नीरज चोपड़ा, 26 वर्ष
खेल: भाला फेंक
उपलब्धि: ओलंपिक चैंपियन, विश्व चैंपियन, एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता
कैसे क्वालिफाइ किया: 2023 में विश्व एथलेटिक्स पुरुष भाला फेंक के फाइनल क्वॉलिफिकेशन दौर में 88.77 मीटर के प्रयास के साथ (क्वॉलिफिकेशन के लिए 85.5 मीटर आवश्यक)
टोक्यो 2020 ओलंपिक के बाद नीरज चोपड़ा के लिए जीत जैसे उनका स्वभाव बन गई है. जब पेरिस में पक्के पदक की बात होती है तो उसका अंत इसके साथ होता है कि "नीरज नहीं तो फिर कौन?" दरअसल, उस खेल में यह उनके दबदबे का ही सबूत है कि उसमें पदक के लिए बात की जा रही है तो सिर्फ सोने की. उनका लक्ष्य अपने खिताब की रक्षा करना है. अप्रैल में मीडिया से बातचीत के दौरान चोपड़ा ने कहा, "इसके लिए मैं जो भी कुछ कर सकता हूं, उस पर ध्यान केंद्रित कर रहा हूं."
अगर आपने भाले के साथ चोपड़ा के करतब को देखा है तो आप जानते ही होंगे. यही कि उन्हें यह पता करने को फेंके भाले पर नजर गड़ाने की जरूरत नहीं होती कि वे जीत का दांव फेंक रहे हैं. कई दिग्गज एथलीटों की तरह नीरज इसे सिर्फ महसूस करते हैं. भाले के साथ तेज दौड़, अपनी पूरी तरह फैली हुई ताकतवर दाईं भुजा, शानदार थ्रो, सटीक तरीके से उसका पहुंचना, दर्शकों की तरफ घूमना, हवा में दोनों हाथ उठाकर चीखना. सचिन के सटीक कवर ड्राइव की तरह हमेशा नया लगता है.
भारत में कई दिग्गज खिलाड़ी हुए हैं और सब में एक ही बात खास थी—निरंतरता और जीतने की भूख. खुशकिस्मती से हमारे लिए चोपड़ा उस तरह के नहीं हैं जो अपनी ख्याति से आरामपरस्त हो जाएं. चोपड़ा के सफर पर तीन पार्ट वाली इंडिया टुडे डॉक्युमेंट्री द रोड लेस टेकन में 26 वर्षीय एथलीट कहते हैं, "जब तक मुझे नहीं लगेगा कि हां सौ फीसदी हो गया है, मैं अब इससे अधिक सुधार नहीं कर सकता, तब तक मैं कड़ी मेहनत करता रहूंगा और खेल के प्रति जुनूनी बना रहूंगा."
खेल में बारीक पहलुओं पर भी ध्यान देते हुए शिद्दत के साथ तैयारी की उनकी आदत ने मैदान पर उन्हें भरपूर लाभ दिया है. ओलंपिक चैंपियन बनने के बाद से चोपड़ा ने अपने नाम में कई उपलब्धियां जोड़ी हैं—एथलेटिक्स में विश्व चैंपियन बनने वाले (2023) और प्रतिष्ठित डायमंड लीग फाइनल जीतने वाले पहले भारतीय (2022). हालांकि, उनके शानदार फॉर्म के बारे में हर बातचीत आखिरकार इस बात पर खत्म होती है कि वे "विशिष्ट 90 मीटर क्लब में कब दाखिल होंगे?"
चोपड़ा यह लक्ष्य पाना तो चाहते हैं पर यह ऐसा नहीं जिसके लिए वे रातों की नींद हराम कर दें. उन्होंने मीडिया से कहा, "मेरे कई प्रतिद्वंद्वियों ने 90 मीटर पार कर लिया है लेकिन यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि आप उस दिन कितनी दूरी तक फेंक रहे हैं, उस दिन प्रतियोगिता का दबाव कौन बेहतर ढंग से संभालता है? यही सबसे बड़ी चुनौती है." इस साल, 13 एथलीट 85 मीटर का आंकड़ा पार कर चुके हैं.
उपलब्धियां एक अलग बात है लेकिन कोई दिग्गज खिलाड़ी समय पर अपने असर से महान बनता है. चोपड़ा निजी स्पर्धा में भारत के दूसरे ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट और वास्तव में एथलेटिक्स में वे पहले मेडलिस्ट हैं. तीन साल पहले उनके गोल्ड के बाद से भारत जैवेलिन थ्रो का बड़ा शक्ति केंद्र बन गया है. उसने हांगजू एशियाई खेलों के पोडियम पर इसे साबित किया जहां किशोर जेना भी चोपड़ा के साथ शामिल हुए और विश्व चैंपियनशिप में शीर्ष 6 एथलीट में तीन भारतीय खिलाड़ी थे. पेरिस में भी चोपड़ा अकेले ही मैदान में नहीं होंगे. उनका साथ देने के लिए जेना होंगे.
नीरज के साथ पेरिस में वही टीम होगी जो टोक्यो में थी—कोच डॉक्टर क्लाउज बार्तोनीत्ज और फिजियोथेरेपिस्ट ईशान मारवाह. उनकी प्रतिबद्धता का एक संकेत यह है कि तोक्यो के बाद से ही उन्होंने अपना बड़ा हिस्सा विदेश में प्रशिक्षण लेने में गुजारा है. वे स्पष्ट करते हैं कि यह आरामदेह जिंदगी नहीं है: "काफी लोगों को लगता है कि इनके तो मजे हैं, बाहर ही रहते हैं. असल में, बड़ी बोरिंग लाइफ होती है." वे रोजमर्रा के अपने उबाऊ जीवन के बारे में भी बताते हैं: "खाना, प्रशिक्षण, आराम, प्रशिक्षण, खाना और सोना. हमारी हद हॉस्टल और डाइनिंग हॉल है और ट्रैक ही हमारी दुनिया.’’
बेहद मुश्किल लक्ष्य की फिर से उम्मीद करना चमत्कार करने के लिए कहने जैसा है. लेकिन एथलेटिक्स में उसैन बोल्ट, थॉमसन हेराह, मो फराह जैसों ने साबित किया है कि ओलंपिक में ट्रैक पर बार-बार उपलब्धि हासिल करना बहुत संभव है. शीर्ष एथलीटों की तरह चोपड़ा भी निडर, आत्मविश्वासी और प्रेरणा वाले हैं. यही कारण है कि एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के आदिल सुमारीवाला उनके बारे में कहते हैं, "उन्होंने हमेशा के लिए भारतीय खेलों को बदल दिया." तभी तो 1.4 अरब लोगों का विश्वास है कि दूसरी बार भी अगर कोई स्वर्ण पदक हासिल कर सकता है तो वह नीरज हैं.

