- अरुण पुरी
पिछले दो आम चुनावों के विपरीत, 2024 के सात चरण और 45 दिन लंबे आम चुनाव में कोई सर्वशक्तिशाली नैरेटिव नहीं रहा. जिस एक थीम ने अंतत: यह दबदबा हासिल किया, शायद कुछ अनजाने में ही, वह है आरक्षण का मुद्दा.
यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस ऐलान से शुरू हुआ कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) इस बार 'चार सौ पार' जाएगा. वे एक भव्य नैरेटिव पर सवार थे. उनकी पार्टी ने जद (यू) के पितृपुरुष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को, जो जाति आरक्षण के समूचे मुद्दे के शिल्पकार थे, अपने साथ जोड़कर जाति आरक्षण के खतरे को भी बेअसर कर दिया था.
अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन भी हुआ, जो हिंदुत्व की नई प्राण प्रतिष्ठा का संकेत था. इसमें विकसित भारत का महत्वाकांक्षी विचार भी घुला-मिला था. तो ऐसा कुछ नहीं था जो सत्तारूढ़ पार्टी के आशावाद को धूमिल करता. लेकिन जैसा सोचा था वैसा हुआ नहीं.
मतदान की तारीखों के ऐलान से ठीक पहले भाजपा के सांसद अनंत कुमार हेगड़े ने प्रचार अभियान के दौरान कहा कि एनडीए के लिए 400 से ज्यादा सीटें हासिल करना इसलिए जरूरी है क्योंकि, "संविधान में संशोधन करना है... यह दो-तिहाई बहुमत के बिना नहीं किया जा सकता. पहले हमारा संविधान हिंदू धर्म को दबाने के लिए बदला गया था."
विपक्ष ने उनकी बात को उठा लिया और कहा कि भाजपा का असली इरादा बेनकाब हो गया है, जो संविधान को बदलकर हिंदू राष्ट्र लाने का है और जिसमें सारे जाति-आधारित आरक्षण खत्म कर दिए जाएंगे. इसमें अनुसूचित जातियों (एससी), अनुसूचित जनजातियों (एसटी) और अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) को सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में दिए गए 50 फीसद आरक्षण भी शामिल थे.
विपक्ष का नैरेटिव असर करने लगा, खासकर दलितों के बीच, जिनका संविधान के रचयिता बाबा साहेब आंबेडकर के साथ भावनात्मक रिश्ता है. इससे ओबीसी की लंबे समय से महसूस की जा रही वह चाहत भी उभर आई जिसमें वे अपनी आबादी के हिसाब से इंसाफ करने वाली आरक्षण नीति की मांग कर रहे थे.
संविधान के तहत एससी/एसटी को क्रमश: 15 फीसद और 7.5 फीसद आरक्षण दिया गया है, जो कमोबेश उनकी आबादी के अनुपात के बराबर है. 1931 में आखिरी राष्ट्रीय जाति जनगणना के वक्त ओबीसी की आबादी 51 फीसद से ज्यादा आंकी गई थी, इसके बावजूद कुल आरक्षण को 50 फीसद की सीमा के भीतर रखने की खातिर उन्हें 27 फीसद आरक्षण दिया गया.
आरक्षण में इंसाफ की ओबीसी की मांग ने तब जोर पकड़ा जब अक्टूबर 2023 में नीतीश के प्रशासन ने राज्य स्तर के जाति सर्वेक्षण के नतीजे जारी किए, जिनसे इस चौतरफा अनुमान की तस्दीक हो गई कि राज्य की आबादी में ओबीसी 63.14 फीसद हैं.
बाद में नीतीश की सरकार ने दो कानूनी संशोधन पारित करके राज्य में जाति आधारित आरक्षण 50 फीसद से बढ़ाकर 65 फीसद कर दिया. इससे बिहार तमिलानाडु सरीखे राज्यों की कतार में आ गया, जहां आरक्षण 1992 में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से लागू 50 फीसद की ऊपरी सीमा से ज्यादा हैं. चूंकि यह उस सीमा का उल्लंघन था, इसलिए 22 नवंबर, 2023 को बिहार ने केंद्र से उन दो संशोधित कानूनों को, तमिलनाडु की तरह, संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने का अनुरोध किया. केंद्र ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है.
