- अरुण पुरी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिक पहचान बतानी हो तो लोग आम तौर पर व्यक्तित्व के संदर्भ में ही बात करते हैं. करिश्माई शख्सियत सरीखे पहलू जो तमाम दूसरी चीजों पर हावी हैं. लेकिन शासन व्यवस्था अपनी तरह के व्यक्तित्व गढ़ती है, जो किसी नेता का सच्चा पैमाना होते हैं.
फरवरी में इंडिया टुडे के छमाही 'देश का मिज़ाज सर्वे' से पता चला कि आर्थिक वृद्धि के अलावा बेरोजगारी और महंगाई दो मुद्दे हैं जिन्हें लेकर भारत की जनता सबसे ज्यादा फिक्रमंद है. इन दिनों जब सात चरणों के आम चुनाव के लिए मतदान चल रहा है, बहुतेरा राजनैतिक विमर्श आजीविका से जुड़े इन दो मुद्दों के इर्द-गिर्द केंद्रित है.
तीसरा कार्यकाल पाने के लिए मोदी ने भविष्य की दूरदृष्टि यानी 2047 तक देश को पूरी तरह विकसित राष्ट्र में बदलने का लक्ष्य सामने रखा है. सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 'मोदी की गांरटी' नारे को चुनाव प्रचार की अपनी टेक और मुख्य मंत्र के तौर पर अपना लिया है.
वह अर्थव्यवस्था को संभालने के प्रधानमंत्री के 10 साल के ट्रैक रिकॉर्ड को नतीजे देने की उनकी क्षमता के प्रमाण के तौर पर पेश कर रही है. वहीं विपक्ष की आलोचनाओं में बेरोजगारी और महंगाई सबसे अव्वल और उनके अभियान के वादों का मूलमंत्र हैं.
बयानों और लफ्फाजियों की रिपोर्ट भर देने के बजाए हमने आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार के 10 साल के कामकाज का तथ्यात्मक आकलन करने का फैसला किया. इसे मोदीनॉमिक्स यानी मोदी का अर्थशास्त्र कहा जाता है.
विशेषज्ञों की राय में इसका लुब्बोलुबाब राजकोषीय समझदारी और निवेश आधारित वृद्धि है, जिसमें लक्ष्यबद्ध और टेक्नोलॉजी के जरिए जनकल्याणवाद के जोरदार मसालों का तड़का लगा है. यहीं मोदी की राजकीय शख्सियत के प्रमुख पहलू उभरते हैं. तत्काल तुष्टि के प्रलोभन से बचते हुए उनकी दूरदृष्टि का झुकाव निर्णायक तौर पर लंबे वक्त की तरफ दिखता है.
कड़वी गोली निगलने की यह क्षमता हमने कोविड के झटके के दौरान और बाद में भी देखी. भारत की अर्थव्यवस्था उस वक्त भी न केवल टिकी रही बल्कि और धूमधाम से उबरकर आई जब दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ा रही थीं.
वित्त वर्ष 2024 में देश की जीडीपी के शानदार 7.6 फीसद की दर से बढ़ने का अनुमान है, जिसने उसे दुनिया की सबसे तेज बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना दिया. यह इत्तेफाकन नहीं हुआ. देश इस राह पर सीधे-सीधे मोदी के उन सोचे-समझे (और कठिन) फैसलों की बदौलत चल सका जिसमें उन्होंने महामारी से लड़ते वक्त फिजूलखर्ची के बजाए आर्थिक तौर पर अनुदार या रूढ़िवादी होना चुना. उन्होंने दहशत से पैदा वह गलती नहीं की जो पश्चिमी देशों ने भारी-भरकम प्रोत्साहन पैकेज लाकर की थी.
ऊपरी सुधार के बजाए बुनियाद को सुरक्षित करने में इस यकीन की बदौलत ही मोदी ने बुनियादी ढांचे के निर्माण पर जोर दिया. रेलवे पर पूंजीगत खर्च 2014 से हर साल तिगुना होता गया, जिसके नतीजतन हैरतअंगेज 25,871 किमी नई पटरियां बिछाई गईं, जबकि 37,000 किमी से ज्यादा का विद्युतीकरण किया गया. ऐसे प्रभावशाली आंकड़े आपको चौतरफा दिखते हैं, चाहे वह राजमार्ग हों, शिपिंग या हवाई रास्ते. बुनियादी ढांचे पर यह जोर इस गहरे आंतरिक विश्वास से आता है कि इससे नौकरियां मिलती हैं और आर्थिक वृद्धि भी तेज होती है.
