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प्रधान संपादक की कलम से

भाजपा ने दक्षिण के लिए लंबे वक्त और छोटे वक्त की रणनीतियां बनाई हैं और इसकी वजह उसके 2019 की वोट हिस्सेदारी के ब्योरों में है

इंडिया टुडे कवर: टूटेगा दक्षिण का व्यूह?
इंडिया टुडे कवर: टूटेगा दक्षिण का व्यूह?
अपडेटेड 23 अप्रैल , 2024

- अरुण पुरी

लोग अक्सर याद करते हैं कि 1984 के आम चुनाव में नई नवेली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने किस तरह महज दो सीटें जीती थीं. मगर यह बात मोटे तौर पर बिसरा दी जाती है कि उनमें से एक दक्षिण भारत में थी आंध्र प्रदेश की हनमकोंडा सीट, जहां एक पुराने जनसंघी ने भावी प्रधानमंत्री नरसिंह राव को मात दे दी थी. इतने ही अचरज की बात यह कि दूसरा सांत्वना पुरस्कार एक और भावी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का घर गुजरात का मेहसाणा था.

इन दो सीटों की गूंज 2024 में खास तौर पर सुनाई देती है, जब मोदी दक्षिण में ऐतिहासिक खाई को पाटने में जुटे हैं. 1984 के बाद 1998 तक दक्षिण में पार्टी की सीटें इकाई अंकों में सिमटी रहीं और फिर अगले दो दशकों के दौरान 20 के औसत पर जाकर ठहर गईं.

मोदी के 2019 के चुनावी बही-खातों में एक खाली कॉलम भी दक्षिण ही था. कर्नाटक में उसने 28 में से 25 सीटें जरूर जीतीं. मगर उसके बाहर चार राज्यों में महज चार सीटें जीतीं. दरअसल ये चारों तेलंगाना में थीं. 

आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल में उसके हाथ कुछ नहीं लगा पुदुच्चेरी मिलाकर 85 में से शून्य. 2019 में दक्षिण में 130 में से 29 सीटें उसकी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है. इसीलिए 2024 का आम चुनाव जितनी बड़ी शुरुआत है उतनी ही बड़ी मंजिल भी.

भाजपा ने दक्षिण के लिए लंबे वक्त और छोटे वक्त की रणनीतियां बनाई हैं. इसकी वजह उसके 2019 की वोट हिस्सेदारी के ब्योरों में है. घटते क्रम में ये प्रतिशत इस प्रकार थे, कर्नाटक 51.38, तेलंगाना 19.45, केरल 12.93, तमिलनाडु 3.66 और आंध्र प्रदेश 0.96 प्रतिशत.

यह दिलखुश तस्वीर तो नहीं ही है. इसीलिए पार्टी की छोटे वक्त की योजना में ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान करनी है जिन्हें इस बार जीता जा सके. वहीं लंबे वक्त की रणनीति इंच-दर-इंच चुनावी मैदान और दिमागों में जगह बनाने की है ताकि पार्टी राज्य के भावी चुनावों से पहले ज्यादा प्रमुखता हासिल करने और यहां तक कि मुख्य विपक्षी पार्टी की जगह लेने को तैयार हो जाए.

भाजपा के लिए दो सबसे मुश्किल राज्य तमिलनाडु और केरल हैं, जहां 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं. जयललिता के बाद एआईएडीएमके के धीरे-धीरे कमजोर होने से द्रविड़ राजनीति के गढ़ में उसके लिए राह बनी है.

अब तक दो ध्रुवों में बंटे फलक को तोड़ने की कोशिश में उसने जाति-आधारित छोटी पार्टियों की एक चौकड़ी से हाथ मिलाया है. हालांकि यहां मोदी का रथ रोकेने के लिए डीएमके के स्टालिन के अलावा भाजपा की सहयोगी रह चुकी एआईएडीएमके भी है.

केरल भाजपा के लिए एक ऐसा भूभाग है जहां उसने कभी लोकसभा की सीट नहीं जीती. हालांकि अब यहां हिंदुत्व स्थानीय शब्दावली में दाखिल हो चुका है. तभी तो 2009 के 6 फीसद के मुकाबले भाजपा का वोट शेयर 2019 में दहाई अंकों तक पहुंच गया.

कर्नाटक टीम मोदी के लिए 2019 में सुखद नतीजे देने वाला रहा. लेकिन अब यहां कांग्रेस के चतुर-चालाक और ताकतवर क्षत्रपों सिद्धरामैया और उनके डिप्टी डी.के. शिवकुमार की हुकूमत है. इसलिए तकदीरों में कुछ उलटफेर होना तय दिखता है, जिसमें कांग्रेस एक सीट के अपने निचले स्तर में सुधार का पक्का इरादा किए दिखती है.

