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400 पार का दावा करने वाली बीजेपी को जनता ने क्यों सिखाया तगड़ा सबक?

अपना गढ़ माने जाने वाले राज्यों जैसे यूपी, राजस्थान में भी सिमट गई बीजेपी

(बाएं से) राजनाथ सिंह, पीएम मोदी, अमित शाह और जे.पी. नड्डा 4 जून को भाजपा पार्टी मुख्यालय में
(बाएं से) राजनाथ सिंह, पीएम मोदी, अमित शाह और जे.पी. नड्डा 4 जून को भाजपा पार्टी मुख्यालय में
अपडेटेड 20 जून , 2024

लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजे भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए सफलता कम शर्मिंदगी का सबब ज्यादा हैं. उसे चेहरा बचाने लायक जीत हासिल हुई, सत्ता से बाहर होने का खतरा बस किसी तरह टला और गहन आत्मनिरीक्षण की जरूरत बताते कई सवाल मुंह बाए खड़े हैं. एक दशक तक निर्विवाद रूप से देश पर भरपूर वर्चस्व कायम रखने वाली भाजपा के लिए यह स्थिति असहज करने वाली थी.

बस इतनी ही गनीमत रही कि पार्टी पूरी बहादुरी के साथ खुद को सामान्य दिखाने की कोशिश कर पा रही थी. नतीजे ऐसे रहे कि नई दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री आवास से आने वाली तस्वीरों को किसी तरह सामान्य और खुशी के माहौल वाली दर्शाया जा सका. आखिरकार, नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरा कार्यकाल हासिल कर एक नया इतिहास जो रचा. लेकिन इन मुस्कुराहटों के बीच दो चेहरों पर तनाव और थकावट साफ दिख रही थी - एक मोदी के 'चाणक्य’ अमित शाह और दूसरे पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा. वे लगातार पर्दे के पीछे वार्ताओं में व्यस्त थे.

ताकि ऐसे संभावित साझेदारों को टटोला जा सके जिनकी मित्रता के बलबूते मोदी 3.0 की स्थिरता सुनिश्चित हो सके. यह तो बस एक लंबी कवायद की शुरुआत भर हो सकती है, क्योंकि एक दशक में पहली बार भाजपा खुद पूर्ण बहुमत से पीछे रह गई है. और सरकार चलाने के लिए उसे दूसरे दलों के समर्थन पर निर्भर रहना होगा.

सौदेबाजी की इस स्थिति में भाजपा को नरम रुख अपनाना होगा और कुल मिलाकर अपनी भाषा अधिक लचीली बनानी होगी. वैसे तो पीएम मोदी ने खुद को इसके लिए पहले ही तैयार कर लिया है. एक शाम पहले ही पार्टी मुख्यालय में उन्होंने 'मोदी सरकार’ जैसा कोई उल्लेख करने से परहेज किया. कहा जा सकता है कि उन्होंने एक तरह से यह संकेत देने की कोशिश की कि वे अब अपने कार्यालय या सरकार पर ज्यादा जोर नहीं दे रहे.

इसके बजाए, 'एनडीए सरकार’ का उल्लेख गठबंधन को लेकर उदार रुख अपनाने का परिचायक है. और, यह ठीक भी है क्योंकि मोदी 3.0 सरकार का बनना और उसका मजबूती से टिके रहना काफी हद तक सहयोगी दलों के रुख पर निर्भर करेगा. आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने जा रहे एन. चंद्रबाबू नायडू ने 16 सांसद जोड़े हैं. वहीं, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी के सांसदों की संख्या 12 है. यहां तक, भाजपा की सियासी बिसात की वजह से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद पर काबिज होने वाले एकनाथ शिंदे भी सात सदस्य लेकर आए हैं.

कुल मिलाकर यही 35 सांसद भाजपा के 240 सांसदों के साथ मिलकर मोदी सरकार को साधारण बहुमत के 272 के आंकड़े से आगे पहुंचाते हैं. बाकी 20 अन्य सदस्यों के साथ मिलकर ही एनडीए का कुल आंकड़ा 292 पर पहुंचा है, जिसमें चिराग पासवान के पांच सांसदों के साथ विभिन्न छोटी पार्टियों के सदस्य तक शामिल हैं. पिछले कार्यकालों के दौरान जरूरत न पडऩे की वजह से भाजपा अगर उदारता के साथ गठबंधन धर्म को निभाना भूल गई है तो उसे अटल बिहारी वाजपेयी जैसे पुराने दिग्गजों से सीखने की जरूरत पड़ सकती है. समीक्षा के लिए केंद्र और राज्यों के स्तर पर सक्चत पर्यवेक्षक मौजूद रहेंगे. 

