- अरुण पुरी
भारत के संविधान ने हालांकि गणतंत्र की शुरुआत में ही महिलाओं को समान मतदान का अधिकार दे दिया था, फिर भी हमारा समाज लोकतंत्र की प्रक्रियाओं में समान लैंगिक भागीदारी में अक्सर अड़चनें डालता है. मगर इसमें आमूलचूल बदलाव आ रहा है. इसकी कई वजहें हैं, मसलन महिला साक्षरता की बढ़ती दर, पंचायती राज स्तर पर लैंगिक बराबरी को ज्यादा जगह मिलना, स्वयं सहायता समूह आंदोलन और हाल के वर्षों में मोबाइल क्रांति के चलते ज्यादा सूचनाओं की उपलब्धता.
इसीलिए बीते दशक के दौरान चुनावी प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी के बारे में ऐसे आंकड़े सामने आए हैं जो सचमुच ऐतिहासिक हैं. राष्ट्रीय चुनावों में पहली बार 2019 में पुरुष मतदाताओं के मुकाबले कहीं ज्यादा फीसद महिला मतदाताओं ने मताधिकार का प्रयोग किया. पुरुषों के महज 67.02 फीसद के मुकाबले 43.85 करोड़ पंजीकृत महिला मतदाताओं में से 67.18 फीसद ने वोट दिए. यह 0.16 फीसद अंकों का नन्हा-सा फासला नारी जाति के लिए बड़ी छलांग थी.
आंकड़ों से जमीन पर आ रहे क्रांतिकारी बदलाव का खुलासा होता है. राष्ट्रीय परिदृश्य से हटकर राज्यों के चुनावों पर नजर डालें तो आप पाते हैं कि भागीदारी अपवाद नहीं बल्कि सतत रुझान है. 2023 तक बीते पांच साल में जिन 23 बड़े राज्यों में चुनाव हुए, उनमें से 18 में महिलाएं ज्यादा तादाद में वोट देने के लिए निकलकर आईं. हमारे मतदाताओं में लैंगिक अनुपात, या पंजीकृत मतदाताओं में प्रति 1,000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या भी तेजी से बढ़कर समान स्तर पर पहुंच रही है:
इस चुनाव में महिला मतदाताओं में 7.5 फीसद की बढ़ोतरी हुई, जिससे उनकी कुल संख्या अब 47.15 करोड़ पर पहुंच गई है. पंजीकृत पुरुष मतदाता महज पांच फीसद बढ़कर 49.72 करोड़ हुए हैं. इसके साथ ही मतदाता लैंगिक अनुपात 2019 के 926:1,000 से बढ़कर इस चुनाव में 948:1,000 पर पहुंच गया है. इसमें 85 लाख पहली बार वोट डालने वाली महिलाएं भी हैं (जो मतदान करने की उम्र में पहुंच गई हैं).
मताधिकार में महिलाओं की इस ज्यादा हिस्सेदारी का चुनावी नतीजों पर सीधा असर पड़ा है. दरअसल, भारतीय राजनीति पर नरेंद्र मोदी के निजाम के दशक भर पुराने दबदबे का कुछ श्रेय मतदान में महिलाओं की पसंद को दिया जा सकता है. चुनाव सर्वे एजेंसी एक्सिस-माई इंडिया के वोटिंग पैटर्न के विश्लेषण के मुताबिक, 2019 के आम चुनाव में महज 44 फीसद पुरुषों के मुकाबले 46 फीसद महिला मतदाताओं ने भाजपा को चुना. यह मनुहार एकतरफा नहीं थी. एसबीआई रिसर्च के आंकड़ों से पता चलता है कि मोदी सरकार की केंद्रीय योजनाओं में भी महिलाओं की अच्छी-खासी हिस्सेदारी है. मुद्रा ऋणों का 68 फीसद जितना बड़ा हिस्सा महिलाओं को मिला है.
समूचे राजनैतिक फलक पर महिलाओं के हिसाब से ढाली गई नीतियां इस बात का ठोस सबूत हैं कि मतदाता मंडल के इस हिस्से की काफी मांग है. महिलाओं के वोटों को लुभाने के लिए कांग्रेस ने अपनी तरफ से गारंटियों की मुहिम छेड़ रखी है. उसके 2024 के घोषणापत्र के पांच हिस्सों में से एक 'नारी न्याय' है. इसके तहत दो वादे अलग दिखाई देते हैं.