तेलंगाना में भी कांग्रेस के नए कर्णधार ए. रेवंत रेड्डी को उम्मीद है कि दिसंबर के विधानसभा चुनाव में अपनी जीत से बनी लहर वे इस चुनाव तक ला पाएंगे. आंध्र प्रदेश में पार्टी चंद्रबाबू नायडू के साथ मिलकर काम कर रही है, पर मुख्यमंत्री जगन रेड्डी वॉकओवर देने वाले नहीं हैं. इस तरह पांचों राज्यों में भाजपा का मुकाबला बहुत मजबूत स्थानीय नेतृत्व से है.

इस हफ्ते की आवरण कथा रणभूमि के इन राज्यों से जमीनी रिपोर्ट और विश्लेषणों के साथ 2024 के लोकसभा चुनाव के इस अहम सब-नैरेटिव का खाका खींचती है. सीनियर डिप्टी एडिटर अमरनाथ के. मेनन आंध्र, तेलंगाना और तमिलनाडु पर अपनी अनुभवी नजर डाल रहे हैं; कोच्चि में हमारे पुराने साथी जीमॉन जैकब ईश्वर के अपने देश का चुनावी हाल-चाल बता रहे हैं और एसोसिएट एडिटर अजय सुकुमारन कर्नाटक की थाह ले रहे हैं.

ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा ने मोर्चे पर सामने से अगुआई कर रहे, तमिलनाडु में भाजपा के 39 वर्षीय प्रमुख के. अन्नामलाई से मुलाकात की. साथ ही, उस मजबूत द्रविड़ फौज से भी जिससे भाजपा नेता का मुकाबला है, यानी डीएमके, जो मोर्चे पर अविचलित खड़े स्टालिन की अगुआई में चिदंबरम और पुदुच्चेरि में उथल-पुथल मचा रही है. वे तटवर्ती केरल के नायकों से भी मिले, तिरुवनंतपुरम में कांग्रेस के सौम्य स्टार सांसद शशि थरूर और उनके जुझारू चैलेंजर केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर.

भाजपा-आरएसएस के रणनीतिक गुरु लंबे अरसे से दक्षिण को फतह करना चाहते रहे हैं पर हिंदुत्व की विरोधी राजनैतिक संस्कृतियों में पले-बढ़े मतदाताओं के बीच उनकी यह इच्छा मोटे तौर पर अधूरी ही रहती आई है. धर्मपरायण होते हुए भी उन्होंने धर्म को राजनीति से ज्यादातर अलग ही रखा. दक्षिण के सियासी लैंडस्केप को बदलने की भाजपा की इच्छा विचारधारा और रणक्षेत्र की जरूरतों से प्रेरित है.

एक दशक से भारत में शासन कर रही राष्ट्रीय पार्टी के लिए अखिल भारतीय पदचिन्हों का न होना सचमुच बेचैनी पैदा करता है, खासकर उसकी 'उत्तर भारत की पार्टी' के रूप में छवि बन जाना. इसके अलावा, 543 में से दक्षिण की 130 सीटें घटा दें, तो मोदी का 400 सीटों का लक्ष्य साकार करना मुश्किल होगा. और कहीं कांटे के चुनाव की संभावना बन जाने पर इसकी बड़ी जरूरत होती है कि आपके पास अच्छा बफर स्टॉक रहे.

इन जुड़वां लक्ष्यों पर काम करने में भाजपा ने कोई कसर नहीं छोड़ी है. निजी दौरे करके, एक-एक दीवार को प्रचार सामग्री से पाटकर, और सबसे अहम प्रतीकात्मक जुड़ाव कायम करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दक्षिण में अपनी व्यापक मौजूदगी बना ली है.

संसद की नई इमारत के उद्घाटन में सेंगोल को प्रमुखता देने से लेकर काशी तमिल संगमम परियोजना शुरू करने और तमिल भाषा के बार-बार गुण गाने तक भाजपा अपने सांस्कृतिक मेलजोल को काफी दूर-दूर तक ले गई है.

अयोध्या का समारोह करीब आने पर मोदी ने दक्षिण के मंदिरों की यात्राओं का ऐसा जाल भी बुना जिसने उत्तर-दक्षिण की जैविक कड़ी का काम किया. नतीजे हमें 2024 की दक्षिणी हिस्से की कहानी भी अच्छे से समझाएंगे.

- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

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