
लवलीना बोरगोहैन, 26 वर्ष, मुक्केबाजी 75 किलोग्राम वर्ग
इस बार के ओलंपिक खेलों की स्ट्रीमिंग करने जा रहे जियो सिनेमा की शॉर्ट डॉक्युमेंट्री सीरीज 'द ड्रीमर्स' में लवलीना बोरगोहैन कहती हैं, "अगर सहेंगे तभी तो चैंपियन बन पाएंगे." यह काम का उनका तरीका है जो शायद उन्हें अपने चाय बागान श्रमिक पिता से विरासत में मिला है.
शुरू में मार्शल आर्ट में प्रशिक्षित बोरगोहैन अरसे तक कांस्य पदक विजेता रहीं. तोक्यो ओलंपिक के बाद अपने वजन वर्ग को उन्होंने 69 से 75 किलोग्राम में बदलने का फैसला लिया. जल्द ही बेहतर नतीजे मिलने लगे.
इसकी शुरुआत 2022 में एशियाई मुक्केबाजी चैंपियनशिप में स्वर्ण और विश्व चैंपियनशिप खिताब तथा एशियाई खेलों में रजत पदक जीतने के साथ हुई. ओलंपिक में वरीयता पाने वाली एकमात्र भारतीय मुक्केबाज होने का मतलब है कि बोरगोहैन को एक और कांस्य पदक पक्का करने को बस दो जीत की दरकार है.
हालांकि तीन बार की इस विश्व चैंपियनशिप पदक विजेता ने पेरिस जाने से पहले बातचीत में जताया कि अबकी वे तमगे का रंग बदलना चाहती हैं. बेहतर है यह सोना हो.
अविनाश साबले, 29 वर्ष, स्टीपलचेज (3,000 मीटर)

आप उस एथलीट को क्या कहेंगे जो हर अगली दौड़ में अपने सर्वश्रेष्ठ व्यक्तिगत रिकॉर्ड—और राष्ट्रीय रिकॉर्ड—को तोड़ देता है? साबले, अविनाश साबले. महाराष्ट्र के बीड के एक किसान के बेटे साबले ने उस वक्त सुर्खियां बटोरीं जब उन्होंने 2018 में स्टीपलचेज में 37 साल पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ दिया था.
तब से उन्होंने इसमें 20 सेकंड का सुधार किया है. हाल ही में 7 जुलाई को पेरिस डायमंड लीग में वे आठ मिनट और 9.91 सेकंड के समय के साथ शीर्ष छठे स्थान पर रहे. जियो सिनेमा के द ड्रीमर्स में उन्होंने साफ ऐलान किया, "मेरा कॉम्पिटीशन सिर्फ मेरी टाइमिंग से है."
केन्या, इथियोपिया और मोरक्को सरीखे अफ्रीकी देशों के प्रभुत्व वाले इस क्षेत्र को एक ऐसे एशियाई के रूप में साबले ने हिलाकर रख दिया है जो उनका लैप दर लैप तथा बाधा दर बाधा मुकाबला कर सकते हैं. वे उस उम्मीद पर खरे उतरे जब उन्होंने साल 2022 में केन्याई वर्चस्व को खत्म करते हुए राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक जीता, और फिर पिछले साल एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता.
दमखम वाली इस दौड़ में भारतीय सेना के सूबेदार साबले पर समय भारी पड़ता है. उनका आखिरी लक्ष्य 8 मिनट से कम वक्त में दौड़ पूरी करना है. वे पेरिस में ऐसा करने में सफल रहे तो पोडियम तक पहुंचने का ख्वाब हकीकत बन जाएगा.
सरबजोत सिंह, 22 वर्ष, निशानेबाजी 10 मीटर एयर पिस्टल

