- अरुण पुरी
अमेरिकी राजनीति में वहां के 50 में से ज्यादातर राज्य दो बड़ी पार्टियों में से एक या दूसरी के साथ होते हैं, लेकिन आम तौर पर करीब पांच राज्य ऐसे हैं जहां दोनों पार्टियों को तकरीबन बराबर-बराबर जनसमर्थन हासिल है और इसलिए वहां जो जीतता है उससे राष्ट्रपति चुनाव का कुल नतीजा तय होता है.
इन राज्यों को 'स्विंग' यानी निर्णायक राज्य कहा जाता है. भारत में दशक भर पहले इस किस्म की लड़ाइयां मुख्यत: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के बीच हुआ करती थीं. मगर 2014 और फिर 2019 में भाजपा ने वह लड़ाई निर्णायक रूप से जीत ली.
जिन 195 सीटों पर उनमें सीधी लड़ाई होती थी, भाजपा ने उनमें से 180 या 92 फीसद जीत लीं. ऐसे में तार्किक निष्कर्ष यही है कि 2024 में भाजपा को चुनौती देने की जिम्मेदारी तीन राज्यों महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और बिहार के स्थानीय क्षत्रपों पर आ गई है. इन तीनों राज्यों में लड़ाई तीखी, तोड़फोड़ वाली और करीबी है. प्रत्येक के अपने अलग रंग हैं.
कुल 130 सीटों के साथ ये स्विंग स्टेट राजनैतिक वर्चस्व के लिए करो-या-मरो की इस लड़ाई में निर्णायक मोर्चे की तरह जान पड़ते हैं. इन ताकतवर क्षेत्रीय नेताओं के ऊपर वजूद का खतरा मंडरा रहा है और वे केंद्र में लगातार तीसरे बहुमत की तरफ भाजपा की अबाध कूच को रोकने के लिए पूरी ताकत झोंक देंगे.
हालांकि सबसे ज्यादा सीटें (80) उत्तर प्रदेश में हैं, पर यह राजनैतिक महाद्वीप पहले ही भाजपा की लौह पकड़ में आ चुका है. सीटों की तादाद के लिहाज से ही उसके बाद ये तीनों राज्य हैं. महाराष्ट्र के लंबे-चौड़े नक्शे में 48 निर्वाचन क्षेत्र हैं, जहां इस बार पांच चरणों में चुनाव करवाए जा रहे हैं.
पश्चिम बंगाल में भी काफी ज्यादा 42 सीटें हैं, और बिहार में 40 हैं. दोनों में चुनाव सात चरणों में फैले हैं. यह समय-सारणी ही जाहिर करती है कि यहां लड़ाई खुली है और भाजपा को चुनौती देने के काबिल है. साफ तौर पर ये ऐसी जगहें हैं जहां सत्तारूढ़ पार्टी हड़बड़ी करना नहीं चाहती थी. खासकर अपने नए गठबंधनों के साथ नाटकीय राजनैतिक प्रयोगों के बाद तो और भी नहीं.
महाराष्ट्र में भाजपा ने 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद से ही शिवसेना की अगुआई में राज्य में हुकूमत कर रहे मजबूत गठबंधन महा विकास अघाड़ी (एमवीए) को टुकड़े-टुकड़े कर दिया. जून 2022 में उसने एकनाथ शिंदे और उनके समर्थक शिवसेना के 39 विधायकों से विद्रोह करवाकर एमवीए की सरकार को गिरा दिया. भाजपा का मकसद साफ था, चुनाव की तैयारी करते हुए एक बेहद अहम राज्य की कमान विपक्ष के हाथों से छीनना. साल भर बाद भाजपा एमवीए के एक और घटक राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को तोड़कर अजित पवार को उप-मुख्यमंत्री बनाकर ले गई.
अपना राष्ट्रीय लक्ष्य हासिल करने के लिए यह जरूरी है कि भाजपा महाराष्ट्र में अपना विस्तार करते हुए एनडीए की 2019 की 41 सीटों की हिफाजत करे. पिछली बार भाजपा ने 25 सीटों पर चुनाव लड़ा और उनमें से 23 जीतकर सबसे अच्छा स्ट्राइक रेट हासिल किया था.