पहला, महालक्ष्मी योजना के तहत हरेक गरीब परिवार की सबसे बड़ी महिला के बैंक खाते में सालाना 1 लाख रुपए का नकद हस्तांतरण, जिसका भुगतान मासिक किस्तों में किया जाएगा. दूसरा, केंद्र सरकार की सभी योजनाओं में महिलाओं के लिए 50 फीसद आरक्षण. जाहिर है, ग्रैंड ओल्ड पार्टी अच्छी तरह वाकिफ है कि उसके हक-आधारित अभियान ने ही पिछले साल कर्नाटक और तेलंगाना जीतने में उसकी मदद की थी. उसमें महिलाओं के लिए मुफ्त बस टिकट सरीखे सीधे-सादे उपाय शामिल थे.
यह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनकल्याण नीति की काफी याद दिलाता है, जिन्होंने 2000 के दशक के मध्य में कक्षा 8 पास कर चुकी स्कूल छात्राओं को साइकिल खरीदने के लिए पैसा देकर यह सिलसिला शुरू किया था. फिर कई राज्यों ने इस योजना की नकल की. तब से अब तक भारत तेजी से आर्थिक गतिशीलता के अगले पड़ाव पर पहुंच रहा है.
महिलाओं तक पहुंच और विस्तार के इस मामले में भी अक्सर राज्य सरकारों ने बढ़त ली है. मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अत्यंत लोकप्रिय लाडली बहन योजना ने पिछले साल उनके राज्य के विधानसभा चुनावों का नतीजा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाई. इस बार भाजपा के घोषणापत्र में दी गई 'मोदी की गारंटियों' में तीन करोड़ ग्रामीण महिलाओं को लखपति दीदी बनाकर ताकत देने की जबरदस्त योजना शामिल है.
इस हफ्ते हमारी आवरण कथा के लिए एग्जीक्यूटिव एडिटर मनीषा सरूप और सीनियर एसोसिएट एडिटर जुमाना शाह ने मौजूदा चुनाव का लैंगिक लेखा-जोखा लिया. इंडिया टुडे के संवाददाताओं ने देश भर की महिलाओं, युवा और बुजुर्ग, ग्रामीण और शहरी, कामकाजी और गृहणी, से बात करके पता लगाया कि वे क्या चाहती हैं. उन्हें पता चला कि वे एक के बाद एक योजनाओं से कहीं ज्यादा चाहती हैं. रोजी-रोटी के मुद्दे उनके लिए भी उतने ही मायने रखते हैं जितने पुरुषों के लिए.
शिक्षा और रोजगार सुलभ न होने की थीम उनकी बातचीत में बारंबार आती है और ऊंची कीमतों की चुभन भी. मतदान के प्रतिशत में लैंगिक फासले का घटना बेशक स्वागतयोग्य है, पर अन्य हर चीज में लैंगिक फासला भीषण हकीकत बना हुआ है. महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी निराशाजनक ही है. 17वीं लोकसभा में वे महज 15 फीसद थीं. इस चुनाव में भी तीन चरणों का मतदान पूरा होने तक कुल 4,175 उम्मीदवारों में से महज 358 यानी दुखद रूप से 8.6 फीसद महिलाओं ने चुनावी मैदान में कदम रखा. हकीकत बनने के लिए महिला सशक्तीकरण को महज घोषित इरादे से कहीं ज्यादा होना होगा.
इस मामले में मोदी सरकार का ऐतिहासिक संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 बड़ा बदलाव लाने वाला कानून है. यह लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करता है. महिला राजनीतिज्ञों और कार्यकर्ताओं की दशकों पुरानी मांग को पूरा करते हुए लागू होने पर यह भारतीय राजनीति के व्याकरण और शब्दावली को नए सिरे से गढ़कर रख देगा.
कांग्रेस भी इसमें तेजी लाने का वादा कर रही है. साफ है कि तमाम आपसी कटुता और स्पर्धा के बीच मौन राजनैतिक सर्वानुमति है. ऐसी सर्वानुमति जो महिलाओं की राजनैतिक भागीदारी की केंद्रीयता को मानती है और यह भी कि भारत को महान लोकतंत्र के रूप में स्थापित करने की खातिर यह क्यों अनिवार्य है.
- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

