scorecardresearch

प्रधान संपादक की कलम से

सुप्रीम कोर्ट में अपील के बाद उसे कुछ राहत मिल गई है. इंडिया गठबंधन का मुकाबला भाजपा की उस अथक चुनाव मशीनरी से है जिसे लगातार लोकप्रियता के शिखर पर सवार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ताकत मिलती है.

इंडिया टुडे कवर: दावेदारों में कितना दम
इंडिया टुडे कवर: दावेदारों में कितना दम
अपडेटेड 15 अप्रैल , 2024

- अरुण पुरी

भारत ऐसे आम चुनाव की ओर बढ़ रहा है जिसमें विपक्ष महज सामान्य राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता के लिए ही सामने नहीं है. वह उस खतरे से बचने की कोशिश भी कर रहा है जिसे वह अस्तित्व का खतरा कहता है. इसी ने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) सरीखे बेमेल सहयोगियों को भी 'इंडिया' (इंडियन नेशनल डेवलपमेंट ऐंड इन्क्लूसिव अलायंस) के बैनर तले साथ आने को मजबूर कर दिया.

इसकी वजह यह भी थी कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने दिल्ली में शराब नीति से जुड़े कथित घोटाले के लिए आप के प्रमुख अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार कर लिया. इससे पहले विपक्ष के एक और मुख्यमंत्री झारखंड के हेमंत सोरेन को कथित जमीन घोटाले में ईडी की पूछताछ के बाद इस्तीफा देने पर हिरासत में ले लिया गया था. कांग्रेस को भी आयकर विभाग के जबरदस्त दबाव का सामना करना पड़ा जब उसने जुर्माने के तौर पर उससे 3,500 करोड़ रुपए की मांग कर डाली.

सुप्रीम कोर्ट में अपील के बाद उसे कुछ राहत मिल गई है. इंडिया गठबंधन का मुकाबला भाजपा की उस अथक चुनाव मशीनरी से है जिसे लगातार लोकप्रियता के शिखर पर सवार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ताकत मिलती है. यही नहीं, उसके कंधों पर उस गद्दीनशीन निजाम को रोकने का जतन करने की बड़ी भारी चुनौती भी है जो केंद्र में लगातार तीसरा कार्यकाल हासिल करने के लिए सहयोगी दलों के साथ 400 से ज्यादा सीटों का 'निरंकुश बहुमत' हासिल करने पर आमादा है.

क्या इंडिया प्रधानमंत्री मोदी को धराशायी कर सकता है? कौशिक डेका की लिखी आवरण कथा इसी सवाल का जवाब देने की कोशिश करती है. यह जिम्मेदारी बहुत कुछ भाजपा के सबसे बड़े चैलेंजर कांग्रेस के कंधों पर है. 2024 में वह लोकसभा की 543 में से करीब 320 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और करीब 200 पर उसका भाजपा से सीधा मुकाबला होगा. 2019 में 190 सीटों पर हुए सीधे मुकाबले में उसने महज 15 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा ने 175 सीटें, 92 फीसद के स्ट्राइक रेट से. वोट हिस्सेदारी में औसतन 20 फीसद अंकों का फासला था, जिसका मतलब है कि अपने दम पर यह फासला कम करने के लिए कांग्रेस को जबरदस्त लहर की जरूरत होगी.

अपने इस बेहद ताकतवर विरोधी का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस तीन मुख्य रणनीतियां अपना रही है. एक, वह सुसंगत जवाबी नैरेटिव की दिशा में काम कर रही है, जिसमें राहुल गांधी ने अपनी दो भारत जोड़ो यात्राओं के साथ देश भर में घूम-घूमकर भाजपा की कथित सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ अलख जगाई, ज्यादा समतामूलक वृद्धि पर जोर दिया और प्रचंड बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई और बड़े कारोबारियों के साथ सरकार की कथित साठगांठ के बारे में सवाल पूछे.

दूसरी रणनीति विकसित भारत की 'मोदी की गारंटी' का जवाब देना है. कांग्रेस 25 गारंटियों का मोटा पुलिंदा लेकर आई है, जिसका मकसद सभी तबकों यानी सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों, किसानों, महिलाओं, मजदूरों और युवाओं को लुभाना है. तीसरी रणनीति है नए उम्मीदवारों की पूरी फौज मैदान में उतारना. कांग्रेस के 2 अप्रैल तक घोषित 228 उम्मीदवारों में 150 नए चेहरे हैं.

