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केजरीवाल के जेल से बाहर आने से लोकसभा चुनाव प्रचार पर क्या हुआ असर?

केजरीवाल की रिहाई से दिल्ली और पंजाब में आप के चुनावी अभियान में नया उत्साह, इंडिया ब्लॉक को भी चुनावी लाभ की उम्मीद

जेल से बाहर आने के बाद समर्थकों का अभिवादन करते अरविंद केजरीवाल
जेल से बाहर आने के बाद समर्थकों का अभिवादन करते अरविंद केजरीवाल
अपडेटेड 27 मई , 2024

"मैंने किया क्या है? मेरी गलती क्या है?" एक एसयूवी में सवार होकर निकले दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (आप) सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने सनरूफ के बीच खड़े होकर सैकड़ों पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए यह सवाल उछाला. उन्होंने आसपास मौजूद भीड़ से फिर पूछा, "मेरी गलती यह है कि मैंने आपके बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल बनवाए? मेरी गलती यह है कि आप सबको मुफ्त बिजली मुहैया कराई? क्या यही बात है?" तभी अपने घर की बालकनी से झांक रही एक महिला का जवाब आया, "हां!" केजरीवाल ने उनकी तरफ देखा और जवाब में मुस्कुरा दिए.

यह रैली दक्षिणी दिल्ली के महरौली स्थित सेठ सराय इलाके में एक रोड शो का हिस्सा थी, जिसका मकसद यह बताना था कि केजरीवाल 2024 के चुनावी मैदान में ताल ठोकने के लिए वापस आ गए हैं. वे करीब छह सप्ताह पहले अपनी गिरफ्तारी के बाद से सियासी परिदृश्य से नदारद थे. केजरीवाल के अंतरिम जमानत पर तिहाड़ जेल से बाहर आने के एक दिन बाद चुभती गर्मी के बीच शाम को इलाके से गुजरने वाला मुख्य कालका दास मार्ग आप कार्यकर्ताओं से खचाखच भरा नजर आया. हर तरफ गांधी टोपी पहने कार्यकर्ता दिख रहे थे. जगह-जगह पार्टी के पीले-नीले रंग वाले झंडे और झाड़ू चिह्न वाले बैनर लहराते दिखे. एक लाउडस्पीकर पर क्रांतिकारी गीत 'मेरा रंग दे बसंती चोला' बजता है और केजरीवाल अपनी कैद के बारे में बताना शुरू करते हैं, "जेल में मैंने आप सबको बहुत मिस किया. पर कल एक चमत्कार हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने मुझे आज आपके समक्ष चुनाव प्रचार के लिए स्वतंत्र कर दिया." यह सुनते ही भीड़ में खुशी की एक लहर-सी दौड़ गई.

दक्षिण दिल्ली वह लोकसभा क्षेत्र है, जहां 2020 के विधानसभा चुनाव में आप ने 10 में से नौ सीटों पर जीत हासिल की थी. यह स्थिति तब थी जब बमुश्किल एक साल पहले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए दिल्ली की सभी सात संसदीय सीटों पर कब्जा जमाया था. लेकिन 21 मार्च को जब केजरीवाल पद पर रहते गिरफ्तार किए जाने वाले पहले मुख्यमंत्री बने, तो दिल्ली शराब नीति मामले की जांच कर रहे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने जाने-अनजाने ही आप को एक बड़ा चुनावी मुद्दा थमा दिया.

करीब एक दशक पुरानी आप कभी केंद्र में सरकार बनाने की दौड़ में शामिल नहीं रही और उसे प्रमुख विपक्षी दल के तौर पर भी नहीं देखा गया. शायद यही वजह थी कि दिल्ली के मतदाताओं को संसदीय चुनावों में उसे वोट देने का कोई औचित्य नजर नहीं आया. 2019 के आम चुनावों में भाजपा को दिल्ली में 56.6 फीसद वोट मिले. कांग्रेस 22.5 फीसद वोट शेयर के साथ दूसरे नंबर पर रही, जबकि आप को महज 18.1 फीसद वोटों से संतोष करना पड़ा. लेकिन उन्हीं वोटरों ने अगले साल 53.6 फीसद वोट शेयर के साथ दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 62 सीटें आप की झोली में डाल दीं. पश्चिमी दिल्ली सीट से आप के लोकसभा उम्मीदवार महाबल मिश्र का दावा है, "लोग इस बार बेहद गुस्से में हैं, क्योंकि भाजपा ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को किसी सबूत या ठोस आधार के बिना ही जेल में डाल दिया. मैं प्रचार के लिए जहां भी जाता हूं, लोगों की यह भावना जाहिर होती है."

