scorecardresearch

छत्तीसगढ़ में भाजपा के ट्रंप कार्ड को कैसे चुनौती दे रही है कांग्रेस?

टीम मोदी विधानसभा चुनाव में हासिल जीत की लय के भरोसे है लेकिन चतुराई से प्रत्याशियों का चयन शायद कांग्रेस का सूपड़ा साफ न होने दे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 8 अप्रैल को बस्तर में एक जनसभा में
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 8 अप्रैल को बस्तर में एक जनसभा में
अपडेटेड 9 मई , 2024

पांच साल पहले, 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पूरे उत्साह से मैदान में उतरी थी, क्योंकि उससे पहले 2018 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने शानदार सफलता हासिल की थी और 90 में से 68 सीटें कब्जा कर राज्य में करीब डेढ़ दशक बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सत्ता से बेदखल कर दिया था. उसे लोकसभा चुनाव में भी जीत अपनी मुट्ठी में लग रही थी. लेकिन नतीजे एकदम उलट रहे, लोकसभा चुनाव में भाजपा ने बाजी मारी और छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों में से नौ पर जीत दर्ज कराई.

अब, जबकि राज्य में 2024 के आम चुनावों के लिए तीन चरणों में मतदान होना है, अधिकांश लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि क्या इस बार भाजपा को पटखनी देकर कांग्रेस 2023 के विधानसभा चुनाव नतीजों के उलट शानदार प्रदर्शन कर पाएगी. विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 90 में से 54 सीटें हासिल की थीं. राजनैतिक विश्लेषकों की मानें तो कांग्रेस के लिए राह आसान नहीं होगी क्योंकि भाजपा के पास अभी भी उसका एक सबसे बड़ा हथियार बरकरार है जो कि 2019 में भी कांग्रेस को पछाड़ने में मददगार साबित हुआ था, और भाजपा के तरकश का यह तीर है - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में विशाल जनसमर्थन. फिर भी, कुछ लोगों का मानना है कि पीएम जैसे ट्रंप कार्ड के बावजूद कांग्रेस छत्तीसगढ़ में चुनावी दौड़ से बाहर नहीं है.

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा इंतजामों की खास जरूरत को ध्यान में रखकर ही राज्य में तीन चरणों में मतदान कराया जा रहा है. माओवादियों के गढ़ रहे बस्तर में 19 अप्रैल को वोट पड़े जबकि महासमुंद, राजनांदगांव और कांकेर में 26 अप्रैल को दूसरे चरण के दौरान मतदान होना है. मध्य और उत्तरी छत्तीसगढ़ की शेष सात सीटों पर 7 मई को मतदान होना है और वोटों की गिनती 4 जून को होगी. कांग्रेस ने चुनावी बिसात पर मोहरे काफी सोच-समझकर लगाए हैं.

पार्टी ने ऐसे उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है जो खासा सियासी दबदबा तो रखते ही हैं, जातीय समीकरणों के लिहाज से भी मुफीद हैं. राजनैतिक विश्लेषक और बिलासपुर हाइकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव कहते हैं, "अन्य राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ में भी पीएम मोदी ही भाजपा के लिए एकमात्र सबसे बड़े फैक्टर हैं. वहीं, कांग्रेस मजबूत स्थानीय उम्मीदवारों पर दांव लगाने के साथ इस रणनीति पर आगे बढ़ रही है कि कुछ सीटों पर कड़ी प्रतिस्पर्धा होगी और जीत (भाजपा के लिए) पहले से तय वाली स्थिति नहीं रहेगी."

माना जा रहा है कि कांग्रेस खासकर बस्तर, कांकेर, राजनांदगांव, जांजगीर-चांपा और कोरबा जैसी सीटों पर भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकती है. लेकिन रायपुर, बिलासपुर, महासमुंद, दुर्ग, सरगुजा और रायगढ़ आदि सीटों पर भाजपा मजबूत स्थिति में नजर आ रही है. यह पूर्वानुमान कुछ हद तक 2019 के चुनावों के प्रदर्शन पर आधारित है जिसमें कांग्रेस ने बस्तर और कोरबा सीट जीती थी और कांकेर में उसे 6,914 वोटों के मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा था.

