scorecardresearch

प्रधान संपादक की कलम से

24 जून से 2 जुलाई तक चला 18वीं लोकसभा का उद्घाटन सत्र हालांकि ज्यादातर रस्मी ही था, पर उसमें हर किसी की उत्सुकता जगाने वाली नाटकीयता थी. किरदारों में कई जाने-पहचाने चेहरे थे

इंडिया टुडे कवर : चुनकर आए पहली बार
इंडिया टुडे कवर : चुनकर आए पहली बार
अपडेटेड 22 जुलाई , 2024

- अरुण पुरी

एक छोर पर चंद्रशेखर पेम्मासानी को लीजिए. वे 48 बरस के हैं, अमेरिका से लौटे हैं, डॉक्टर से आंत्रप्रेन्योर और फिर राजनेता बने, और उनकी घोषित संपत्ति 5,705 करोड़ रुपए है. 2024 के सबसे अमीर उम्मीदवार अब आंध्र प्रदेश की मिर्च राजधानी गुंटूर से सांसद बनकर भारतीय लोकतंत्र के गर्भगृह में दाखिल हुए हैं.

52 वर्षीय मनोज तिग्गा और 53 वर्षीय भास्कर भगरे भी कोई ज्यादा उम्र के नहीं हैं. शिक्षा से वे भी जुड़े हैं और दोनों ने उनके साथ संसद में पहला कदम रखा. मगर समानता यहीं खत्म होती है. तिग्गा उत्तर बंगाल की तराई में बसे अलीपुरदुआर के प्राथमिक स्कूल में शिक्षक थे, जहां उरांव जनजाति से आए उनके माता-पिता चाय बागान में मजदूर थे.

भगरे 'गुरुजी' ने नासिक जिले के स्कूली बच्चों को 33 साल इतिहास और मराठी पढ़ाई और डिंडोरी सीट से चुनाव लड़ने के लिए उन्हें छोटे-छोटे चंदे जुटाने पड़े. 2024 में पहली बार सांसद बनने वालों का जत्था ऐसे ही दिलचस्प विरोधाभासों का गुलदस्ता है.

इसमें सदियों से चली आ रही राजसी वंशपरंपराओं से जुड़े नाम हैं, तो भरतपुर गांव की दलित युवती संजना जाटव भी हैं, जिनका जीत के बाद राजस्थानी शैली में किया गया नृत्य लोकतंत्र का ही जश्न बन गया.

पूर्व आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और पहली बार सांसद बनने वालों में सबसे गरीब मिताली बाग ने पश्चिम बंगाल के आरामबाग में जिला परिषद से बड़ा कुछ नहीं देखा था. उधर, पहली बार बने सांसदों में आठ पूर्व मुख्यमंत्री भी हैं. 2005 में अपनी आखिरी पारी के बाद छठे कार्यकाल के लिए लौटे शिवराज सिंह चौहान जैसों के साथ बसवराज बोम्मई, चरणजीत सिंह चन्नी और मनोहर लाल खट्टर सरीखे पूर्व मुख्यमंत्री हैं.

24 जून से 2 जुलाई तक चला 18वीं लोकसभा का उद्घाटन सत्र हालांकि ज्यादातर रस्मी ही था, पर उसमें हर किसी की उत्सुकता जगाने वाली नाटकीयता थी. किरदारों में कई जाने-पहचाने चेहरे थे. लेकिन नई लोकसभा में पहली बार बने 280 सांसदों का विशाल जत्था भी था.

अगर उन्हें भी गिन लें जो पहले सांसद तो रहे, पर ऊपरी सदन में. ये 2014 की लोकसभा के 314 के आंकड़े से—जो 1984 के बाद सबसे ज्यादा थे—भले 34 कम हों, लेकिन ये 2019 के पहली बार बने 267 सांसदों से दर्जन भर ज्यादा हैं. बड़ी बात यह कि वे सदन का बहुमत हैं—कुल सांसदों के 50 फीसद से ज्यादा.

इतनी अलग-अलग सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक पृष्ठभूमियों से आए नए-नवेले सांसदों की यह फसल इतनी विविध-रंगी है कि राजनैतिक पंडित भी सबको जानने का दावा नहीं कर सकते. बजट सत्र से पहले इस विशेष अंक में हम नवागंतुकों से आपका परिचय करवा रहे हैं. इसे नए-नवेलों का हूज-हू समझिए, या 2024 की जमात का रेडी रेकनर. यह डायरेक्टरी से कहीं ज्यादा है.

इन पन्नों पर आपको संक्षिप्त राजनैतिक जीवनियों से बना छोटा-मोटा महाकाव्य मिलेगा. नई संसद में पहली बार बने हर सांसद की मौजूदगी राजनैतिक क्षेत्र की किसी न किसी अनोखेपन से जुड़ी है. यह बदलाव की मुहर है. इसलिए इसे देश के लोकतंत्र की गाइडबुक समझिए, संग्रहणीय संस्करण जो अपने फौरी मकसद के बाद भी रखने लायक और उपयोगी होगा. कुल मिलाकर आपको एक भव्य कैनवस मिल रहा है, जो बताता है कि देश का लोकतंत्र किस तरह पुष्पित-पल्लवित हो रहा है.