फौरी राहत के तौर पर केजरीवाल की जेल से रिहाई कई मायने में बेहद अहम है. उन्हें ऐसे समय पर रिहा किया गया है, जब चुनाव हो रहे हैं. और जिन दो राज्यों दिल्ली और पंजाब में पार्टी का शासन है, वहां क्रमश: 25 मई और 1 जून को मतदान होने वाला है. आप ने गुजरात और हरियाणा की कुछ सीटों के साथ चार राज्यों में कुल 20 उम्मीदवार उतारे हैं. पार्टी सुप्रीमो का फिर से मैदान में उतरना निश्चित तौर पर पार्टी के अभियान को गति देगा. केजरीवाल न केवल पार्टी का चेहरा हैं बल्कि मुख्य रणनीतिकार भी वही हैं. केजरीवाल सबसे ज्यादा लोकप्रिय विपक्षी नेताओं में भी शुमार हैं और उनके आने से अन्य राज्यों में इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस (इंडिया) का अभियान भी मजबूत होने के आसार हैं. इतना ही नहीं, इंडिया ब्लॉक को उम्मीद है कि उनकी गिरफ्तारी से उत्पन्न जनता की सहानुभूति से उन्हें खासा लाभ होगा. यही वजह है कि विपक्ष उनकी गिरफ्तारी को लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर हमला और विपक्ष की आवाज दबाने की भाजपा की कोशिश करार देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा.

केजरीवाल के गिरफ्तार होने के बाद उनकी पार्टी के लिए यह अंदाजा लगा पाना कतई नामुमकिन था कि वे प्रचार के लिए समय पर बाहर आ पाएंगे या नहीं, इसीलिए अभियान की सारी रणनीति 'जेल का जवाब वोट से' नारे के इर्द-गिर्द तैयार की गई. आप पदाधिकारियों का कहना है कि इस नारे की सबसे खास बात यह है कि केजरीवाल के जेल से बाहर आने के बाद भी यह पार्टी के मूल मतदाताओं को बढ़-चढ़कर वोट देने के लिए प्रेरित करने के लिहाज से प्रासंगिक बना हुआ है. जमानत मिलने से पूर्व पार्टी ने केजरीवाल की पत्नी सुनीता को एक महीने से ज्यादा समय तक व्यापक स्तर पर मोर्चे पर उतारा. उन्होंने बड़े-बड़े रोड शो में हिस्सा लिया और दिल्लीवालों से अपने 'बेटे, भाई' पर अपना प्यार लुटाते रहने की अपील भी की, जिन्हें "गैरकानूनी तरीके से प्रताड़ित" किया गया है. चेहरे पर गंभीरता का भाव लिए सुनीता रैलियों में कहतीं, "उन्होंने मेरे पति को जेल में डाल दिया क्योंकि वे उनके प्रति आपके प्यार से जलते हैं." यह ऐसा चुनावी मुद्दा है जिसमें विकास और सत्ता-विरोध के साथ-साथ भावुकता और नाटकीयता का पुट भी भरपूर है.

दो का दम अरविंद केजरीवाल के साथ उत्तर पूर्वी दिल्ली से कांग्रेस के उम्मीदवार कन्हैया कुमार