बस्तर में कुल मतदान 68.3 फीसद रहा, जहां वोटिंग के दिन गलती से ग्रेनेड फटने के कारण केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के एक कांस्टेबल की मौत हो गई और नक्सलियों के लगाए आइईडी में धमाके से सीआरपीएफ का एक सहायक कमांडेंट घायल हो गया. इस साल कांग्रेस ने बस्तर में पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री कवासी लखमा को मैदान में उतारा है. उनका मुकाबला भाजपा के नए चेहरे महेश कश्यप से है.

कांकेर में कांग्रेस ने दिवंगत कांग्रेस विधायक सत्यनारायण सिंह ठाकुर के बेटे बीरेश ठाकुर को उम्मीदवार बनाया है. 2019 के चुनाव में इसी सीट पर जीत हासिल करने में नाकाम रहे बीरेश पिछले पांच वर्ष से क्षेत्र में सक्रिय हैं और उन्हें सत्ता विरोधी लहर का फायदा होने की उम्मीद है. संभवत: इसी से मुकाबले के लिए भाजपा ने यहां भोजराज नाग को उतारा है, जिन्हें मौजूदा पार्टी सांसद मोहन मंडावी की जगह टिकट दिया गया है.

राजनांदगांव में कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को उतारा है. माना जा रहा है कि वे न केवल अपनी जाति यानी कुर्मी वोट बैंक साधने में सफल रहेंगे बल्कि 2018 से 2023 के बीच बतौर मुख्यमंत्री कृषि क्षेत्र के लिए की गईं विभिन्न पहल के बलबूते अन्य कृषक समुदायों का भी समर्थन हासिल करेंगे.

राजनैतिक हलकों में यह भी माना जा रहा है कि बतौर मुख्यमंत्री बघेल खासे लोकप्रिय रहे, फिर भी उनके नेतृत्व में पिछले साल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार दरअसल भाजपा के बेहतर चुनाव प्रबंधन और कांग्रेस की अंदरूनी कलह का नतीजा थी. राजनैतिक पर्यवेक्षकों का यह भी कहना है कि इस सीट से फिर उम्मीदवार बनाए गए भाजपा के मौजूदा सांसद संतोष पांडे को कुछ हद तक सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है.

इसके अलावा, कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की सूची काफी गहन मंथन के बाद सारे समीकरण ध्यान में रखकर तैयार की है. पार्टी ने प्रभावशाली साहू समुदाय के दो सदस्यों को मैदान में उतारा है जबकि भाजपा ने केवल एक को टिकट दिया है. इसको भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की विपक्षी दल की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. दरअसल, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में आने वाला साहू समुदाय पारंपरिक रूप से भाजपा का वोट बैंक है और माना जाता है कि 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत में इसने अहम भूमिका निभाई थी.

इसी तरह राज्य की आदिवासी आबादी में लगभग 55 फीसद हिस्सेदारी वाला गोंड समुदाय राज्य में सबसे बड़ा आदिवासी समूह है, जिसे भाजपा के टिकट बंटवारे में कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है. यहां तक, पार्टी ने अनुसूचित जनजाति (एसटी) के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित चार सीटों कांकेर, बस्तर, सरगुजा और रायगढ़ में गैर-गोंड आदिवासियों को मैदान में उतारा है. कांग्रेस इस फैक्टर को सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ भुनाने की पूरी कोशिश कर रही है (कांग्रेस ने सभी चार सीटों पर गोंड उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है). तो दूसरी तरफ, भाजपा अपने चुनाव अभियान में राज्य को पहला आदिवासी मुख्यमंत्री विष्णु देव साय देने का श्रेय लेने की कोशिश कर रही है.