इस बार महायुति के सहयोगी दलों में उसने 28 सीटों का सबसे बड़ा हिस्सा ले लिया है. उन्हें अधिकतम पर पहुंचाने के अलावा अपने कमजोर साथियों को भी साथ लेकर चलना उतना ही जरूरी है. सहानुभूति की लहर के साथ एमवीए के लिए भाजपा को मात देना महज चुनावी लक्ष्य से कहीं ज्यादा है. मराठा सरदारों, उद्धव ठाकरे और शरद पवार के लिए यह राजनैतिक वजूद बचाने की लड़ाई से जरा भी कम नहीं है.
बंगाल की गहन और प्रचंड लड़ाई भी तनाव भरी है. करीब 13 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद भी अदम्य ममता बनर्जी थकान और शिथिलता की झलक नहीं आने देतीं. भ्रष्टाचार के आरोप उनके लिए बड़ा बोझ हैं.
बीरभूम के कथित पशु-तस्करी के रैकेट या संदेशखाली के कथित यौन शोषण सरीखे मामले लोगों के सामने आते हैं, तो अराजकता की कगार पर पहुंच चुकी हुकूमत चलाने के आरोप हवा में गूंजते हैं. भाजपा ने 2014 में यहां की 42 में से दो सीटों से अपने को उछालकर पांच साल बाद 18 सीटों की काबिले तारीफ ऊंचाई पर पहुंचा दिया था.
उन्हें कायम रखना जरूरी है और इसके लिए भाजपा ने सब कुछ झोंक दिया है, जिसमें 30 लाख की तादाद वाले मतुआ समुदाय को लुभाने के लिए नागरिकता संशोधन कानून भी शामिल है. मगर ममता राज्य के 27 फीसद मुस्लिम मतदाताओं के मन में बढ़ते खतरे की धारणा बिठाने और जवाबी ध्रुवीकरण करने के लिए ठीक इसी कानून का फायदा उठा रही हैं.
'इंडिया' ब्लॉक में अजीबो-गरीब फूट से मामले और उलझ गए हैं. वामपंथी-कांग्रेस ममता से लड़ रहे हैं, पर इसका अनपेक्षित सुखद नतीजा उनके लिए यह होगा कि सत्ता-विरोधी वोट बंट जाएंगे.
बिहार से उठते अस्तित्व के सवाल भी कम विकट और धारदार नहीं हैं. बात सिर्फ इतनी नहीं कि एनडीए ने 2019 में 40 में से 39 सीटें जीती थीं और इनका कम होना गवारा नहीं कर सकती. अपनी दिलचस्प शख्सियत के साथ 'इंडिया' के पटकथा लेखक और खुद अपनी ही कहानी से भाग खड़े हुए नीतीश कुमार भी हैं.
इस जनवरी में उन्होंने अपने जनता दल-यूनाइटेड या जद (यू) और तेजस्वी यादव की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के बीच वह ताकतवर गठबंधन तोड़ दिया जो अगस्त, 2022 से हुकूमत करता आ रहा था और एक बार फिर भाजपा के साथ हाथ मिला लिया. उन्होंने राज्य में अपना दबदबा दोबारा हासिल करने में भाजपा की मदद भले की हो, पर ऐसा करते हुए बिहार के मुख्यमंत्री ने खुद को ही शक्तिहीन कर लिया लगता है.
चुनाव पंडितों का कहना है कि उनके टूटने से एनडीए का एक कमजोर पहलू उघड़ गया, क्योंकि कड़े मोलभाव के बाद भाजपा की 17 के मुकाबले जद (यू) को 16 सीटें दी गईं. अगर भाजपा अपनी सीटें बरकरार रखती है, तब भी आक्रामक तेवर दिखाते तेजस्वी के खिलाफ नीतीश की सीटें बचाना कठिन काम होगा. हालांकि राष्ट्रीय मतदान राजनैतिक महत्वाकांक्षा के लिहाज से अब भी मोटे तौर पर प्रांतीय दायरे में सिमटे तेजस्वी सरीखे क्षत्रप के बजाए राष्ट्रीय पार्टी के पक्ष में हो सकता है.
तीनों राज्यों को ऐसी जगहों की तरह देखिए जहां क्षेत्रीय नेताओं की आकांक्षाएं 2019 की अपनी उपलब्धि के पार जाने की भाजपा की बलवती इच्छा से टकरा रही हैं. हमारी आवरण कथा का पैकेज, जिसे हमारे राज्य ब्यूरो ने एक धागे में पिरोया है, आपके सामने इसकी सभी बारीकियों का अंबार लगा रहा है. जवाब तो बेशक 4 जून को मिलेगा. अंतिम जज तो आखिरकार लोकतंत्र ही है.
- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