अलबत्ता जीडीपी के आंकड़े सम्मानजनक होते हुए भी हरेक विश्लेषण अंग्रेजी के 'के' अक्षर के आकार की वृद्धि की तरफ इशारा कर रहा है: अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई, गरीबों की आमदनी बढ़ाने के लिए कुछ नहीं, और ग्रामीण मजदूरी में भी गिरावट.
सरकारी आंकड़े कोविड के बाद बेरोजगारी के आंकड़ों में गिरावट दिखा रहे हैं, वहीं इन आंकड़ों की गहराई में जाने पर बारीकियां सामने आती हैं. काम में लगे सभी लोगों में 57 फीसद स्वरोजगार कर रहे हैं. कई नौकरियां अनौपचारिक क्षेत्र में हैं, जो असुरक्षित भी हैं और बेरोजगारी का संकेत भी. करीब 21.8 फीसद कैजुअल लेबर हैं. भारत के कार्यबल का महज 20.9 फीसद औपचारिक नौकरियों के दायरे में आता है.
इस पैटर्न पर ज्यों ही ध्यान गया और आलोचनाएं होने लगीं, खासकर महामारी के बाद, तो मोदी ने दुश्वारियां कम करने और एक बड़ी आबादी को गरीबी के मुंह में जाने से बचाने के लिए जनकल्याण के उपायों पर जोर दिया. मसलन, मुफ्त अनाज योजना, जिसके दायरे में 81 करोड़ गरीब-गुरबे हैं. मगर यह इस बात का भी सबूत है कि पिरामिड के तल पर हालात कितने खौफनाक हैं.
आम लोगों के हाथों में अतिरिक्त धन की कमी से मांग कम हो जाती है, उत्पादन के लिए प्रोत्साहन नहीं रह जाता, और इसलिए निवेशकों में जोखिम लेने की भूख मंद पड़ जाती है. कॉर्पोरेट टैक्स में कटौतियों के बावजूद निजी निवेश नहीं बढ़ पाने से आर्थिक गतिविधियां सुस्त हैं. यही भारतीय अर्थव्यवस्था की विकट पहेली है और सरकार की परेशानी भी.
साथ ही, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का विनिवेश एयर इंडिया के बाद धीमा पड़ा है, और मैन्युफैक्चरिंग जीडीपी के 15 फीसद पर ठहरी हुई है. उधर, वित्त वर्ष 2022-23 के साथ खत्म पांच वर्षों की अवधि में कृषि की वृद्धि दर 4 फीसद के औसत पर सुस्त बनी रही, और वित्त वर्ष 2023-24 में गिरकर 1.8 फीसद पर आ गई.
मौसम के डावांडोल मिजाज की वजह से अगले साल भी एक फीसद से कम वृद्धि का अनुमान है, जिससे जीडीपी पर गहरा प्रतिकूल असर बने रहने का अंदेशा है. भूराजनैतिक तनावों की वजह से बाहरी माहौल भी अनुकूल नहीं रहा, और भूमंडलीकरण के उलटने के रुझानों का मतलब यह है कि निर्यात पर्याप्त जोश से नहीं बढ़ रहे हैं और 'चाइना प्लस वन' रणनीति की तरफ दुनिया के रुख का पूरा फायदा नहीं उठा पा रहे हैं.
इसके अलावा समझदार राजकोषीय प्रबंधन और जीएसटी के जाल के बढ़ते फैलाव से अर्थव्यवस्था के औपचारिक बनने की गति बढ़ी है और सरकारी राजस्व में इजाफा हुआ है. अलबत्ता सरकार को उत्साह और विश्वास बनाए रखना चाहिए क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य का दृष्टिकोण ज्यादातर मामलों में सकारात्मक दिख रहा है.
इस अंक में हम मोदीनॉमिक्स की कामयाबियों और चूकों का समग्र नक्शा पेश कर रहे हैं, जो हमारे सारे ब्यूरो ने मिलकर संजोया है, ताकि मतदाता तमाम हो-हल्ले और हुल्लड़ के बीच से मतलब की बात समझकर फैसला कर सकें.
हालांकि अंतिम जज तो आखिरकार लोकतंत्र ही है.
- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