यह स्थिति इसलिए उपजी क्योंकि आंतरिक अनुमानों के विपरीत भाजपा को अपने प्रमुख गढ़ों - यूपी (सीटें 62 से घटकर 33 हो गईं), राजस्थान (सभी 25 की जगह 14) और हरियाणा (सभी 10 के बजाए सिर्फ 5) - में करारी हार झेलनी पड़ी. यही नहीं, प्रमुख रणक्षेत्र महाराष्ट्र (23 से 9 पर पहुंचा) और बफर जोन पश्चिम बंगाल (18 से 12) में हुआ 63 सीटों का नुकसान भविष्य को प्रभावित करने वाला साबित हो सकता है.

मध्य प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक जैसे पुराने गढ़ों में भाजपा का प्रदर्शन जहां चुनावी क्षति घटाने में मददगार साबित हुआ, वहीं कुछ राज्यों ने नई ऊर्जा भरने का भी काम किया - ओडिशा (21 में से 19 सीटें जीतने के साथ राज्य विधानसभा में भी बहुमत), केरल में ऐतिहासिक शुरुआत, तेलंगाना में आठ सीटों पर जीत और तमिलनाडु तथा पंजाब में वोट शेयर में भारी उछाल का पार्टी को आगे चलकर बड़ा फायदा मिल सकता है.

एक लंबे अरसे से जारी कवायद और कड़ी मेहनत के बलबूते मिली यह सफलता ऐसे समय कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने में काम आएगी जब अपेक्षित नतीजे न मिलने से पार्टी के भीतर हताशा का माहौल है. इस सबके बीच, नेहरू के बाद लगातार तीसरी बार जीतने वाले पहले प्रधानमंत्री मोदी एक नया कार्यकाल शुरू कर रहे हैं, जिसमें उन्हें अपने अनुमान से कहीं अधिक संतुलन साधने की जरूरत पड़ेगी. चूंकि अति महत्वाकांक्षी सहयोगी दलों ने केंद्र सरकार में बड़ी हिस्सेदारी तथा अपने राज्यों के लिए अधिक केंद्रीय निधियों की मांग पहले ही शुरू कर दी है, ऐसे में भाजपा को सरकार चलाने के लिए सबका साथ और सबका विकास के अपने नारे को अमल में लाने की जरूरत पड़ेगी.

पिछले दशक में भाजपा ने अपनी छवि एक ऐसी निर्मम चुनावी मशीन की बना ली है जो हमेशा चलती रहती है, कभी नहीं थकती और जब वह पटकथा लिखती है तो किसी बड़े खुद से सीखने वाले ऐल्गोरिद्म की तरह अपने टेंपलेट बनाती और मिटाती है. इस बार कंप्यूटर रीबूट या रिस्टार्ट करने की जरूरत का संकेत दे रहा है. कार्यकर्ताओं ने जो एरर (गलती होने) संदेश बताने की कोशिश की उनमें थोक में और मुफ्त में 'आयात’ करने की नीति और पुराने वफादारों के ऊपर इन आयातितों पर भरोसा करना और पद देना शामिल था.

बार-बार ऐसा होते जाने से उम्मीदवारों के दुर्भाग्यपूर्ण चुनाव में भी ऐसा ही हुआ. एक निजी बातचीत में भाजपा के एक आला नेता ने राजस्थान के चूरू से दो बार सांसद रहे राहुल कस्वां का उदाहरण दिया, जिनके परिवार का कई पीढ़ियों से भाजपा के साथ जुड़ाव रहा लेकिन उनको नजरअंदाज करते हुए नेतृत्व ने उनका टिकट काट दिया. कस्वां कांग्रेस में चले गए और चूरू में 72,737 वोटों से जीते.

राज्यों की सूची भी ऐसे मनमाने चयन से भरी हुई थी जिससे पुराने लोग गैरजरूरी और हताश महसूस कर रहे थे. यहां तक कि राज्यों में सरकारें बनाने के लिए दलबदलुओं को तरजीह देने से हताशा और गहरा गई. पिछले दशक में भाजपा ने अपने सभी मुख्यमंत्री बदल दिए, कुछ की जगह छोटे कद के राजनेता बिठा दिए. राजस्थान के भजन लाल शर्मा इस मामले में अनूठा उदाहरण हैं - भाजपा नेतृत्व ने ड्रॉ में उनका नाम चुनते हुए दो बार की लोकप्रिय मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सहित कई बड़े नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया. 

