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प्रधान संपादक की कलम से

उत्तर प्रदेश में 20 फीसद से ज्यादा मुस्लिम वोटों वाली 23 लोकसभा सीटें हैं. 2009 में भाजपा ने उनमें से महज तीन जीतीं, बाकी 20 अन्य चार पार्टियों में बंट गईं

इंडिया टुडे कवर: किधर जाएंगे मुसलमान
इंडिया टुडे कवर: किधर जाएंगे मुसलमान
अपडेटेड 31 मई , 2024

- अरुण पुरी

मुसलमान भारत का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय हैं, जो आबादी के 14 फीसद हैं. चुनावी राजनीति की बात करें तो भारत के 543 में 86 लोकसभा क्षेत्रों में उनकी आबादी कम से कम 20 फीसद है. इनमें से भी 16 में उनकी हिस्सेदारी 50 फीसद से ज्यादा है. असर की यह मेहराब 12 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में फैली है. मुसलमानों की सर्वाधिक हिस्सेदारी वाले चार राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और बिहार में कुल 210 सीटें हैं और इसलिए वे यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि नरेंद्र मोदी की अगुआई वाला निजाम सत्ता में लौट सकता है या नहीं. 

यह विश्लेषण काफी हद तक मान लिया गया था कि 2014 और 2019 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिले प्रचंड बहुमतों ने मुसलमानों की सामूहिक मतदान शक्ति को अप्रासंगिक बना दिया. आकड़ों से पता चला कि इन चुनावों में हिंदू वोट भाजपा के पीछे गोलबंद हो गया, लेकिन मुस्लिम वोट हर राज्य में बहुत-से विपक्षी दलों में बंट गया, जिससे नतीजों पर असर डालने की उनकी ताकत काफी कम हो गई.

नतीजा यह हुआ कि मुसलमानों के कम समर्थन के बावजूद भाजपा ने 86 'मुस्लिम सीटों' में से 2014 में 38 और 2019 में 36 जीत लीं—दोनों बार 2009 में जीती अपनी 15 सीटों से दोगुनी से भी ज्यादा. मसलन, उत्तर प्रदेश में 20 फीसद से ज्यादा मुस्लिम वोटों वाली 23 लोकसभा सीटें हैं. 2009 में भाजपा ने उनमें से महज तीन जीतीं, बाकी 20 अन्य चार पार्टियों में बंट गईं. मगर 2014 में भाजपा ने इन 23 में से 22 सीटें जीत लीं. यहां तक कि 2019 में भी, जब दो मुख्य विपक्षी पार्टियों की ताकत साथ आ गई, मुसलमानों के वोटिंग पैटर्न में बिखराव जारी रहने की वजह से उन 22 में से केवल छह सीटें भाजपा के हाथ से निकलीं.

अलबत्ता, 2019 के आम चुनाव के बाद हुए अध्ययनों से पता चलता है कि मुस्लिम समुदाय की तरफ से एकजुट और रणनीतिक मतदान की दिशा में निश्चित बदलाव आया है. उनका तकरीबन अचूक समर्थन भाजपा का मुकाबला करने में समर्थ पार्टी या गठबंधन को मिल रहा है. हाल के विधानसभा चुनावों में मुसलमानों के वोटिंग पैटर्न का विकासशील समाज अध्ययन केंद्र (सीएसडीएस) की तरफ से किया गया विश्लेषण अहम जानकारी सामने लाता है.

2020 में बिहार में करीब 77 फीसद मुस्लिम वोट महागठबंधन के खाते में गया. पश्चिम बंगाल के 2021 के चुनावों में करीब 75 फीसद तृणमूल कांग्रेस के हक में गया, जो 2016 के 51 फीसद से ज्यादा था. इसी तरह 2022 में 79 फीसद उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गए, जो 2017 के 46 फीसद से ज्यादा थे. 2024 के चुनाव में भी एकजुट मतदान के इस रुझान के जारी रहने की पूरी संभावना है.

इस गोलबंदी की वजहें समझना कोई दूर की कौड़ी नहीं, खासकर इस युग में जो राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा और सभी क्षेत्रों में हिंदुत्व के आख्यान के दबदबे का प्रतीक बन गया है. नीतिगत स्तर पर नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) से जुड़े मोदी सरकार के कदमों को लेकर आशंकाएं रही हैं. इसके अलावा, अंतर-सामुदायिक रिश्ते तब और बिगड़ जाते हैं जब वे मॉब लिंचिंग की घटनाएं लगातार होते देखते हैं.