सरबजोत को सफलता 2023 हांगजू एशियाई खेलों में मिली जब उन्होंने 10 मीटर एयर पिस्टल स्पर्धा में चीनियों को हराकर टीम स्वर्ण पदक जीता. उसी खेल में उन्होंने दिव्या टी.एस. के साथ मिश्रित टीम स्पर्धा में रजत पदक जीता. सरबजोत का सितारा तब से चमक रहा है और उनकी नजरें पेरिस ओलंपिक पर टिकी हैं.
इससे पहले 2023 में उन्होंने भोपाल आईएसएसएफ विश्वकप में 10 मीटर एयर पिस्टल में स्वर्ण पदक जीता और बाद में बाकू में उन्होंने एक और आईएसएसएफ विश्वकप में एयर पिस्टल मिश्रित टीम स्वर्ण जीता.
मगर उनके ओलंपिक सपनों को सबसे ऊंची उड़ान पिछले महीने मिली जब उन्होंने म्यूनिख में आईएसएसएफ विश्वकप में अपनी पसंदीदा स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता. हरियाणा के एक किसान परिवार में जन्मे सरबजोत ने स्कूल में निशानेबाजी शुरू की.
उनके पिता जितेंद्र सिंह बताते हैं, "हम सरबजोत को 2012-13 में अंबाला के भागीरथ पब्लिक स्कूल में ले गए जहां प्रबंधन ने खेल पर जोर दिया. मैं चाहता था कि वह वॉलीबॉल चुने, मगर चेयरमैन ने जोर दिया कि वह निशानेबाजी चुने. उसके बाद तो उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा."
—राहुल नरोन्हा
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अंतिम पंघाल, 19 वर्ष, कुश्ती 53 किलो

उन दिनों 11 साल की अंतिम ने अखाड़े में अभी-अभी जाना ही शुरू किया था, जब उनकी मां ने टीवी पर उन्हें 'साक्षी दी' (साक्षी मलिक) को रियो ओलंपिक में कांस्य पदक हासिल करते हुए दिखाया. उसके आठ साल के बाद, दो बार अंडर-20 विश्व चैंपियन और 2023 में यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग की ओर से राइजिंग स्टार ऑफ द ईयर की विजेता अंतिम, मलिक की जगह भरने को उचित ही तैयार खड़ी हैं. वे कहती हैं, "यह बहुत अच्छा लगता है कि लोग मुझसे पदक की उम्मीद करते हैं."
हिसार के साई सेंटर में अपना लक्ष्य पाने के लिए वे जुटी हुई हैं. उम्र से ज्यादा परिपक्व नजर आतीं अंतिम कहती हैं, "हर कोई ट्रेनिंग लेता है, मगर जो अच्छी तरह करता है वही निखरकर सामने आता है. आपको हर किसी का सम्मान करना होगा और आचरण अच्छा रखना होगा."
53 किलो वर्ग में चौथी वरीयता प्राप्त अंतिम ड्रॉ से रोमांचित दिखीं जिसमें तय हो गया कि फाइनल से पहले तक उनका 20 वर्षीय जापानी पहलवान अकारी फुजीनामी से मुकाबला नहीं होगा. अपने नाम की तरह ही उनका इरादा आखिरी वक्त तक डटे रहने का है.
विनेश फोगाट, 29 वर्ष, कुश्ती 50 किलो

पिछले डेढ़ साल में फोगाट बेहद खराब दौर से गुजरी हैं. सियासतदां और भारतीय कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ पहलवानों के विरोध-प्रदर्शन में वे अहम चेहरा थीं और इंसाफ की अपनी लड़ाई में उन्होंने मैट का खासा कीमती समय खो दिया.
उसके बाद घुटने में चोट की वजह से वे 2023 एशियाई खेलों में भाग नहीं ले सकीं. उससे उबरने के बाद जब वापस लौटीं तो पेरिस में जगह बनाने के लिए उन्हें 53 किलो के अपने पसंदीदा भार वर्ग को छोड़कर 50 किलो कैटेगरी में जाने को मजबूर होना पड़ा.
साक्षी मलिक रिटायर हो चुकी हैं और टोक्यो के कांस्य पदक विजेता बजरंग पूनिया क्वालिफाई नहीं कर सके. मगर अभी भी फोगाट की दावेदारी मजबूत है और इससे बतौर पहलवान उनकी अपार दृढ़ता का पता चलता है. उन्होंने ओलंपिक पदक को छोड़कर कुश्ती में हर सम्मान जीता है.
एक मुकाबले में घुटने में चोट लगने के कारण रियो में उनका ओलंपिक का सपना टूट गया था. तोक्यो में वे दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी थीं और अपने भार वर्ग में उन्हें शीर्ष वरीयता हासिल थी मगर क्वार्टर फाइनल में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. पेरिस में फोगाट अपने शानदार करियर की इबारत लिखने का इरादा रखती हैं.
अदिति अशोक, 26 वर्ष, गोल्फ