भगवा पार्टी वोट पाने के लिए "2023 (विधानसभा चुनाव) के वादों को पूरा करने" का हवाला देने के साथ अपने जांचे-परखे हिंदुत्व और 'ईसाई धर्मांतरण’ कार्ड का भी इस्तेमाल कर रही है. जनवरी में अयोध्या में राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह वाले दिन कथित तौर पर मुसलमानों के हाथों हिंदू यादव समुदाय के युवक की हत्या की घटना को बार-बार याद दिलाया जा रहा है, खासकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार पंकज झा कहते हैं, "भाजपा विष्णु देव साय सरकार के सत्ता संभालने के 100 दिन के अंदर विधानसभा चुनाव के दौरान मतदाताओं से किए वादों को पूरा करने का मुद्दा उठा रही है, जिसमें 3,100 रु. प्रति क्विंटल पर धान की खरीद, पिछले दो वर्षों के बोनस का भुगतान (धान खरीद पर), महतारी वंदन योजना का शुभारंभ (जिसमें पात्र महिलाओं को प्रति माह 1,000 रु. का भुगतान किया जाता है) आदि शामिल हैं. राष्ट्रीय स्तर पर मोदी सरकार के पिछले 10 वर्ष में काम को रेखांकित किया जा रहा है." उन्होंने दावा किया, "अगर विपक्षी खेमे की बात करें तो उसे प्रधानमंत्री पद के लिए किसी विश्वसनीय विकल्प के अभाव और छत्तीसगढ़ में पिछले पांच वर्षों में कांग्रेस सरकार के दौरान भ्रष्टाचार की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी."

इस सबके बीच, कांग्रेस चुनावी रणनीति के मामले में भाजपा के ही नक्शेकदम पर चलती दिख रही है. 2023 के चुनाव से पूर्व भाजपा ने कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर प्रस्तावित महतारी वंदन योजना के लिए लोगों से फॉर्म भराने को कहा था. अब, कांग्रेस 2024 के अपने घोषणापत्र में महिलाओं के लिए घोषित एक लाख रुपए की वार्षिक योजना को लेकर यही तरकीब आजमा रही है.

छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला के मुताबिक, "वे सभी मुद्दे जो देश के अन्य राज्यों के लिए प्रासंगिक हैं, छत्तीसगढ़ के लिए भी प्रासंगिक हैं. युवाओं को रोजगार देने में मोदी सरकार की विफलता, पर्यावरण मोर्चे पर नाकामी, महिलाओं को उनका हक न देना आदि जैसे कई मुद्दे हैं जो पार्टी इन चुनावों में उठा रही है. कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में जो वादे किए हैं, वे पार्टी के लिए गेमचेंजर साबित होंगे, खासकर महालक्ष्मी योजना. इसके तहत पात्र महिलाओं को प्रति वर्ष एक लाख रुपए देने की गारंटी दी गई है."

बहरहाल, कांग्रेस के हौसले भले ही बुलंद हों, पार्टी के लिए दलबदलू एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं. बिलासपुर की पूर्व मेयर वाणी राव, पूर्व राज्य महासचिव चंद्रशेखर शुक्ला, जगदलपुर की मौजूदा मेयर सफीरा साहू और बिलासपुर जिला पंचायत अध्यक्ष अरुण चौहान पिछले कुछ हफ्तों में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने वाले प्रमुख नेताओं में शुमार हैं. दूसरी तरफ, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने रायगढ़ और अंबिकापुर सीटों पर क्रमश: आदिवासी ईसाई इनोसेंट कुजूर और संजय एक्का को उतारकर कांग्रेस की मुश्किल बढ़ा दी है, क्योंकि इससे कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगने के आसार हैं. राजनैतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इसके पीछे शायद भाजपा और बसपा की मिलीभगत है.

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने इंडिया टुडे से कहा, "भाजपा ने राज्य में हमेशा अपने राजनैतिक आईक्यू (बुद्धिमत्ता के स्तर) का इस्तेमाल किया है. लेकिन टिकट वितरण को देखकर कहा जा सकता है कि कांग्रेस ने अधिक ईक्यू (भावनात्मक स्तर) दर्शाया है." वैसे, इसमें कोई दो-राय नहीं कि जीत के लिए दोनों के सही संतुलन की जरूरत होगी.

Advertisement
Advertisement