इससे उत्पन्न पीड़ा और अलगाव की भावना मतदान की पसंद को साफ प्रभावित कर रही है. मसलन, सीएए लागू होने से भाजपा को पश्चिम बंगाल के हिंदू-शरणार्थी-बहुल सीमावर्ती जिलों में अपना वोट आधार मजबूत करने में भले मदद मिली हो, पर इसका यह भी नतीजा हुआ कि मुस्लिम वोट ममता बनर्जी और टीएमसी के पीछे लामबंद हो गए.

इसके बिना शायद वे टीएमसी और कांग्रेस-वाम संयुक्त मोर्चे में बंट जाते, क्योंकि इंडिया गठबंधन के सहयोगी दल राज्य में सीटों के बंटवारे पर राजी नहीं हो सके. महाराष्ट्र और खासकर मुंबई में मुसलमान अपने पुराने कट्टर दुश्मन की विरासत संभाल रही पार्टी शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट की तरफ खिंच रहे हैं, जो भाजपा व उसके सहयोगी दलों को हराने के लिए ज्यादा मजबूत दावेदार मालूम देती है.

मुस्लिम वोट पाने की कोशिश करते हुए राजनैतिक दल अक्सर दोहरी नीति अपनाते हैं. विपक्षी दल एक किस्म की राजनैतिक शरण उन्हें देते हैं—जैसे कांग्रेस का 'मोहब्बत की दुकान' का नारा. मगर वे सब मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या घटाते भी जा रहे हैं, इस सोच के साथ कि उनकी वजह से हिंदू वोट दूर हो जाएंगे और जवाबी गोलबंदी का फायदा भाजपा को मिलेगा. इस बार कांग्रेस की सूची में उनकी हिस्सेदारी 35 से घटकर 19 पर आ गई, क्योंकि वह 421 के मुकाबले महज 330 सीटों पर लड़ रही है. मगर इंडिया की तमाम दूसरी बड़ी पार्टियों ने कुल महज 13 मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए हैं.

भाजपा हिंदुत्व के पक्ष में दोटूक खड़ी होते हुए रणनीतिक समायोजन भी करती है. पहले चरण के मतदान में वोटरों की संख्या में साफ गिरावट के दो दिन बाद 21 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पूर्ववर्ती डॉ. मनमोहन सिंह का 2006 का वह बयान निकाल लिया जिसमें उन्होंने कहा था कि अल्पसंख्यकों का संसाधनों पर पहला अधिकार होना चाहिए. राजस्थान के बांसवाड़ा में उसी भाषण में मोदी ने मंगलसूत्र वाली मशहूर बात भी कही. यह वॉल्यूम के बटन को अप्रत्याशित ढंग से घुमा देना था और यह मुसलमानों को हाशिए से उठाकर सीधा केंद्र में ले आया.

जबानी लापरवाही की अगली कोशिश 7 मई को राजद के पितृपुरुष लालू यादव ने की, जब मोदी के इस आरोप का जवाब देते हुए कि कांग्रेस एससी/एसटी/ओबीसी की कीमत पर मुसलमानों को आरक्षण दे रही थी, उन्होंने कहा, "रिजर्वेशन तो मिलना चाहिए मुसलमानों को, पूरा." जब तक वे कैफियत देते कि कसौटी हमेशा 'सामाजिक पिछड़ापन' है और धर्म आधार नहीं हो सकता, उन्होंने आग लगाने के लिए भाजपा को और घी तो दे ही दिया था.

उधर, मुस्लिम जन्म दर को लेकर चल रही समानांतर बहस ने आग को सुलगाए रखा, पर वहीं गौर करने वाली बात यह थी कि मोदी बाद में ज्यादा राजनेता-सरीखे सुर में लौट आए और इस बात से इनकार कर दिया कि जिनके ज्यादा बच्चे हैं वाली उनकी टिप्पणी मुसलमानों के बारे में थी. उन्होंने 14 मई को कहा कि वे कभी हिंदू-मुसलमान नहीं करते सांप्रदायिक राजनीति के लिए लोकप्रिय शब्दावली और जिस दिन वे ऐसा करेंगे, सार्वजनिक जीवन के योग्य नहीं रह जाएंगे. मगर इस पर उनका जोर बना रहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं होने देंगे.

इस हफ्ते हमारी आवरण कथा के लिए एग्जीक्यूटिव एडिटर कौशिक डेका मौजूदा आम चुनाव के बीच मुसलमानों से जुड़े समूचे सियासी फलक की पड़ताल कर रहे हैं. हित और दांव हर जगह और हरेक के लिए ऊंचे हैं, उस समुदाय के लिए, जो अपने को घटते राजनैतिक रुतबे के दौर में पा रहा है. समूचे गणराज्य के लिए भी, जो अल्पसंख्यकों के प्रति अपने नजरिए से परिभाषित होगा.

- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह) 

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