लेकिन अगर कांग्रेस उन राज्यों में बेहतर प्रदर्शन कर भी लेती है जहां उसकी अच्छी संभावनाएं हैं, तब भी विपक्ष के कामयाब होने के लिए इंडिया गठबंधन को उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और बिहार सरीखे उन प्रमुख रणक्षेत्रों में हाथ खोलकर गोलीबारी करनी होगी जहां 210 सीटें हैं.

उत्तर प्रदेश में जहां विपक्षी दलों ने 2019 में 80 में से 16 सीटें जीती थीं, भाजपा ने अपनी मुख्य चैलेंजर और अखिलेश यादव की अगुआई वाली समाजवादी पार्टी के तब सहयोगी रहे दलों को तोड़ लिया है. भाजपा की गोलबंदी का जवाब देने के लिए राज्य में इंडिया के मुख्य खिलाड़ी अखिलेश पीडीए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक नाम का सामाजिक गठजोड़ लेकर आए. मगर मायावती की अगुआई वाली बहुजन समाज पार्टी के अकेले चुनाव लड़ने के फैसले ने इंडिया के मंसूबों पर पानी फेर दिया.

महाराष्ट्र में, जहां कई सारी टूटी-बिखरी पार्टियां मतदाताओं की वफादारियों को अलग-अलग दिशाओं में खींच रही हैं, भाजपा की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और इंडिया के बीच काफी कड़ा मुकाबला है. आम धारणा यह है कि शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में टूट के बाद क्रमश: उद्धव ठाकरे और शरद पवार की अगुआई में बची रह गई मूल पार्टियों को जनता की अच्छी-खासी सहानुभूति मिल रही है. यह इंडिया गठबंधन को एनडीए के आंकड़ों में काट-छांट का अच्छा मौका देता है.

लेकिन किले में दरार का एक उदाहरण बिहार है, जहां दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पाला बदलने की वजह से पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव उलटे नए जोश और उत्साह से भर उठे लगते हैं. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने अपनी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का हिस्सा कम करके इंडिया गठबंधन की सहयोगी पार्टियों कांग्रेस और वाम दलों को कोई भी सीट देने से इनकार कर दिया. कुछ लोगों का कहना है कि चतुरसुजान ममता ने इंडिया गठबंधन के अपने सहयोगी दलों को विपक्षी ताकत के रूप में जान-बूझकर बने रहने दिया ताकि सत्ता-विरोधी वोटों को भाजपा के पक्ष में एकजुट होने देने के बजाए उनका कुछ हिस्सा उनकी तरफ जाने दिया जा सके.

दक्षिण में इंडिया गठबंधन तमिलनाडु और केरल दोनों को थामे रखने की उम्मीद में है, जहां कुल 59 सीटें हैं. कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस पिछली बार जीती 45 सीटों में से चार से ज्यादा मिलने की उम्मीद कर रही है. इंडिया गठबंधन की तकदीर मोटे तौर पर इस पर निर्भर है कि वह अगले दो महीनों में ताकतवर जवाबी नैरेटिव लोगों के गले उतार सकता है या नहीं. फिलहाल तो हकीकत में भाजपा को हराना इस गठबंधन के लिए बहुत मुश्किल काम दिखाई देता है. ज्यादा से ज्यादा वह इतनी उम्मीद और कोशिश कर सकता है कि भाजपा को बहुमत के निशान से नीचे ले आए.

5 अप्रैल, 2023

पुनश्च: ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा ने पत्रकारिता के तीन पुरस्कार जीतकर हमें गौरवान्वित किया. इसमें कश्मीरी पंडितों के कश्मीर की वादी से पलायन के पीछे की सच्चाई पर उनकी कवर स्टोरी के लिए फीचर लेखन के अंतर्गत प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका पुरस्कार शामिल है. अन्य दो उनके दिलचस्प साप्ताहिक पॉडकास्ट 'नथिंग बट द ट्रुथ’ के लिए के लिए हैं. इंडिया टुडे (हिंदी) के विशेष संवाददाता आनंद चौधरी को पीएम आवास योजना में गड़बड़ी पर खास रपट के लिए हिंदी पत्रकारिता की श्रेणी में रामनाथ गोयनका पुरस्कार दिया गया. उन्हें बधाई.

- अरुण पुरी, प्रधान संपादक और चेयरमैन (इंडिया टुडे समूह)

Advertisement
Advertisement