इस बीच अन्य राज्यों ओडिशा, कर्नाटक, तेलंगाना और महाराष्ट्र ने भी ऐसा ही सर्वेक्षण करके, या उसका वादा, या उस पर विचार करके नीतीश के सिलसिले को आगे बढ़ाया. इसने महाराष्ट्र में आरक्षण को लेकर एक नया भड़काऊ मुद्दा खड़ा कर दिया वह है मराठों की ओबीसी की सूची में शामिल किए जाने की मांग.
हाल में 'मंडल प्लस' नीति की तरफ बढ़ रही कांग्रेस ने जाति जनगणना को चुनाव अभियान के अपने मुख्य नारे के तौर पर अपना लिया. उसने कहा कि एक बार जब ओबीसी की तादाद पता चल जाएगी, और साथ ही ये सामाजिक-आर्थिक आंकड़े भी कि किस तबके पास कितनी धन-दौलत है, तो इससे सामाजिक न्याय की कोशिश शुरू करने में मदद मिलेगी. इंडिया गठबंधन में मंडल की विरासत पाने वाली दो पार्टियों, राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी, की संगत में खड़े होकर कांग्रेस ने आरक्षण पर 50 फीसद की न्यायिक सीमा को उखाड़ फेंकने का वादा भी कर दिया.
यही वह मुकाम था जब भाजपा तुरत-फुरत नुक्सान पर नियंत्रण की मुद्रा में आ गई. प्रधानमंत्री मोदी की अगुआई में जबरदस्त जवाबी हमला करते, मुस्लिम प्रेतों को जगाकर नैरेटिव को उलझाने और कांग्रेस के खिलाफ तुष्टीकरण की राजनीति के पुराने आरोप को जिलाने की कोशिश की. पार्टी ने दोहरी रणनीति तैयार की.
पहले उसने कांग्रेस के घोषणापत्र और राहुल गांधी की संपत्ति के पुनर्वितरण की थीम को मुस्लिम-प्रथम नीति से जोड़ दिया. प्रधानमंत्री ने 'भारत के एक्स-रे' के राहुल के वादे की यह कहकर खुलेआम भर्त्सना की कि यह हिंदू महिलाओं के 'मंगलसूत्र' से लेकर मौजूदा जाति आरक्षणों तक सारी संपत्तियों और अधिकारों को हड़पने और उन्हें मुसलमानों में बांट देने की दिशा में कदम है.
दूसरे, कांग्रेस की अगुआई वाली कुछ राज्य सरकारों के मुस्लिम आरक्षण पर जोर देने वाले पहले के कदमों ने आचरण में एक पैटर्न साबित करने में मदद की. पहले प्रमाण के तौर पर उन्होंने तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का 2006 का एक बयान निकाला और दावा किया कि उन्होंने देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का बताया था. कांग्रेस ने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह डॉ. सिंह के बयान को 'तोड़ने-मरोड़ने' और मतदाताओं को सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत कर रही है.
संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता, वहीं यह मुस्लिम सहित ऐसे विभिन्न जाति समूहों को, जो पिछड़े माने जाते हों, सामाजिक-आर्थिक आधार पर आरक्षण में शामिल करने से रोकता भी नहीं है. भाजपा शासित राज्यों सहित कई राज्यों ने कुछ निश्चित मुस्लिम समुदायों को इस रूप में मान्यता देकर उन्हें ओबीसी आरक्षण दिया है.
तेलंगाना, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश सरीखे कुछ राज्यों ने मुसलमानों को अलग कोटा देने की वकालत की, पर सुप्रीम कोर्ट ने अक्सर 50 फीसद की सीमा के उल्लंघन का हवाला देकर उनकी कोशिशों को खारिज कर दिया.
इस हफ्ते हमारी आवरण कथा में मैनेजिंग एडिटर सुनील मेनन आपको आरक्षण पर इस पेचीदा और कटुता भरी राजनैतिक लड़ाई और आम चुनाव के नतीजों पर इसके असर के बारे में बता रहे हैं. आख्यानों और प्रतिआख्यानों के इस समुद्र में वह कौन-सा आख्यान है जो अंत में फर्क पैदा कर पाता है, यह तो 4 जून को ही पता चलेगा.
- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