जब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने चुनाव अभियान के दौरान कार्यकर्ताओं और योगी के वफादारों के बीच भ्रम पैदा करने की कोशिश में नाटकीय तरीके से दावा किया कि भाजपा लोकसभा चुनाव के बाद यूपी में योगी आदित्यनाथ को हटा सकती है, इससे पुराना घाव और हरा हो गया. पार्टी के एक वर्ग की शिकायत है कि प्रचार के दौरान योगी का पूरी तरह इस्तेमाल नहीं किया गया और उनकी सिफारिशों की अनदेखी की गई. 

कार्यकर्ता और वरिष्ठ नेता इशारा करते हैं कि कैसे हल्के लोगों को संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति जैसी पार्टी की महत्वपूर्ण इकाइयों में लिया गया. ये वह लोग थे जिनका कोई स्थापित चुनावी इतिहास या जनाधार नहीं है, ये दिखावटी चेहरे हैं जिन पर फैसले का कोई असर नहीं होता. यहां तक की फीडबैक से भी चीजें ठीक नहीं हुईं: भाजपा नेतृत्व ने जमीनी लोगों से आने वाले अच्छे सुझावों पर ध्यान नहीं दिया, इसके बजाए किराए पर ली गईं पेशेवर एजेंसियों और उनके अधिकारियों की लैपटॉप बुद्धि को तरजीह दी गई. 

निर्णय प्रक्रिया का केंद्रीकरण इतना था कि कई मुख्यमंत्रियों और प्रदेश अध्यक्षों के प्रमुख नाराजगी से कह रहे हैं कि सांसद के खिलाफ स्थानीय सत्ता विरोधी उनके फीडबैक पर ध्यान नहीं दिया गया. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, जमीनी स्तर पर प्रचार का मुकाबला करने और पोलिंग बूथ पर वफादार और संभावित मतदाताओं को लाने के लिए सशक्त और उत्साही कार्यकर्ता जरूरी होते हैं. इस सबके बाद मोदी का 400 पर का युद्धघोष भी उल्टा और महंगा पड़ा. पहले से असंतुष्ट कार्यकर्ताओं ने इसे बहुत ज्यादा गंभीरता से लिया और प्रचार के दौरान दूर ही रहे.

भाजपा को आंतरिक तौर पर कमजोर होने के अलावा अपने स्वाभाविक मतदाताओं के छिटकने का भी खामियाजा भुगतना पड़ा - हरित क्रांति वाले क्षेत्र में जाटों में नाराजगी थी; यूपी, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में राजपूत नाखुश थे; मराठों में एक अलग तरह की बेचैनी दिखी; वहीं यूपी और बिहार जैसे कम विकास वाले राज्यों में युवाओं के बीच निराशा का माहौल था.

इसी मतदाता वर्ग ने हाल-फिलहाल के चुनावों में भाजपा की झोली में लाखों वोट डाले थे, और जो राष्ट्रवाद और विकास के नारों पर भरोसा करके पिछले एक दशक से पूरी मजबूती के साथ मोदी के साथ डटा था. यहां फीडबैक प्रक्रिया बाधित होने का नतीजा भी साफ दिखा. आखिर क्या वजहें थीं जो इस नाराजगी को हवा मिलती रही? सरकारी नौकरियों की बढ़ती आकांक्षा, आरक्षण नीति को लेकर उपजी आशंकाएं और कृषि अर्थव्यवस्था का लगातार पटरी से उतरना.

फरवरी के आखिरी सप्ताह में यूपी में कांस्टेबलों की भर्ती/पदोन्नति के लिए आयोजित परीक्षाएं रद्द कर दी गईं, क्योंकि एक बार फिर पेपर लीक होने का आरोप लगा था - इसके पिछले हफ्ते ही 60,244 पदों के लिए करीब 48.2 लाख अभ्यर्थियों ने इस परीक्षा में हिस्सा लिया था. युवाओं की नाराजगी का नतीजा जातीय समीकरणों में बदलाव के तौर पर सामने आया. भाजपा ने जिस गैर-जाटव दलित वर्ग को लुभाने में खासी मशक्कत की थी, वह पाला बदलकर इंडिया ब्लॉक के पक्ष में लामबंद हो गया; यहां तक कि बसपा के भरोसेमंद वोट बैंक जाटवों ने भी अपनी निष्ठा बदल ली.