सांख्यिकी विश्लेषण से दिलचस्प जानकारियां सामने आती हैं कि यह बदलाव कैसे घटित हो रहा है. अगर आप 40 को ऊपरी आयु सीमा मान लें, तो कुल 52 युवा सांसद हैं, और वे मोटा-मोटी अलग-अलग पार्टियों की सदस्य संख्या के अनुपात में सभी पार्टियों में हैं.

उनमें 38 पहली बार चुनकर आए हैं. यहां आप तेलुगु देशम पार्टी और समाजवादी पार्टी को सबसे ज्यादा अंक हासिल करते देखेंगे, जिनके क्रमश: 75 फीसद और 73 फीसद सांसद पहली बार के हैं—इसलिए इन दोनों पार्टियों ने अपने राज्यों आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश में जो शानदार वापसी दर्ज की.

वह किरदारों के तकरीबन पूरे कायापलट के दम पर हुई है. कांग्रेस में भी नए-नवेले सांसदों का जत्था है, जो उसकी कुल सदस्य संख्या के 61 फीसद हैं; उसके बाद 45 फीसद के साथ भाजपा है. भाजपा के साथ मजबूती से खड़ा रहा कर्नाटक 71 फीसद के साथ राज्यों में शीर्ष पर है, तो नए खून की मौजूदगी कुल नतीजों में निर्णायक रही है.

पहली बार के सांसदों में सबसे ज्यादा संख्या 51-60 वर्ष की उम्र के सांसदों की है: 89. ये राजनीति में बनिस्बतन युवा हैं, यह देखते हुए कि 54 बरस के राहुल गांधी तक ने अपनी 'यूथ आइकन' की छवि को छोड़ा नहीं है. 74 महिला सांसदों में से अच्छी-खासी 44 पहली बार सांसद बनी हैं.

हमारा डेटा पैकेज का समग्र पैटर्न भी बताता है, हमारे सांसद कितने पढ़े-लिखे हैं, कितने अमीर या गरीब हैं, कितनों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं, किसके कितने बच्चे हैं. ये सब तुच्छ जानकारियां नहीं हैं, क्योंकि हम अपने नीति-निर्माताओं के बारे में बात कर रहे हैं.

यह कहना एक बात है कि 280 में से आश्वस्तकारी संख्या में 201 ग्रेजुएट या उससे ज्यादा शिक्षित हैं, यह जानना बिल्कुल दूसरी है कि ओडिशा के जाजपुर से भाजपा के रबींद्र नारायण बेहरा आर्टिफीशियल इंजीनियरिंग में पीएचडी के साथ कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग के प्रोफेसर हैं.

या भीतरी मणिपुर से कांग्रेस के सांसद अंगोमचा बिमल अकोइजाम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं, जिन्होंने सामाजिक/सांस्कृतिक मनोविज्ञान में उच्च अध्ययन के साथ फिल्म निर्माण में भी छोटी-मोटी उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन जो रॉकस्टार भी हो सकते थे.

सदन में फिल्मी सितारों की भी बेशक कमी नहीं. ताजा रिलीज में कंगना रनौत, सायनी घोष और जून मालिया सरीखे समकालीन और सुरेश गोपी तथा अरुण गोविल सरीखे दिग्गज शामिल हैं.

हमने 280 नवागंतुकों को 25 श्रेणियों में बांटा है. उम्र की प्रोफाइल के अनुसार—संजना जाटव (26 वर्ष) और प्रिया सरोज (25 वर्ष) सरीखे सहस्राब्दी की पीढ़ी के नुमाइंदों से लेकर जीतन राम मांझी (79 वर्ष) सरीखे बुजुर्गवारों तक. केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल जैसे राज्यसभा से आए सदस्य हैं. तो नौसिखुए भी—वे जो पहले विधानसभा तक में नहीं रहे.

चार बड़ी पार्टियों के खिलाफ जीतकर आए दलित आइकन चंद्रशेखर आजाद हैं. उन्हीं की तरह भीमकाय शख्सियतों को धूल चटाने वालों की समूची शृंखला आई है. इनमें बाबाओं और धर्मगुरुओं के साथ कंधा से कंधा मिलाते धनी-मानी उद्योगपति, डॉक्टर और अफसरशाह हैं, धुर वामपंथी कॉमरेड हैं, और हां, अमृतपाल सिंह और इंजीनियर रशीद सरीखे कट्टरपंथी भी हैं. हरेक हकीकत की तरफ खुलती खिड़की है.

लोकसभा से जनाकांक्षा की झलक मिलती है. इस विशेष अंक के साथ हम उसके प्रति सम्मान जता रहे हैं. देश भर में फैले 280 सांसदों की कहानियों का तानाबाना बुनना, उनकी तस्वीरें उतारना, इस सबके लिए भारी-भरकम प्रयत्न की जरूरत थी. उन्हें श्रेणियों में बांटना भी चुनौती था, क्योंकि उनमें से कई खानों में फिट बैठ रहे थे.

हमने सबसे अलग दिखाई देने वाली खूबियों को सामने रखकर यह काम किया. यह भविष्य में उनका संदेश या खबर मिलने की वजह हो भी सकता है और नहीं भी. लेकिन ज्यादा संभावना यही है कि आप उनसे और उनके बारे में सुनते रहेंगे.

- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

Advertisement
Advertisement