बेहद कम है
●एक करोड़ किसानों को अगले दो वर्षों में प्राकृतिक खेती के गुर सिखाए जाएंगे

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