अगर पूरे दलित समुदाय की बात करें तो उसने संविधान खतरे में होने के नैरेटिव को काफी गंभीरता से लिया, उनकी प्रतिक्रिया को भाजपा के अति-आत्मविश्वासी उम्मीदवारों ने और भी बढ़ावा दिया. वहीं, विपक्ष ने भी इस मुद्दे को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. गैर-यादव ओबीसी ने जातीय गणित के बजाए सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य के आधार पर वोट करना मुनासिब समझा. यही नहीं, योगी शासन में ठाकुरों की नाराजगी होने और ब्राह्मणों की दुविधा ने भी भाजपा के कोर वोट बैंक को प्रभावित किया. यही वजह है कि उसके वोट शेयर में 8.6 फीसद की गिरावट दर्ज की गई और पार्टी को अयोध्या समेत 29 सीटों का घाटा उठाना पड़ा.

उधर, पंजाब के किसान संघों ने एक बार फिर दिल्ली की ओर कूच करना शुरू कर दिया. उनकी मांग थी कि 2020-21 में राष्ट्रीय राजधानी में 13 माह चले घेराबंदी खत्म करने के समय किए गए वादों को पूरा किया जाए. पंजाब और हरियाणा के बीच शंभू और खनौरी बॉर्डर एक बार फिर किसानों की नाराजगी और सरकारी दमन के गवाह बने, जहां आंसू गैस के गोले दागे जाने और सड़कों पर कीले ठोंकने से एक अलग ही नैरेटिव ने जन्म लिया.

प्रदर्शनकारी किसानों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में भाजपा उम्मीदवारों पर निशाना साधने में कोई भी कसर नहीं छोड़ी, जिससे जाटों के बीच भाजपा को लेकर आक्रोश बढ़ता गया. वहीं, महाराष्ट्र में मार्च के शुरू में आंदोलनकारी मराठों को मनाने के लिए पारित नए आरक्षण कानून ने अन्य ओबीसी समूहों, खासकर संबंधित कुनबी समुदाय को नाराज कर दिया. दरअसल, उन्हें अपने कोटे में सेंध लगने की आशंका थी.

नतीजा, 2014-2019 में कपास क्षेत्र में अपना दबदबा बनाने वाले एनडीए को इस बार विदर्भ में पराजय का सामना करना पड़ा. दरअसल, नाराज कुनबी समुदाय विपक्षी गठबंधन महा विकास अघाड़ी के पक्ष में लामबंद हो गया, जो दलित-मुसलमानों के समर्थन से पहले ही मजबूत स्थिति में पहुंच चुका था. केवल नितिन गडकरी और दो अन्य उम्मीदवार भी उनका कोपभाजन बनने से बच पाए. कोटा लॉलीपॉप मराठों की नाराजगी शांत नहीं कर पाया. 

रोशनी की नई किरण

बहरहाल, ओडिशा ने भाजपा को रोशनी की एक नई किरण दिखाई है, जहां दशकों से जारी कवायद का नतीजा 78 विधानसभा सीटों पर जीत के तौर पर सामने आया. पूर्वी तट के किसी राज्य में पहली बार अपना खुद का मुख्यमंत्री होगा. अपने सहयोगी दलों टीडीपी और पवन कल्याण की जनसेना पार्टी के साथ भाजपा आंध्र प्रदेश की नई सरकार का भी हिस्सा बनेगी. तेलंगाना में 15.4 फीसद वोट शेयर वृद्धि के साथ इसने आठ सीटें हासिल की हैं. पंजाब और तमिलनाडु दो ऐसे राज्य हैं, जो भाजपा के हिंदुत्व नैरेटिव के प्रति उदासीन रहे हैं और पार्टी यहां अपने पारंपरिक सहयोगियों के बिना मैदान में उतरने के बावजूद उनसे ज्यादा वोट हासिल करने में सफल रही.

पंजाब में इसको 24 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त के साथ 18.5 फीसद वोट मिले जबकि तमिलनाडु में वोट शेयर 7.6 फीसद बढ़ा. इस सबके बीच पार्टी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव हैं. ये सभी ऐसे राज्य हैं जहां भाजपा ने अपनी सीटें और वोट शेयर दोनों गंवाए हैं. सोचने-विचारने के लिए अभी बहुत कुछ बाकी है लेकिन पार्टी को इन चुनावों को देखते हुए तत्काल कुछ कदम उठाने होंगे.

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