ओलंपिक के भव्य मंच पर अदिति अशोक सबसे ज्यादा निखरकर सामने आती हैं. सबसे युवा खिलाड़ी के रूप में रियो 2016 में 18 वर्षीय यह खिलाड़ी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गोल्फरों में 41वें पायदान पर थी.
उसके पांच साल बाद तोक्यो में दुनिया की 200वें नंबर की खिलाड़ी अदिति पहले तीन राउंड में हावी थीं, और उन्होंने क्रिकेट को लेकर जुनूनी देश को शुरुआती दौर में हरे मैदान पर अपने स्ट्रोक्स, स्विंग्स और पुट्स देखने के लिए स्क्रीन से चिपका दिया था.
हालांकि वे आखिरी दिन अपनी बढ़ता कायम नहीं रख सकी थीं. क्या तीसरी बार में किस्मत का ताला टूटेगा? जो हो, पेरिस अलग होगा. इस बार अदिति को ऊंची रैंक (#60) हासिल है और उनके पास एलपीजीए का अहम अनुभव भी है.
अदिति ने इंडिया टुडे को पिछले साल बताया था, "मैं उस हफ्ते का बेसब्री से इंतजार कर रही हूं और मुझे उम्मीद है कि मैं टोक्यो से बेहतर प्रदर्शन करूंगी." मेडल जीतने वाली पहली भारतीय गोल्फर बन वे इतिहास रच सकती हैं.
रोहन बोपन्ना, 44 वर्ष और श्रीराम बालाजी, 34 वर्ष, टेनिस पुरुष युगल

अगर पिछले कुछ महीनों के नतीजों पर गौर करें तो क्ले रोहन बोपन्ना की पसंदीदा सतह नहीं है. रैलियां लंबी होती हैं यानी कि गेंद सर्व करने और रिटर्न करने के साथ अंक हासिल करने तक लंबी दौड़ लगानी पड़ती है. और दोनों घुटनों के घिसे हुए कार्टिलेज के साथ बोपन्ना पहले की तरह तेजी से गेंदों का पीछा नहीं कर सकते.
मगर यह कोई रुकावट नहीं बनी और खेल के हिसाब से 43 वर्ष की बड़ी उम्र में बोपन्ना ने इस साल जोड़ीदार मैथ्यू एब्डेन के साथ ऑस्ट्रेलियन ओपन जीतकर अपना पहला पुरुष युगल ग्रैंड स्लैम खिताब हासिल किया.

ओलंपिक के लिए उन्होंने विश्व के नंबर 4 खिलाड़ी श्रीराम बालाजी (64वीं रैंक) को जोड़ीदार चुना है. ये शानदार सर्वर फ्रेंच ओपन के ऐतिहासिक घरेलू मैदान रोलां गैरॉ में बेहतरीन प्रदर्शन की उम्मीद कर रहे होंगे. बोपन्ना कभी हार न मानने वाली सोच के प्रतीक हैं. क्या वे लिएंडर पेस (1996 में अटलांटा खेलों में कांस्य पदक विजेता) की कतार में शामिल हो सकते हैं. ओलंपिक में किस्मत बहादुरों का साथ देती है, निश्चित रूप से बोपन्ना के पास एक मौका है.