विपरीत परिस्थितियों के बावजूद एक बात आप को कुछ हद तक चुनावी सफलता के लिए आश्वस्त करती है तो वह है, गठबंधन का सरल सियासी समीकरण. आप और कांग्रेस के बीच दिल्ली, हरियाणा और गुजरात के लिए सीट बंटवारे पर सहमति बनने के बाद इंडिया ब्लॉक ने दिल्ली की सभी सात सीटों पर साझे उम्मीदवार उतारे हैं. आप के हिस्से में चार सीटें आई हैं - दक्षिणी दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली, नई दिल्ली और पूर्वी दिल्ली. वहीं तीन सीटें उत्तर पूर्वी दिल्ली, उत्तर पश्चिमी दिल्ली और चांदनी चौक कांग्रेस को मिली हैं. पंजाब में ऐसी कोई सहमति नहीं बन पाने के कारण दोनों पार्टियों ने सभी 13 सीटों पर एक-दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार उतारे हैं. अपने वोटों को एक-दूसरे के पक्ष में हस्तांतरित कराने पर निगरानी रखने के लिए दोनों दलों ने एक समन्वय समिति बनाई है. हालांकि, 2019 के आंकड़े दर्शाते हैं कि उनका संयुक्त वोट शेयर (40.6 फीसद) भाजपा के 56.6 फीसद की तुलना में कहीं नहीं ठहरता. उत्तर पूर्वी दिल्ली से कांग्रेस के उम्मीदवार कन्हैया कुमार कहते हैं, "हम पूरी तरह एकजुट हैं. (केजरीवाल की) जमानत उन लोगों के लिए करारा तमाचा है जो लोकतंत्र की हत्या करना चाहते हैं और इस देश में तानाशाही लाना चाहते हैं."

अरविंद केजरीवाल को 1 जून तक 21 दिनों के लिए अंतरिम जमानत मिली है. शीर्ष कोर्ट ने उन्हें यह राहत सिर्फ प्रचार के लिए दी है. और वे इस मौके का लाभ उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे. भाजपा के 'मोदी की गारंटी' शीर्षक वाले चुनावी वादों के जवाब में वे भी 'केजरीवाल की 10 गारंटी' लेकर आए हैं. वे मुफ्त बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा और भ्रष्टाचार पर नकेल जैसे आप के पुराने दावों को ही नए सिरे से आगे बढ़ा रहे हैं. आप प्रमुख दिल्ली में हर दिन कई रैलियां कर रहे हैं. उन्होंने कुरुक्षेत्र (हरियाणा) में भी प्रचार किया, जहां पार्टी ने अपना एकमात्र उम्मीदवार उतारा है. पंजाब पर खास नजर रखते हुए वे ज्यादातर रैलियों में पंजाब के सीएम भगवंत मान को अपने साथ ही रखते हैं.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी स्थित सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज के प्रोफेसर राजर्षि दासगुप्ता की मानें तो केजरीवाल पलटवार के जरिए भाजपा के लिए मुश्किलें बढ़ाने के साथ स्थानीय स्तर पर नैरेटिव बनाने-बिगाड़ने की कुव्वत रखते हैं, जो भगवा पार्टी पर भारी पड़ सकती है. इसका असर दिल्ली के बाहर भी दिखाई दे सकता है, खासकर हिंदी पट्टी के अन्य राज्यों में, जो "अब 2019 की तरह भाजपा के प्रति झुकाव नहीं दर्शा रहे." दासगुप्ता बताते हैं, "केजरीवाल और आप की अहमियत सामाजिक कल्याण पर केंद्रित शासन का वैकल्पिक मॉडल पेश करने के दावे में निहित है. इस तरह के विकल्पों का सामने आना केंद्र सरकार की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है क्योंकि अभी तक वह इसी बात को भुना रही थी कि मोदी का कोई विकल्प नहीं है."

और विकल्प बिल्कुल वैसा है जैसा केजरीवाल दावा कर रहे हैं. जमानत पर बाहर आते ही उन्होंने कथित तौर पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राउज एवेन्यू स्थित पार्टी कार्यालय के समक्ष जुटी भीड़ से अपने पहले संबोधन में कहा, "4 जून को इंडिया ब्लॉक की सरकार केंद्र की सत्ता में आएगी. आप इसका हिस्सा होगी...मैं पूरे देश का दौरा करूंगा और तानाशाही के खिलाफ अपने देश को बचाने के लिए संघर्ष करूंगा. मेरे खून का एक-एक कतरा मेरे देश के नाम कुर्बान है." उनके दावे में दम है और समय भी एकदम सही है. लेकिन क्या इतना ही काफी होगा? यह तो मतदाताओं के पत्ते खोलने के बाद ही पता चल पाएगा.

- अभिषेक जी. दस्तीदार

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